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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४७ ]

उत्तरतन्त्रम्

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व्यवस्थश्च मदो ज्ञेयः पूर्वं मध्योऽथ पश्चिमः । पूर्वं वीर्यरतिप्रतिहर्षभाष्यादिवर्धनम् ॥११॥ प्रलापो मध्यमे मोहो युक्तायुक्तक्रियास्तथा । विसंज्ञः पश्चिमे रोते नष्टकर्मक्रियागुणः ॥१२॥ मद्य की तीन अवस्थायें हैं, पूर्ववस्था, मध्यमावस्था और पश्चिमावस्था । मद्य की पूर्वावस्था में—वीर्य (उत्साह), रति, हर्ष, प्रीति, हर्ष-मुष्टि, भाष्य-वक्तृत्व आदि बढ़ते हैं । मद्य की द्वितीयावस्था में—मोह, कभी ठीक क्रियायें और कभी अयुक्त-अशुद्ध क्रियायें होती हैं । मद्य की पश्चिमावस्था में कर्म, क्रिया, गुण नष्ट होकर रोगी जमीन पर सो जाता है । वक्तव्य—“बुद्धिस्मृतिप्रतिकरः सुखश्च पानान्ननिद्राश्चि- द्दिहेतुः । संपाठगोतस्वरवर्धनश्च प्रोक्तोऽतिरभ्यः प्रथमो मदो हि ॥ अयत्तकुद्धिस्मृतिवाग्विचेष्टः सोन्मत्तलीलाकृतिरप्रशन्तः । आत्म्यनिद्राभिहतो मुदुश्च मध्येन मत्तः पुरुषो मदेन । गच्छेद- गम्याश्च गुरुच मन्वेत् खादेदभक्ष्याणि च नष्टसंज्ञः । व्रूयाच्च गृह्णानि हृदि स्थितानि मत्तो मदेन प्रबरेण मर्यः” ॥११, १२॥ शैलैर्मिकानलपिप्ताश्च स्निग्धान्मात्रोपसेविनः । पानं न बाधतेऽत्यर्थं विपरीतांस्तु बाधते ॥१३॥ कफप्रकृति, अल्प पित्तवाले, स्निग्ध शरीर, मात्रा में सेवन करनेवालों को मद्यपान अधिक कष्ट नहीं देता । इन से विपरीत पिप्ताधिक, रूक्ष, अमात्रा में सेवन करनेवालों को पीड़ा पहुँचाता है ॥१३॥ निर्भक्तमेकान्तत एव मद्यं निषेध्यभाणं मनुजेन नित्यम् । उत्पादयेत् कष्टतमानं विकारान् नापादयेच्छापि शरीरभेदम् ॥१४॥ भोजन के बिना अकेला ही सेवन किया नित्य प्रति मद्य मनुष्य में भयानक रोगों को तथा मृत्यु को उत्पन्न करता है ॥ कुट्टेन भीतेन पिपासितेन शोकाभितमेन बुभुक्षितेन । व्यायामभाराधवपक्षितेन वेगावरोधाभिहतेन चापि ॥१५॥ अत्यन्तभक्ष्यावततोदरेण साजीर्णमुक्तेन तथाऽवलेन । उष्णाभितमेन च सेव्यमानं करोति मद्यं विविधानं विकारान् ॥१६॥ कुट्ट, डरे हुए, प्यासे, शोक से पीड़ित, भूखे, व्यायाम- मार और मुसाफरी से थके, मूत्रादि के वेग को रोकने से पीड़ित मनुष्य द्वारा सेवन किया हुआ मद्य भिन्न-भिन्न रोगों को उत्पन्न करता है । अतिशय अरुद्ध के खाने से आहुत उदरवाले मनुष्य

के, अजीर्ण में भोजन करके सेवन किया हुआ मद्य, निर्बल व्यक्ति से पीया मद्य, गरमी से अभितत अवस्था में सेवन किया मद्य नानाप्रकार के रोगों को उत्पन्न करता है ॥१५, १६॥ पानात्ययं परमदं पानाजीर्णमथापि वा । पानविभ्रममुपचं च तेषां बद्ध्यामि लक्षणम् ॥१७॥ पानात्यय, परमद, पानाजीर्ण, भयानक पानविभ्रम ये भिन्न-भिन्न रोग होते हैं, इनके लक्षण कहता हूँ । वि० मन्तव्य—पानात्यय-यह रोग मादक द्रव्य के अधिक सेवन से होता है । परमद—यह रोग मद (नशा) के अधिक हो जाने से होता है । पानाजीर्ण—यह रोग मद्य-मादक द्रव्य के अपच से होता है और पानविभ्रम—मद्य के मिथ्यायोग से होता है ॥१७॥ स्तम्भभाङ्गमर्दहृदयग्रहतोदकम्पाः पानात्ययेऽनिलकृते शिरसो रजश्च । स्वेदप्रलापमुखशोषणदाहमूर्च्छाः पिप्तात्मके वदनलोचनपीतता च ॥१८॥ श्लेष्मात्मके वमशुशोतिकफप्रसेकाः सर्वात्मके भवति सर्वविकारसंपत् । वातजनित पानात्यय में स्तम्भता, अंगों का टूटना, हृदय का पकड़ा जाना, चुभने की सी दर्द, कफ, शिर में दर्द होता है । पित्तजनित पानात्यय में स्वेद, प्रलाप, मुखशोष, दाह, मूर्च्छा आँख और मुख में पीलापन होता है । कफजनित पानात्यय में—वमन, शीत, कफ का प्रसेक होता है । सन्निपातजन्य-पानात्यय में—सब प्रकार के विकार (लक्षण) होते हैं ॥१८॥ ऊष्माणमङ्गगुरुतां विरसाननन्तवम् श्लेष्माधिकत्वमरुचिं मलमूत्रसङ्गम् ॥१९॥ लिङ्गं परस्य तु मदस्य वदन्ति तज्ज्ञा- स्तृष्णां रुजां शिरसि सन्धिषु चापि भेदम् । परमद में—उष्णिमा, अंगों में भारीपन, मुख में विरसता, कफ की अधिकता, अरुचि, मल-मूत्र का अवरोध, तृष्णा, शिर-में दर्द, सन्धियों में भेद होते हैं, परमद के ये लक्षण होते हैं ॥ आधमानमुद्गिरणमम्लरसो विदाहो- ऽजीर्णस्य पानजनितस्य वदन्ति लिङ्गम् ॥२०॥ ज्ञेयानि तत्र भिषजा सुविनिश्चिवानि पिप्तप्रकोपजनितानि च कारणानि । पानाजीर्ण में—आधमान, वमन, अम्लरस, विदाह ये पानाजीर्ण के लक्षण होते हैं । इसमें पिप्तप्रकोपजनित लक्षणों को वैद्य निश्चितरूप में जानें ॥२०॥ हृद्वागत्रतोद्वमशुश्रवरकण्ठधूम- मूर्च्छाकफज्वरणमूर्धरजो विदाहः ॥२१॥ द्वेषः सुरात्रविच्छेत्तु च तेषु तेषु तं पानविभ्रममुगन्त्यखिलेन धीराः । पानविभ्रम—हृदय और शरीर में चुभने का-सा दर्द,