सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 774, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें७१८
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४९ ]
वक्तव्य—भोजन जरा अधिक खाने पर या पेट भर के खा लेने से हृदय पर भार, श्वास काटिन्य, पड़खों का फटना आदि अनुभव होते हैं, जिसे बम्बई की तरफ गैस चढ़ना या गैस होना कहते हैं ॥८६॥
हृत्कुक्षिशूलं मुखकण्ठशोषो वायोनिरोधो विषमग्निता च ।
ते ते विकाराः पवनात्मकाश्च भवन्ति गुल्मेऽनिलसंभवे तु ॥१०॥
वातजन्यगुल्म में—हृदय और कुक्षि (उदरपड़खों) में शूल; मुख और गले का शोष, वायु का अवरोध, अग्नि की विषमता (कभी भूल लगना, कभी नहीं लगना), स्तम्भन-कम्पन आदि वातजन्य रोग होते हैं ॥१०॥
स्वेदज्वराहारविदाहदाहा- स्तृष्णाऽङ्करागः कटुवक्त्रता ।
पित्तस्य लिङ्गान्यलिङ्गानि यानि पित्तात्मके तानि भवन्ति गुल्मे ॥११॥
पित्तजन्य में—स्वेद, ज्वर आहार में विदाह (खटास होना), दाह, प्यास, अंगों में सुखी, मुख में कटुता, पित्त के दूसरे सम्पूर्ण लक्षण (भ्रम, मद, मूर्च्छा) होते हैं ॥
वक्तव्य—अम्लीभवत्यन्तमथो ज्वरश्च दाहः पिपासा कटुवक्त्रता च । पित्तस्य लिगानि च कीर्तितानि भवन्ति पित्तप्रभवे च गुल्मे ॥१२॥
स्तैमित्यमन्त्रेऽरुचिरङ्गसाद- इच्छदिः प्रसेको मधुरास्यता च ।
कफस्य लिङ्गानि च यानि तानि भवन्ति गुल्मे कफसंभवे तु ॥१२॥
कफजन्य गुल्म में—स्तित्मिता (अंगों का गीले भारीवस्त्र से ढँपा सा होना), अन्न में अरुचि, अङ्गों में शिथिलता, वमन, मुख से शूक बहना, मुख में मधुरता, भारीपन, शीतलता आदि कफजन्य दूसरे लक्षण होते हैं ॥१२॥
सर्वोत्तमकः सर्वविकारयुक्तः सोऽसाध्य उक्तः,
सन्निपातजन्यगुल्म में सब दोषों के लक्षण रहते हैं, यह असाध्य कहा है ।
वक्तव्य—दूसरे इसका लक्षण—“सिराजालपरिच्छन्तो दाह-रागज्वरान्वितः । क्रूरवद् रक्तपर्यन्तः त्रिदोषः स न सिध्यति ॥” गुल्म की एक दूसरी अवस्था को उपस्तम्भ कहते हैं, यथा—पयो हाम्लसमायुक्तं दक्षिभानं व्रजेद्यथा । यल्लहीनस्य गुल्मोऽपि तथोपस्तम्भतां ब्रजेत् ॥ अभ्योबहेस्तम्भयित्वा स्रोतसो कोष्ठसन्ध्रितः । उदरे प्रतिसन्तिष्ठेद् उपस्तम्भं तु तं विदुः । स्वतजं प्रवच्ये ।
नवप्रस्तूताऽहितभोजना या या चामगर्भं विमुज्जेहती वा ॥१३॥
वायुहिं तस्याः परिगृह्य रक्तं करोति गुल्मं सरुजं सदाहम् ।
पैत्तस्य लिङ्गे न समानलिङ्गं विशेषणं चाप्यपरं निबोध ॥१४॥
न स्पन्दते नोदरमेति बुद्धिं भवन्ति लिङ्गानि च गर्भिणीनाम् तं गर्भकाळातिगमे चिकित्स्य-
मसस्मभवं गुल्ममुग्नन्ति तज्ज्ञाः ॥१५॥ रक्तजन्यगुल्म को कहते हैं—तुरन्त प्रसव की हुई जो स्त्री
अहित भोजन करती है, अथवा जिस स्त्री को छै मास तक कन्चे गर्भ का खाव हुआ है, उसके अपथ्य सेवन से या श्रुतु-काल में अपथ्य आधार करने पर—वायु स्त्री के आर्त्तव को रोककर गुल्म को उत्पन्न करती है, इससे उसे पीड़ा और दाह रहता है । इस रक्त गुल्म में पित्त के समान लक्षण होते हैं; दूसरे विशेष लक्षणों को सुनो । यह रक्तगुल्म गर्भ के समान चेष्टा नहीं करता, उदर भी नहीं बढ़ता, गर्भवती के दूसरे लक्षण (यकान आदि) होते हैं । इस रक्तजन्यगुल्म की चिकित्सा गर्भकाल के व्यतीत होने पर करनी चाहिये ।
वक्तव्य—प्रसूता शब्द से प्रसव मास तक की संज्ञा है, यथा—“अनेन विधिनाऽध्यर्थमासमुपसंस्कृता विमुक्ताहाराचारा विगतस्वित्काभिधाना स्यात् । पुनरात्त्तवदर्शनादित्येके ॥” सुश्रुत । चरक में—“यः स्पन्दते, पिण्डित एव नोङ्गैः विरात् सशूलः समगर्भलिगः । स एव च स्त्री भव एष गुल्मो मासे व्यतीते दशमे चिकित्स्यः ॥” इसमें गर्भ के समान लक्षण—जोमचलाना, प्रातः वमन, आर्त्तवरोध आदि लक्षण रहते हैं । इसकी चिकित्सा गर्भ का समय व्यतीत होने पर करनी चाहिये—इसी से कहा है—“ज्वरे तुल्यत्वं दोषत्वं प्रमेहे तुल्यदुष्यता । रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम्” ॥१३-१५॥
वातगुल्मादितं स्निग्धं युक्तं स्नेहविरेचनैः । उपाचरेद्यथाकालं निरुहैः सातुवासनैः ॥१६॥ वातजन्यगुल्म रोगी को स्निग्ध करके, योग्य स्नेहविरेचन (ऐरण्ड तैल आदि) देकर, समय का अतिक्रमण किये बिना निरुह और अनुवासनों से चिकित्सा करे । (यथाकालं पक्षाद् विरेको वान्तस्य, आदि नियम से) ॥१६॥
पित्तगुल्मादितं स्निग्धं काकोल्यादिघृतेन तु । वरिक्तं मधुरैर्योगैर्निरुहैः समुपाचरेत् ॥१७॥ पित्तगुल्म से पीड़ित रोगी को काकोल्यादि घृत से स्निग्ध करके—आरग्वधादि, हलुरस शर्करा आदि मधुर योगों से विरेचन देकर मधुर निरुहों से मली प्रकार चिकित्सा करे ॥१७॥ श्लेष्मगुल्मादितं स्निग्धं पिप्पल्यादिघृतेन तु । तीक्ष्णैर्वरिक्तं तद्रूपैर्निरुहैः समुपाचरेत् ॥१८॥