सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 797, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ ४६ ] मिश्रित जांगल मांसरस, जो और चावल, मटर ये सदा मूछों में हितकारी हैं ॥१६॥
भुजङ्गपुष्पं मरिचान्युशीरं कोलस्य मध्यं च पिबेत् समानि । शीतेन तोयेन बिसं मुणालं क्षौद्रेण कृष्णां सितया च पथ्याम् ॥१७॥
नागकेसर, मरिच, खस, बेर की मज्जा, इनको समान भाग लेकर शीतलजल से पीये । बिस, कमलनाल इनको शीतल जल से पीये । पिप्पली को मधु के साथ चाटे, हरड को शर्करा के साथ लाये ॥१७॥
कुर्याच्च नासावदनावरोधं क्षौरं पिबेद्वाऽप्यथ मानुषीणाम् । मूच्छूर्णं प्रसक्तं तु शिरोविरेकै- ज्येदभीर्दणं वमनैश्च तीक्ष्णः ॥१८॥
मूच्छूर्ण के समय नाक और मुख को बन्द करके श्वास को रोके । धावन (खी का तूष) को पीये, (नाक से या मुख से) । मूच्छूर्ण के निरन्तर बना रहने पर शिरोविरेचन देवे, या तीक्ष्ण वमन देकर शान्त करे । (खीस्तन्य बहुत शीतल है) ॥१८॥
हरीतकीवार्थशुतं घृतं वा धात्रीफलानां स्वरसैः कृतं वा । द्राक्षासितादाडिमलाजवन्ति शीतानि नीलोत्पलपद्मवन्ति ॥१९॥
पिबेत् कषायानि च गन्धवन्ति पित्तञ्चरं यानि शर्मं नयन्ति । हरड के कषाय में सिद्ध किया या आंवलों के स्वरस में सिद्ध किया घृत पीये । पित्तञ्चर को जो कषाय शान्त करते हैं (श्रीपर्णी आदि कृत), उन कषायों में द्राक्षा, सिता, अनारदाना तथा लाजवन्ति प्रचुर मात्रा में मिलाकर शीतल करके पीये या नीलोफर और कमल मिलाकर, अथवा सुगन्धित करके इन कषायों को पीये ॥१९॥
प्रभूतदोषस्तमसोऽतिरेकात् संमूछितो नैव विवृध्यते यः ॥ संन्यस्तसंज्ञो भूशदुहिच कित्तयो ज्ञेयस्तदा बुद्धिमता मनुष्यः दोष की अधिकता से मूछित हुआ मनुष्य तम के अतिरेक के कारण जब जागृत नहीं होता, तब उसे संन्यस्त (संन्यास) संज्ञावाला जानना, यह कष्टसाध्य है, ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य जाने । चरक-
धाग्देहमनसां चेष्टामाक्षिप्यातिबला मलाः । संन्यस्तन्यबलं जन्तुं प्राप्यायतनमाश्रिताः ॥ स ना संन्याससंन्यस्तः काष्ठिभूतो मृतोपमः । प्राणैः विमुच्यते शीर्षं मूक्त्वा सद्यः फलां क्रियाम् ॥२०॥
यथाऽऽमलोष्ठं सलिले निषिक्तं समुद्ररेदाश्च विळीनमेव ॥२१॥
उत्तरतन्त्रम्
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तद्वचिकित्सेत्स्वरया भिषक्- मस्वेदनं मृत्युवशं प्रयातम् । जिस प्रकार पानी में डूबते हुए मिट्टी के कच्चे ढेले को पानी से घुलने से पूर्व ही बचाना होता है, उसी प्रकार प्रस्वेद रहित, मृत्यु के वश में जाते हुए संन्यास रोगी की वैद्य शीघ्रता से चिकित्सा करे । चरक—
दुर्गोऽभ्यसि यथा मज्जदभाजनं त्वरया बुधः । यद्विषात्तलमप्राप्तं तथा संन्यासपीडितम् ॥२२॥
तीक्ष्णान्नानाभ्यञ्जनधूमयोगे- स्तथा नखाभ्यन्तरतोत्रपातैः ॥२३॥
वादित्रगीतानुन्यैरपूवै- विषदृनेर्गुप्तफलावधर्षैः । इसके लिये तीक्ष्ण भंजन, तीक्ष्ण अभ्यंजन, तीक्ष्णधूम देवे, नखों के बीच में सूई चुभोये । गाना, बजाना, सान्त्वना आदि से, हिलाने-जुलाने से, कौंच को शरीर पर रगड़कर चेतना में लाये ।
अंजनान्यवगीडाश्च धूमः प्रथमनानि च । सूचीभिस्तोदनं शस्त्रैः दाहः पीडा नवान्तरे ॥ लुब्धनं केशलोभानां च दन्तैर्दशनमेव च । आत्मगुप्तावधर्षश्च हितोत्तस्यावबोधने ॥ चरक ॥२२॥
आभिः क्रियाभिश्च नलव्यसंज्ञः सानाहलालाइवसनश्च वधर्षैः ॥२३॥
यदि उपर्युक्त क्रियाओं को करने से भी चेतना न आये, तो रोगी को आनाह, लालछाव, श्वास हो तो उसकी चिकित्सा न करे ॥२३॥
प्रवृद्धसंज्ञं वमनानुलोभ्यैस्तीक्ष्णैर्विशुद्धं लघुपथ्यमुक्तम् । फलत्रिकैश्चित्रकनागराल्पैस्तथाऽश्मजाताज्जतुनः प्रयोगैः ॥ सशकैरैर्मांसमुपक्रमेत विशेषतो जीर्णघृतं स पाय्यः ॥२४॥
तीक्ष्ण अंजन आदि से संज्ञा आ जाने पर तीक्ष्ण वमन, विरेचन से शोधन करके पेयादि क्रम से लघु पथ्य भोजन देकर, त्रिफला, चित्रक, सोंठ, शर्कराबहुल, एवं शिलाजतु के प्रयोगों से एक मास तक चिकित्सा करे । विशेषतः दस साल पुराना घृत पिळाना चाहिये ।
संमूछितानि तीक्ष्णानि मद्यानि विविधानि च । प्रभूतकटुयुक्तानि तस्यास्यै गालयेन्मुहुः ॥ मातुलुं गरखं तद्वन्महोपधसमायुतम् । तद्वत्स्वीवीरकं दद्यात् युक्तं मद्यात्मकौजिकैः ॥ हिगुणसमायुक्तं यावत्संश्रयबोधनम् । प्रवृद्धसंज्ञमज्ञैश्च लघुभिस्तमुपाचरेत् ॥ बिस्मापतैः स्मारणैश्च प्रियश्रुतिभिरैव च ।