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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३६ ]

घृत सिद्ध करे । यह घृत गुल्म, ग्रहणी, अर्श, रवास, उन्माद, क्षय, ज्वर, कास, अपस्मार, मन्दाग्नि, प्लीहा, शूल और वायु को शान्त करता है ॥३१-३३॥

दधि सौवीरकं सर्पिः क्वाथौ सुद्राकुलथजौ । पट्टचाढकानि विपचेदावाप्य द्विपलान्यथ ॥३४॥ सौवर्चलं सर्जिकां च देवदावंथ सैन्धवम् । वातगुल्मापहं सर्पितेदीपनमेव च ॥३५॥

दही, निस्तुषकांजी, घी, मूंग का क्वाथ, कुलथी का क्वाथ, प्रत्येक एक आदक, सौवर्चल, सर्जक्षार, देवदारु और सैन्धव, प्रत्येक दो पल इनसे घृत सिद्ध करे । यह घृत वात-गुल्म नाशक और अग्निदीपक है ॥३४, ३५॥

तृणमूलकपाये तु जीवनीयेः पचेद् घृतम् । न्यम्रोधादिगणे वाऽपि गणे वाऽप्युत्प्लादिके ॥३६॥ रक्तपित्तोत्थितं धन्ति घृतान्येतान्यसंग्रयम् । पंचतृणमूल के क्वाथ में जीवनीयगण (काकोल्यादि) के कल्क से घृत सिद्ध करे । न्यम्रोधादिगण के क्वाथ में या उत्प्लादिगण के क्वाथ में जीवनीय गण के कल्कसे घृत सिद्ध करे । ये घृत रक्त पित्तजय गुल्म को बिना सन्देह के नष्ट कर देते हैं ॥

आरग्वधादौ विपचेद्दोषनीययुतं घृतम् ॥३७॥ क्षारवर्गं पचेत्कचान्यतु पचेन्मूत्रगण्डेपरम् । धन्ति गुल्मं कफोद्भूतं घृतान्येतान्यसंग्रयम् ॥३८॥ आरग्वधादि गण के क्वाथ में पिप्पल्यादि दोषनीय गण का कल्क मिलाकर घृत सिद्ध करे । क्षार वर्ग के क्वाथ में (मुष्क से लेकर चतस्रः कोशातकी पर्यन्त) पिप्पल्यादिगण के कल्क से या गोमूत्र आदि आठों मूत्रों में पिप्पल्यादिगण का कल्क मिलाकर घृत सिद्ध करे । ये घृत कफजय गुल्म को निःसन्देह नष्ट करते हैं ॥३७, ३८॥

यथादोषोच्छ्रयं चापि चिकित्सेत्सन्निपातिकम् । सन्निपातज गुल्म में दोष की अधिकता के अनुसार चिकित्सा करे ।

चूर्ण हिङ्गवादिकं वाऽपि घृतं वा प्लीहानाशनम् ॥३९॥ पिवेद् गुल्मापहं काले सर्पितैत्वक्कमेव वा । वातव्याधि में कहा हिङ्गवादि चूर्ण या प्लीहानाशक घट-पलघृत पीये । अथवा वातव्याधि में कहा तैत्वक्कघृत काल में (उत्पन्न होने पर ही, या विरेचन के लिये) पीये ॥३९॥

तिलैजुरकपालाशसार्पं यावनालजम् ॥४०॥ भस्म मल्लकजं चापि गोजाविखरहस्तिताम् । मूत्रेण सहिषोणां च पाळिकैश्चावचूर्णितैः ॥४१॥ कुष्ठसैन्धवयष्ट्याहृत्तागरकुमिघातिभिः । साजमोदैश्च दशभिः सामुद्राच्च पलैर्युतम् ॥४२॥ अयःपात्रेऽग्नित्ताड्येन पक्त्वा लेह्य (ह) मथोद्भवेत् । तस्य मात्रां पिवेद्भक्ता सुरया सर्पिषाऽपि वा ॥४३॥

धान्याम्लेनोष्णतोयेन कौलथेन रसेन वा । गुल्मान् वातविकारान्क्ष क्षारोऽयं हन्त्यसंग्रयम् ॥४४॥ पानीयक्षार-तील, तालमखाना, ढाक, सरसों, जौ की नाल, मूली, इन सबको जलाकर इस भस्म को गाय, बकरी, भेड़, गधा, हाथी इनके मूत्र में तथा भैंस के मूत्र में घोळकर (चार गुणों में) क्षार विधि से नितार ले । इस नितारे जल में कूट, सैन्धव, मुलेहटी, सोंठ, विडंग, अजवायन प्रत्येक एक पल, समुद्र नमक दस पल, मिलाकर लोहपात्र में मृदु अग्नि से पाक करे । लेह्य तैयार होने पर उतार ले । इसकी योग्य मात्रा को दही, सुरा, घी, कांजी, गरमपानी, कुलथी के रस में घोळकर पीने को देवे । यह क्षार गुल्म एवं वात रोगों को अवश्य नष्ट करता है ।

वक्तव्य—दूसरे कई आचार्य तिलादि की भस्म एक सौ पल लेकर गाय आदि के चार गुणों मूत्र में क्वाथ करके चतुर्थांश शेष रखकर कुछ आदि का चूर्ण मिलाकर लेह्य सिद्ध करने को कहते हैं ॥४०-४४॥

स्वजिकाकुष्ठसहितः क्षारः केतकिजोऽपि वा । तैलेन शमयेत् पीतो गुल्मं पवनसंभवम् ॥४५॥ स्वर्जक्षार, कुछ, यवक्षार यह अथवा केतकी (केवड़ा) का क्षार तैल के साथ पीने से वातगुल्म को शान्त करता है । (कोई इसको एक योग मानते हैं) ॥४५॥

पीतं सुखाभ्युना वाऽपि स्वजिकाकुष्ठसैन्धवम् । सर्जक्षार, कुछ, सैन्धव के चूर्ण को गुन-गुनाते पानी से पीये ।

वृश्चोव ( र ) मुरुवूक् च वर्षाभूवृद्धतीव्र्यम् ॥४६॥ चित्रकं च जलद्रोणे पक्त्वा पादावरोषितम् । मागधीचित्रकक्षौद्रलिप्र कुम्भे निधापयेत् ॥४७॥ मधुनः प्रथमावाप्य पथ्याचूर्णार्थसंयुतम् । वुसोषितं दशाहं तु जीर्णभक्तः पिवेन्नरः ॥४८॥ अरिष्टोऽयं जयेद् गुल्ममविपाकमरोचकम् ।

वृश्चीवादि अरिष्ट—श्वेतपुनर्नवा, एरण्ड, लालपुनर्नवा, कटेरी, बड़ी कटेरी, चित्रक इनको एक आठक लेकर एक द्रोण जल में पकाये । चतुर्थांश रहने पर उतार ले । पिप्पली, चित्रक, मधु से लिप्त घड़े में इस क्वाथ को भर दे । इस क्वाथ में मधु एक प्रस्थ, हरड का चूर्ण आधा प्रस्थ मिलाकर, दस दिन तक इस घड़े को भूसे में रख देवे । दश दिन के पीछे भोजन के जीर्ण होने पर इसको मनुष्य पीये । यह अरिष्ट गुल्म, अविपाक, अरोचक को नष्ट करता है । (जीर्णभक्तः—परिणताहारः लघुः कोष्ठः प्रातः पिवेत् ॥४६-४८॥

पाठानिकुम्भरजनीत्रिकदुत्रिफलाग्निकम् ॥४९॥ लवणं वृक्षबीजं च तुल्यं स्यादननं गुडम् ।