सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 790, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें७३४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४४ ]
इति श्रीसुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सा- तन्त्रे पाण्डुरोगप्रतिषेधो नाम (षष्ठोऽध्यायः, आदितः) चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥४४॥
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
अथातो रक्तपित्तप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे रक्तपित्तप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे— जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वि० मन्तव्य—रक्त का एक नाम लोहित है—रस श्वेत होता है लाल हो जाने पर रक्त कहलाता है, इसी प्रकार रक्त में लोह का प्रादुर्भाव होने से वह 'लोहित' कहलाता है और वह विदग्ध होकर रक्त को विदग्ध करता है तब रक्त खिराओं केशिकाओं में से चू कर मुख आदि से निकलने लगता है । रक्त का एक नाम 'क्षतज' है अर्थात् क्षत होने पर रक्त का प्रादुर्भाव होता है । क्षत हुए बिना—रक्त का दर्शन नहीं होता, परन्तु रक्त पित्त में क्षत के बिना ही केवल चू चू कर रक्त बाहर आने लगता है ॥१,२॥
क्रोधशोकभयायासविरुद्धान्नातपान्तठान् ।
कट्वन्मल्लवणक्षारतीक्ष्णोष्णान्तिविदाहिनः ॥३॥
नित्यमभ्यसतो दुष्टो रसः पित्तं प्रकोपयेत् ।
विदग्धं स्वगुणैः पित्तं विदहत्याशु शोणितम् ॥४॥
ततः प्रवर्तते रक्तमूर्ध्वं चाधो द्विधाऽपि वा ।
क्रोध, शोक, भय, परिश्रम, विरुद्ध भोजन, धूप, अग्नि, कटु, अम्ल, लवण, क्षार, तीक्ष्ण, उष्ण, अतिविदाहि द्रव्यों को नित्यप्रति सेवन करने से दूषित हुआ रक्त पित्त को प्रकुपित करता है । फिर विदग्ध हुआ पित्त अपने तीक्ष्ण उष्ण आदि गुणों से रक्त को शीघ्र ही विदग्ध बना देता है । इससे रक्त ऊपर (मुख-नासा आदि) तथा नीचे के मार्ग (गुद मूत्रमार्ग आदि से) से अथवा दोनों मार्गों से प्रवृत्त होता है ।
वक्तव्य—साधारणतः निकला रक्त एक से तीन मिनट में जमता है । रक्त में जमने का गुण है । परन्तु जब यह पित्त के कारण विदग्ध हो जाता है, तब जल्दी नहीं जमता, इसलिये बहता रहता है, इसीसे कहा है—“पित्तं तीक्ष्णं द्रवं पूति नीलं पीतं तथैव च । उष्णं कटुरसं चैव विदग्धं चाम्लमेव च ॥” (२) “अनुष्णशीतं मधुरं स्निग्धं रक्तं च वर्णतः । शोणितं गुरुं विस्त्रं स्याद् विदाहृश्यास्य पित्तवत् ॥” रक्त का विदाह पित्त की भांति है, इसलिये रक्त में द्रवत्व अधिक हो जाता है । इसीलिये “संयोगाद् दूषणात् तच्च सामान्यात् गरुषवर्णयोः । रक्तस्य पित्तमाख्यातं रक्तपित्तं मनीषिभिः ॥” यह विदग्धता के रक्त के स्थान यकृत प्लीहा से प्रारम्भ होती है, यथा—
“प्लीहानं च यकृन्चैव तदपिष्टाय वर्त्तते ।
क्षोतांसि रक्तवाहीनि तन्मूलानि हि देहिनाम्” ॥३,४॥
आमाशयाद् ब्रजेदूर्ध्वमधः पक्वाशयाद् ब्रजेत् ॥५॥
विदग्धयोर्द्वयोश्चापि द्विधा मार्गं प्रवर्त्तते ।
केचित् सयकृतः प्लीहः प्रवहन्त्यसृजो गतिम् ॥६॥
विदग्ध हुआ रक्त आमाशय से मुख-नासा आदि ऊर्ध्व भाग से प्रवृत्त होता है । विदग्ध हुआ रक्त पक्वाशय से गुद-मूत्रमार्ग-योन आदि अधो भाग से प्रवृत्त होता है । आमाशय पक्वाशय दोनों विदग्ध होने पर रक्त ऊपर और नीचे दोनों मार्गों से प्रवृत्त होता है । कई आचार्य रक्त की गति यकृत और प्लीहा के साथ मानते हैं । (अर्थात् रक्तपित्त में यकृत और प्लीहा—रक्त स्थान भी विदग्ध होते हैं जैसा चरक कहता है) ।
वि० मन्तव्य—दोनों ही कथन सत्य हैं—जो रक्त ऊर्ध्व मार्गों से निकलता है वह आमाशय से आधार मार्ग द्वारा और फुफ्फुसों से श्वास मार्ग द्वारा बाहर आता है और इन मार्गों की भीतरी दीवारों तथा मुखनासा आदि की दीवारों से चू-चू कर बाहर आता है । इसी प्रकार से जो अधोमार्गों से निकलता है वह मलाशय से गुद द्वारा, मूत्राशय से मूत्रमार्ग द्वारा, गर्भाशय से भग द्वारा तथा उक्त मार्गों की भीतरी दीवारों से चू-चू कर बाहर आता है । दूसरा कथन भी सत्य है, क्योंकि यकृत एवं प्लीहा में ही रंजक पित्त-रस को रंगते समय रक्त में मिल जाता है—रस भी क्रोध आदि कारणों से दूषित हुआ रहता है और वह पित्त को भी दूषित कर देता है, और दूषित पित्त रक्त को दूषित कर देता है (दे० श्लो० ३-४) इसलिये यह कथन भी सत्य है कि यकृत एवं प्लीहा से ही रक्तपित्त की गति प्रवृत्ति होती है ॥५,६॥
ऊर्ध्वं साध्यमधो याप्यमसाध्यं युगपद्गतम् ।
ऊर्ध्वगामि रक्तपित्त साध्य है, अधोगामि रक्तपित्त याप्य है, दोनों मार्गों से प्रवृत्त होनेवाला रक्तपित्त असाध्य है ।
“एकदोषानुगं साध्यं द्विदोषं याप्यमुच्यते ।
यत् त्रिदोषमसाध्यं तन्मन्दाग्नेरतिवेगवित् ॥
व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्थानशूनतश्च यत् ।
गतिरूर्ध्वमधश्चैव रक्तपित्तस्य दधिता ॥
ऊर्ध्वं सप्तविधद्वारा द्विद्वारा त्वधरा गतिः ।
सप्तच्छिद्राणि शिरसि द्वे चाधः साध्यमूर्ध्वगम् ॥
याप्यं त्वधोगमं भागौ द्वावसाध्यं प्रपद्यते ।
यदा तु सर्वच्छिद्रेभ्यो रोमकूपेभ्य एव च ॥
वर्त्तते तामसंख्ययां गतिं तस्याद्वारान्तिकीम् ॥”
च० वि० अ० ४॥