सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सप्ततन्त्रम्
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यथा न दृष्टो तथा विशुष्कं चूर्णाकृतं पेयमुदरिवता तत् ।
तक्रोदनाशी विजयेत रोगं
पाण्डुं तथा दीपयतेऽनलं च ॥३५॥
लोह किट्ट को बहेड़े की लकड़ियों में गरम लाल करके गोमूत्र में बुझाये । इस प्रकार आठ बार करे । फिर इसका चूर्ण करके मधु के साथ चाटे । यह कुर्म कामला पाण्डुरोग को नष्ट करता है । सैन्यच चूर्ण को बहेड़े की लकड़ियों में लाल अनिवर्ण करके एक साथ ही गोमूत्र में एकदम बुझावे । लोह-किट्ट को अनि में बहुत बार गरम करके बार बार गोमूत्र में कई बार बुझाये । फिर इन दोनों को मिलाकर गोमूत्र के साथ पीसकर पात्र (पतीली) में रखकर पकाये । पकाते समय जलने न पाये इस बात का ध्यान रखे, सूख जाने पर चूर्ण करके इसको उदरिवत् (छाछ) के साथ पीये । भोजन में छाछ और चावल लेवे । इस प्रकार करने से पाण्डुरोग नष्ट होता है, और अनि प्रदीप्त होती है ।
वक्तव्य—डल्हन ने पकाते समय पात्र का मुख ढांपने को कहा है, इसको विभीतक लक्षण कहते हैं ।
वि० मन्तव्य—पाण्डुरोग एवं कामला आदि में उक्त सब योग प्रायः विरेचन हैं, लोह मण्डूर एवं स्वर्ण माक्षिक के योग रक्त में ललिमा उत्पन्न करते हैं, लक्षण एवं मूत्र के संयोग से हृन्कों को शक्ति मिलती है, जिससे रक्त में मिला पिच मूत्र के साथ निकल जाता है, प्रवालमुक्ता आदि पिचशामक है । श्लो० २४ का योग बहुत ही उत्तम है, परन्तु मात्रा १ तो० होनी चाहिये, तक्र भर पेट पीना चाहिये । तक्र-अर्द्धविलोडित दही का हो, उसमें से माखन न निकाला जाय । और दारुहल्दी एवं हल्दी का योग (श्लो० ३१) भी बहुत उत्तम है, यकृत की क्रिया को सुधारता है, परन्तु हल्दी की मात्रा आधा तोला हो । मण्डूर का प्रयोग (श्लो० ३२)-आमला अथवा त्रिफला के चूर्ण के साथ होना चाहिये । पाण्डुरोग में भोजन चना गेहूँ की रोटी प्रचुर घृत के साथ दी जाती है । एक बात स्मरणीय है—एक कामला ऐसा जाता है, जिसमें सब चिकित्सा विफल जाती है, केवल सफल होती है मन्त्र चिकित्सा । रोगी को खटिया पर लेटा दिया जाता है, और नीचे परात में जल डाल कर घर दिया जाता है, और पास बैठकर मन्त्रवेत्ता मन्त्र का पाठ करता है, परात का जल पीला हो जाता है, और ३-७ दिन में कामला शान्त हो जाता है, इस प्रकार के अन्य प्रयोग भी किये हैं, जो बहुत ही सफल हैं ॥३२-३५॥
द्राक्षागुडुच्यामलकीरसैश्च सिद्धं घृतं लाघर (व) के हितं च ।
द्राक्षा, गिलोय, आंबले के स्वरस से सिद्ध घृत लाघरक रोग में हितकारी है ।
गौडानरिधान् मधुशर्कराश्च
मूत्रासवान् क्षारकृतास्तथैव ॥३६॥
स्निग्धान् रसानामलकैरुपेतान्
कोलान्वितान् वाऽपि हि जाङ्गलानाम् ।
सेवेत शोकाभिहितान्च योगान्
पाण्डुवामयी शालियवांश्च नित्यम् ॥३७॥
पाण्डुरोगी गुड से बने अमयारिष्ट आदि अरिष्टों को, मध्यासव को, शर्करासव को कुछ चिकित्सा में कहे मूत्रासवों को, श्लीपद में कहे क्षारकृतासवों को, स्नेह से भूने आंबला एवं बेर से युक्त जांगलमांसरसों को, तथा शोफ में कहे देव-दारु शुष्ठी आदि योगों को, लाल चावल और जौ का नित्य सेवन करे ॥३६,३७॥
शवासतिसारारुचिकासमूच्छां
वृद्धदिशुलज्वरशोफदाहान् ।
तथाऽविपाकस्वरभेदसादान्
जयेद्यथास्वं प्रसमीध्य आह्वम् ॥३८॥
शवास, अतीसार, अरुचि, काष, मूच्छा, प्यास, वमन, शुल्क, ज्वर, शोफ, दाह, अविपाक, स्वरभेद, साद (विधिलता) इन उपद्रवों को इनकी अपनी-अपनी चिकित्सा शास्त्र के अनुसार करे ॥३८॥
अन्तेषु शूनं परिहीनमध्यं
स्तनान् तथाऽन्तेषु च मध्यशूनम् ।
गुदे च शोफस्यय मुक्कशूनं
प्रताम्यमानं च विसंज्ञकल्पम् ॥३९॥
विवर्जयेत् पाण्डुकिनं यशोऽर्थां
तथाऽतिसारज्वरपीडितं च ॥४०॥
रोगी के हाथ पैर-मुख सूजे हों, परन्तु मध्यकाय कृश हो, तथा हाथ पैर-मुख कृश हों परन्तु मध्यशरीर सूजा हो तो, गुदा, मेहन, वृषणों पर सूजन हो, मूच्छा से पीडित, बेमान होनेवाले, पाण्डुरोगी को तथा अतिसार ज्वर पीडित पाण्डुरोगी को यश चाहनेवाला वैद्य छोड़ देवे—उसकी चिकित्सा न करे ।
निपातयेच्छरीरात् मुक्तिं भक्षितं मिषक् ।
युक्तिः शोधनेस्तीक्ष्णेः प्रसमीध्य बलाबलम् ॥
शुद्धकायस्य सर्पोपि बलाधानानि योजयेत् ।
सूदभक्षणदातुरस्य लोह्यादविनिवर्त्तनः ॥
द्वेध्यार्थं भावितां कामं दद्यात्तद्विषातयनेः ।
विडंगोलतिविषया निम्नपनेण पाठया ॥
वातार्केः कटुरोहिण्या कौटुजैर्मूर्व्याऽपि वा ।
चरक चि० अ०-११७-२२ ॥३९,४०॥