सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४४ ]
मण्डूरभस्म, लोहभस्म, चित्रक, विडंग, हरड, त्रिकटु प्रत्येक एक भाग, इन सबके बराबर स्वर्णमाथिक, इनको गोमूत्र में सन्धान करके रख देवे, इसको मधु के साथ चाटने पर घोर पाण्डुरोग भी शीघ्र ही नष्ट होता है ॥२३॥
बिभीतकायोमलनागराणां
चूर्णं तिलानां च गुडश्च मुख्यः ।
तक्रानुपानो वटकः प्रयुक्तः
क्षिणोति घोरानपि पाण्डुरोगान् ॥२४॥
बहेड़ा, किहमल, सोंठ, तिल, इनका चूर्ण, गुड से मिलाकर बटक बनाये। इनको तक के अनुपान से खाने पर भयानक पाण्डुरोग भी नष्ट हो जाता है। (गुड सम्पूर्ण चूर्ण के बराबर देना चाहिये) ॥२४॥
सौवर्चलं हिङ्कु किराततिक्तं
कलायमात्राणि सुखाम्बुना वा ।
मूर्वाहरिद्रामलकं च लिह्यात्
स्थितं गर्वां समृद्धिनानि मूत्रे ॥२५॥
मूलं बलाचित्रकयोः पिवेद्रा
पाण्डुवामयातंऽक्षसमं हिताशी ।
सुखाम्बुना वा लवणेन तुल्यं
जिघ्रोः फलं क्षीरभुजोपयोऽयम् ॥२६॥
सौवर्चल, हींग, चिरायता, प्रत्येक एक अक्षमात्रा लेकर गरम पानी के साथ पीये। मूर्वा हरदी और आंवला इनको सात दिन गोमूत्र में रखकर चाटे (मधु से या गरम पानी से पीये)। चित्रक और बला, इनका मूल प्रत्येक एक कर्ष लेकर गरम पानी से पीये, हितकारी भोजन करे। सैन्धव नमक और सहजन का फल समान भाग लेकर पानी से पीये, भोजन में दूध का ही भोजन करे।
वक्तव्य—“निशामलकमूर्वाभिर्भावितं ससवासरान्। गोमूत्रं पिवतः पाण्डुः कामला च प्रणश्यति” ॥२५, २६॥
न्यग्रोधवर्गस्य पिवेत् कषायं
शीतं सित्ताक्षौद्रयुतं हिताशी ।
गालादिकं चाप्यथ सारचूर्णं
धात्रीफलं वा मधुनाऽवलिह्यात् ॥२७॥
न्यग्रोधादिगण के शीत कषाय को शर्करा-मधु के साथ पीये, हितकारी भोजन करे। शालसारदिगण के सार भाग का चूर्ण मधु से चाटे, या आंवले का चूर्ण मधु से चाटे ॥२७॥
विडङ्गमुस्तत्रिफलाजमोद-
रूपकन्योषविनिर्दह्न्यः ।
चूर्णानि कृत्वा गुडशर्करे च
तथैव सर्पिर्मधुन्तो शुभे च ॥२८॥
संभारमेतद्विपचेन्निधाय
सारोदके सारवतो गणस्य ।
जातं च लेह्यं मतिमान् विदित्वा
निधापयेत्सोक्षकजे समुद्रगे ॥२९॥
हन्त्येष लेहः खलु पाण्डुरोगं
सशोथमुपामपि कामलां च ।
विडंग, मुस्ता, त्रिफला, अजवायन, फालसा, त्रिकटु, चित्रक इनका चूर्ण करे, शालसारदिगण के सार भाग के क्वाथ में इन सब चूर्णों को गुड, शर्करा, घी, और मधु को मिलाकर लेह तैयार करे। लेह तैयार हो जाने पर बुद्धिमान् वैद्य इस लेह को मुष्टक के बने सम्पुट में रख देवे। यह लेह शोथयुक्त पाण्डुरोग को तथा उष्क्रमला को भी नष्ट कर देता है। (मधु का पाक निषिद्ध नहीं, मधु को गरम खाना मना है, सखौद्रां शर्करां पक्त्वा)।
वक्तव्य—पाण्डुरोगप्रशान्त्यर्थमिदमुक्तं चिकित्सितम्। विकल्प्यैव च मिषजा यथादोषबलं प्रति ॥ स्नेहप्रायं पवनजे तित्तशीतं तु पैत्तिके। श्लैष्मिकं कटुरुक्षोणं मिश्रं स्यात् शक्तिपातके ॥२८-२९॥
सशर्करा कामलिनो त्रिभण्डी
हिता गवाक्षी सगुड्वा च शुण्डी ॥३०॥
कामला रोगियों के लिये शर्करा मिश्रित निशोथ उत्तम है। इन्द्रायण या सोंठ गुड के साथ हितकारी है ॥३०॥
कालेयके चापि घृतं विपक्वं
हितं च तत् स्याद्द्रजनीविमिश्रम् ।
कालेयक (दाहहरिद्रा) के कल्क से सित घृत में हरदी का प्रक्षेप मिलाकर खाना भी कामला में उत्तम है।
धातुं नदीजं जतु शैलजं वा
कुम्भाह्वये मूत्रयुतं पिवेद्रा ॥३१॥
स्वर्णमाथिक या शिलाजतु को गोमूत्र के साथ कुम्भाकमला में पीये ॥३१॥
मूत्रे स्थितं सैन्धवसंप्रयुक्तं
मासं पिवेद्राऽपि हि लोहकिट्टम् ।
लोहकिट्ट को एकमास तक गोमूत्र में रखकर गोमूत्र के साथ भस्म करके सैन्धव मिलाकर कुम्भाकमला में पीये।
दग्ध्वाऽक्षकाष्ठैर्मलमयसं वा
गोमूत्रनिर्वापितमष्टवारान् ॥३२॥
विचूर्ण्य लोहं मधुनाऽचिरेण
कुम्भाह्वयं पाण्डुरगतं निहन्त्यात् ।
सिन्धुदुर्भवं वाऽग्निसमं च कृत्वा
क्षिप्त्वा च मूत्रे सकृदेव तष्टम् ॥३३॥
लोहं च किट्टं बहुगन्धं तत्त्वा
निर्वाप्य मूत्रे बहुगस्तथैव ।
एकीकृतं गोजलपिष्टमेत-
दैकभ्यमावाप्य पचेदुखायाम् ॥३४॥