सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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धन्वानामस्य लिखात् मधुना मृगपक्षिणाम् । सखोद्ग्रथिते रक्ते लिखात् पारावतं शकृतम् ॥३०॥ रक्तातिसारं में कहे हुए योगों को यहाँ पर भी बरते । शुद्धेऽङ्काण्डमापोऽथ नवे कुम्भे हिमाभ्रमसा ॥२१॥ योजयित्वा क्षिपेद्वात्रावाकाशे सोऽप्यलं तु तत् । प्रातः क्षतं क्षौद्रयुतं पिबेच्छोणितपित्तवात् ॥२२॥ इन्द्रकाण्ड (गन्ने के टुकड़े) को छीलकर इसको कुचलकर एक नये घड़े में डालकर शीतल जल भर देवे । इस घड़े को रातभर निर्मल आकाश में खुला रख देवे । प्रातःकाल इसको छानकर इसमें नीलोफर का चूर्ण और मधु मिलाकर पीये, इससे रक्तपित्त नष्ट होता है ॥२१, २२॥ पिबेच्छीतकषायं वा जम्बूवाऽप्राजुनसंभवम् । लघुम्बरफलं पिध्वा पिबेत्तदसमेव वा ॥२३॥ जामुन, आम और अर्जुन का शीत कषाय पीये अथवा गूल के फल को पीसकर उसका रस पीये ॥२३॥ त्रपुषीमूलकल्कं वा सखौद्ग्रं तण्डुलाम्बुना । पिबेदक्षसमं कल्कं यष्टीमधुकमेव वा ॥२४॥ चन्दन मधुकं रोधमेवमेव समं पिबेत् । करञ्जबीजमेवं वा सिताक्षौद्रयुतं पिबेत् ॥२५॥ मज्जानमिक्कुदस्यैवं पिबेन्मधुकसंयुतम् । मुखोष्णं लवणं बीजं कारञ्जं दधिमस्तुना ॥२६॥ पिबेद्वाऽपि श्यहं मत्स्यं रक्तपित्ताभिपीडितः । रक्तपित्तहराः ग्रस्ताः षडेते योगसत्तमाः ॥२७॥
छै योग—(१) ककड़ी के मूल का कल्क मधु मिलाकर चावल के पानी के साथ पीये । (२) मुलेहटी का चूर्ण एक कर्ष-मधु चावल के पानी के साथ पीये । (३) चन्दन, मुलेहटी, लोच को समान मात्रा में मधु और तण्डुलोदक से पीये । (४) करंजबीज का चूर्ण मधु और शर्करा के साथ पीये । (५) हंगुदी की मज्जा को मुलेहटी के साथ मिलाकर मधु और शर्करा के साथ पीये । (६) करंज का बीज, लवण इनको थोड़ा गरम करके दही के मस्तु (पानी) के साथ रक्तपित्त से पीडित रोगी तीन दिन पीये । छै उत्तमयोग रक्तपित्त नाशक है ॥२४-२७॥
पथ्याश्चैवावपीडेषु प्राणतः प्रसृत्येऽस्मृजि । नाक से रक्त बहने पर ये छै योग अवपीडन रूप में (नस्य रूप से) बरतने हितकारी हैं । अतिनिश्चूतरक्तो वा क्षौद्रयुक्तं पिबेदस्फु । यकृद्वा भक्षयेदाजमामं पित्तसमायुतम् ॥२८॥ जिस मनुष्य का बहुत सा रक्त निकल गया हो, वह रक्त (उरुत्त-ताष्कालिक) को मधु के साथ मिलाकर पीये । अथवा
१-कषाययोगाय इहोपदिष्टास्ते चावपीडे भिषजा प्रयोज्याः । प्राणात् प्रवृत्तं रधिरं सपित्तं यदा भवेत् निःसृतदुष्टोषम् ॥३०॥
बकरी के कच्चे ही यकृत को पित्त के साथ खाये । (रक्त हरिण शश-मृग-बकरी आदि का ले) । गोऽव्यजामहिषीक्षीरैः जीवनीययुतैस्तथा । शशैणदक्ष- मार्जरमहिषाव्याजशोणितैः सद्यःकैः मृदितैः वस्तिः जीवादाने प्रवश्यते ॥३०॥
पलाशवृक्षस्वरसे विषक्वं सर्पिः पिबेत् क्षौद्रयुतं सुशोतम् । वनस्पतीनां स्वरमैः कृतं वा सज्जरं क्षीरघृतं पिबेद्वा ॥२९॥ द्राक्षासुग्रीणाण्यथ पद्मकं सिता पृथक्पलाजान्युदके समाबपेत । स्थितं निशां तदुधिरामयं जयेत् पीतं पयो वाऽम्बुसमं हितानिः ॥३०॥ तुरङ्गवर्चःस्वरसं समाश्रिकं पिबेत् सिताक्षौद्रयुतं वृषस्य वा । लिहेत्तथा वास्तुक्बीजचूर्णं क्षौद्रान्वितं तण्डुलसादृयं वा ॥३१॥ लिह्यारुचं लजाऽज्जनवर्णमेक- मेवं सिताक्षौद्रयुतां तुगाख्याम् । दाक्षां सितार् तित्करोहिणीं च हिमाम्बुना वा मधुकेन युक्ताम् ॥३२॥ पथ्यामहिर्षा रंजनीं घृतं च लिह्यात्तथा शोणितपित्तरोगी ।
डाक के स्वरस में पकाये घृत को ठण्डा करके मधु के साथ पीये । बरगद-पीपल आदि वनस्पतियों के स्वरस में दूध से निकले घृत को सिद्ध करके शर्करा के साथ पीये । द्राक्षा, खस, पद्माल, सिता (शर्करा), प्रत्येक एक पल लेकर पानी में भिगो देवे । रातभर पड़ा रहने दे । खबरे छानकर पीने से रक्त-पित्त शान्त होता है । अथवा दूध में समान पानी मिलाकर हितकारी भोजन करते हुए पीये । घोड़े की लीद के स्वरस में मधु मिलाकर पीये । वासे का स्वरस शर्करा और मधु के साथ पीये । बधुवे के बीज का चूर्ण या चौलाई के बीज के चूर्ण को मधु के साथ चाटे । लजा, अंजन (सुरमा) इनका चूर्ण या वंशलोचन को शर्करा और मधु के साथ चाटे । द्राक्षा, शर्करा, कुटकी को मुलेहटी के साथ मिलाकर शीतजल से पीये । हरड, अहिर्षा (जटामांसी), हल्दी, घी, इनको रक्त-पित्त रोगी चाटे । (यह योग कण्टगामि रक्तपित्त में उत्तम है) । "पलाशवृक्षस्वरसेन सिद्धं तस्यैव कल्केन मधुद्रवेण । लिह्याद् घृतम्"—चरक ॥२६-३२॥
वासाकषायोल्लम्भस्यिषकु- रोप्राञ्जनाम्भोरुहकेशराणि ॥३३॥ पीत्वा सिताक्षौद्रयुतानि जहात् पित्तासूजो वेगमुदीर्णमास ।
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