सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ ७० ४५ ]
अङ्गुष्ठा का कषाय, नीले कमल की मिट्टी, प्रियंगु, लोघ, सुरमा, कमल का केशर, इनको शर्करा और मधु के साथ पीने पर तीव्र रक्तपित्त का वेग क्षीब्र शांत हो जाता है। "मूलाणि पुष्पाणि च वारिजानां प्रलेपनं पुष्करिणीं मुदश्च ।" चरक ॥३३॥
गायत्रिजम्बुर्जुनकोविदार-
जिरीषरोध्राग्नशास्मलीनाम् ॥३४॥
पुष्पाणि शिग्रोश्च विचूर्ण्य लेहो मध्वन्वितः शोणितपित्तरोगे ।
गायत्री (खैर), जामुन, अर्जुन, कचनार, क्षीरीष, लोघ, विजयसार, सिम्बल और सुहांजना, इनके फूलों का चूर्ण करके मधु के साथ रक्तपित्त रोग में चाटे ॥३४॥
सञ्चौद्रमिन्दीवरभस्मवारि करञ्जवीजं मधुसर्पिषी च ॥३५॥
जम्बुर्जुनाम्रकवथितं च तोयं
दन्तन्ति त्रयः पित्तमसूक् च योगाः ।
कमल की भस्म को पानी में घोलकर मधु के साथ पीये। करंज बीज के चूर्ण को मधु और घृत के साथ चाटे। जामुन-अर्जुन और आम का क्वाथ मधु के साथ पीये। ये तीनों योग रक्तपित्त को नष्ट करते हैं।
वक्तव्य—ये योग कण्ठगत रक्तपित्त में उत्तम हैं, यथा—कफानुबन्धे रुधिरं सपित्तं, कण्ठागते स्याद् प्रथिते प्रयोगः। युक्तस्य युक्त्या मधुसर्पिषोश्च, क्षारस्य चैवोत्पलनालजस्य ॥ चरक ॥३५॥
मूलाणि पुष्पाणि च भातुलुङ्गथाः
पिष्ट्वा पिवेतण्डुलधावनने ॥३६॥
प्राणप्रवृत्ते जलमाश दैयं
सशर्करं नासिकया पयो वा ।
बिजौर के मूल और फूलों को पीसकर चावलों के पानी के साथ पीये। नाक से रक्त बहने पर शर्करा मिश्रित जल नासिका में चढ़ाये या दूध को नासिका से पीये ॥३६॥
द्राक्षारसं क्षीरघृतं पिवेद्वा
सशर्करं चेचुररसं हिमं वा ॥३७॥
द्राक्षा का रस, दूध से निकाली घी, शर्करा के साथ या ईस का शीतल रस नासिका से से पीये।
वक्तव्य—दूषित रक्त निकलने पर ही रक्त को बन्द करना चाहिये, अन्यथा—“रक्तं प्रदुष्टे ह्यवपीड्यन्धे, दुष्टप्रतिश्याय-घिरोविकाराः । रक्तं सपूयं कुणपश्चगन्धः स्याद् प्राणनाशः क्रुमयश्च दुधाः ॥”
चरक किं ७० ५-१६॥
शोतोपचारं मधुरं च कुर्या-
क्षिरोषतः शोणितपित्तरोगे ।
रक्तपित्तरोग में विशेषतः शीतल एवं मधुर चिकित्सा करे।
“वैद्यमुक्तामणिगैरिकाणां मुञ्चुखहेमामलकोदकानाम् ।
मधूदकस्येक्षुरस्य चैव, पानाच्छमं गच्छति स्क्तपित्तम् ॥
धारागृहं भूमिगृहं सुशीतं वनं च रथं जलवातशीतम् । वैद्यमुक्तामणिभाजनानां स्पर्शाश्च दाहे शिशिराम्बु शीताः ॥ चरक ॥
द्राक्षाघृतक्षौद्रसितायुतेन
विदारिगन्धादिविपाचितेन ॥३८॥
क्षीरेण चास्थापनमध्यमुक्तं
हितं घृतं चाप्यनुवासनार्थम् ।
द्राक्षा, घृत, मधु और सिता (शर्करा) मिश्रित विदारी-गन्धादि से सिद्ध किये दूध से रक्त पित्त में आस्थापन वस्ति देना उत्तम है। तथा इन्हीं से सिद्ध किया घृत अनुवासन में उत्तम है ॥३८॥
प्रियङ्गुरोध्राञ्जनगैरिकोत्पलैः
सुवर्णकालीयकरकतचन्दनैः ॥३९॥
सिताश्चवगन्धाभ्युदयष्टिकाह्वयै-
शृणालसौगन्धिकतुरुह्यपेपितैः ।
निरुह्य चैनं पयसा समाश्रिकै-
घृतप्लुतैः शीतजलावसेचितम् ॥४०॥
क्षीरौदनं सुक्तमथानुवासयेद्
घृतेन यष्टोमधुसाधितेन च ।
अधोवहं शोणितमेघ नाशये-
तथाऽतिसारं रुधिरस्य दुस्तरम् ॥४१॥
विरैकयोगे त्वति चैव शस्यते
प्रियंगु, लोघ, सुरसा, गेरु, नीलौत्पल, सुवर्णगेरु, काली-यक, रक्तचन्दन, शर्करा, अश्वगन्धा, मोथा, मुलेहटी, कमल-नाल, सौगन्धिक (कमलमेव) इनको समान भाग लेकर पीसकर घी, मधु और दूध में मिलाकर रोगी को निरुह्य वस्ति देवे। निरुह्य के पीछे शीतल जल से स्नान कराके, दूध और चावल खिलाये। फिर मुलेहटी से सिद्ध किये घृत से अनुवासन दे। यह उपचार अधोगामि रक्तपित्त को, एवं भयानक रक्ताति-सार को नष्ट करता है। विरेचन के अतियोग में भी यह उत्तम है ॥३९-४१॥
वाम्ययश्च रक्तं विजिते बलान्वितः ॥४२॥
निरुह्य एवं अनुवासन से रक्त को शान्त कर लेने पर बलवान् पुरुष को वमन कराना चाहिये।
वक्तव्य—अधोगामि रक्तपित्त में वमन कराने से फिर रक्त का भय नहीं रहता ॥४२॥
एवंविधा उत्तरवस्तयश्च
मूत्राशयस्थे रुधिरं विवेयाः ।
वस्तिस्था या मूत्रक्षोत से प्रवृत्त रक्त में-आस्थापन, अनुवा-सन की भांति उत्तर वस्तियां देनी चाहिये।
प्रवृत्तरक्तोषु च पायुजेषु
कुर्याद्भिधानं खलु रक्तपैतम् ॥४३॥