सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४७ ]
पटुभिर्गीतवादित्रशब्दैः चित्रैश्च दर्शनैः ॥ संसनोत्त्वेखनैः धूमैः अंजनैः कवलप्रहैः ॥ शोणितस्यावसेकैश्च व्यायामोद्वर्षणैस्तथा ॥ प्रवृद्धसंज्ञं मतिमाननुवन्वमृणक्रमेत् । तस्य संरक्षितव्यं हि मनः प्रलयहेतुतः ॥ स्नेहस्वेदोपपन्नानां यथादोषं यथाबलम् । पंचकर्माणि तथा मूच्छांयेषु मदेषु च ॥ त्रिफलयाः प्रयोगो वा समुत्तुक्षोदशकर्तः । शिलाजतुप्रयोगो वा प्रयोगः पयसोऽपि वा ॥ पिप्पलीनां प्रयोगो वा प्रयोगश्चित्रकस्य वा । रसायनानां कोभस्य सर्पिषो वा प्रशस्यते ॥ च० ॥२४॥ यथास्वर्चं च ज्वरद्वान्ति कषायान्युपयोजयेत् । सर्वमूच्छांपरीतानां विषजायां विषापहम् ॥२५॥ दोषों के उनके अपने अपने अनुसार ज्वरनाशक कषाय सब प्रकार की मूच्छां में बरते । विषजनित मूच्छां में विषनाशक चिकित्सा (नस्य, अंजन आदि) करे ॥२५॥ इति श्रीसुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सान्तरे शोषप्रतिषेधो नाम (अष्टमोऽध्यायः, आदितः) षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४६॥
सप्तचत्वारिंशतमोऽध्यायः
अथातः पानात्ययप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ अब इसके आगे पानात्ययप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे— जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥ मद्यमुष्णं तथा तीक्ष्णं सूक्ष्मं विशदमेव च । रूक्षमाशुकरं चैव व्यवायि च विकारि च ॥३॥ मद्य उष्णं, तीक्ष्णं, सूक्ष्मं, विशदं, रूक्षं, अशुकारी, व्यवायी और विकारी है । वक्तव्य—आशुकारी शीघ्र कार्य करनेवाला । व्यवायी-सारे शरीर में फैलकर फिर पाक होता है । विकारी-सन्विवन्नों को ढीला करता है । चरक में—लघु और अम्ल ये दो गुण अधिक पड़े हैं, दस गुण मद्य के हैं, दस गुण ये ही विष में हैं । इनसे विपरीत दस गुण ओज में हैं, यथा—गुरुशीतं मृदुरुच्छृणं बहलं मधुरं स्थिरम् । प्रसन्नं पिच्छलं स्निग्धमोजो दशगुणं स्मृतम् ॥ ओज के दस गुण गाय के दूध में हैं । इसलिये गाय का दूध ओज को बढ़ाता है, मद्य ओज को कम करता है ॥३॥ औष्ण्याच्छीतोपचारं तत्तेक्ष्ण्याद्भ्रन्ति मनोगतिम् । पिशत्यवयवान् सौन्दर्याद्वैशद्यात्कफशुक्रानुत् ॥४॥ मारुतं कोपयेद्वैद्यादाशुत्वाच्चामुसर्कतु । हर्षदं च व्यवायिस्वाद्विकारिस्वादिस्सर्पति ॥५॥
मद्य के उष्ण होने से (पित्त प्रकोपक होने से) शीतल उप- चार किया जाता है । तीक्ष्ण होने से मन की गति को नष्ट करता है । सूक्ष्म होने से अवयवों में घुसता है, विशद होने से कफ और शुक्र को नष्ट करता है । रूक्ष होने से वायु को कुपित्त करता है, आशु होने से शीघ्र कार्य करता है । व्यवायी होने से हर्ष देता है, विकारी होने से सारे शरीर में फैलता है । मद्य हृदयमाविश्य स्वगुणैरोजसो गुणान् । दशभिर्दश संक्षोभ्य चेतो नयति विक्रियाम् ॥ चरक ॥४,५॥ तदमूलं रसतः प्रोक्तं लघु रोचनदीपनम् केचिन्नवणवज्यंस्तु रसानन्नादिशन्ति हि ॥६॥ मद्य में अम्लरस प्रधानता से रहता है, अम्लरस लघु, रोचक और अग्निदीपक है । कई आचार्य लवण रस को छोड़कर शेष पांचों रस मद्य में मानते हैं । (मद्यस्य षड्स्वस्वेपि व्यक्तोऽम्लरस उच्यते) ॥६॥ स्निग्धस्तदन्मैर्मांसैश्च भदयेऽच सह सेवितम् । भवेदायुः प्रकर्षाय बलायोपचयाय च ॥७॥ स्निग्ध अन्नं, स्निग्ध मांस और स्निग्ध भक्ष्यों के साथ सेवन किया यह मद्य आयु को बढ़ाने के लिये, बल की वृद्धि के लिये होता है । हर्षमृजो मदं पुष्टिमारोग्यं वीरुषं परम् । युक्त्या पीतं करोत्याशु मद्यं मदसुखावहम् ॥ रोचनं दीपनं हृद्यं स्वरवर्णप्रसादनम् । प्रीणनं वृंहणं बल्यं भयशोकश्रमापहम् ॥ च० ॥७॥ काम्यता मनसस्तुष्टिर्धैर्यं तेजोऽतिविक्रमः । विधिवत् सेव्यमाने तु मद्ये सन्निहिता गुणाः ॥८॥ मद्य का विधिवृत्क सेवन करने से कमनीयता, मन की प्रसन्नता, धैर्य, तेज, अति विक्रम (पराक्रम) ये सम्यक् प्रकार से प्राप्त होते हैं । (तेज-प्रभा) ॥८॥ तदेवान्नमन्नमन्नं सेव्यमानममात्रया । कायाग्निना ह्यग्निसमं समेत्य कुहते मदम् ॥९॥ यही अग्नि के समान मद्य अन्न के बिना, मुखं व्यक्ति के सेवन करने से, या अतिमात्रा में सेवन करने पर जठराग्नि के साथ मिलकर मद को करता है । अहितस्यातिमात्रस्य पीतस्य विधिवर्जितम् । किन्तु मद्यं स्वभावेन यथेवान्नं तथा स्मृतम् ॥ अयुक्तियुक्तं रोगाय युक्तियुक्तं यथाऽमृतम् । चरक ॥९॥ मदेन करणानां तु भावान्यत्वे कृते सति । निगृह्णमपि भावं स्वं प्रकाशीकुसुतेऽवशः ॥१०॥ मद्य के कारण मन बुद्धि और इन्द्रियों के स्वरूपों के बदल जाने पर मनुष्य अपने छिपे हुए अभिप्राय को भी मद के अधीन होकर स्वयं प्रकाशित कर देता है ॥१०॥