सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 800, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें७४४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४७ ]
वमन, ज्वर, कण्ठ में घूमप्रतीति, मूँछों, कफ का खाव, शिर में दर्द, विदाह, सुरा एवं अन्न की बनावटों से द्रेष, इसको विद्वान् लोग पानविभ्रम सम्पूर्ण रूप में कहते हैं ॥२१॥
हीनोत्तरौष्टमतिशीतमसन्ददाहं तैलप्रभास्यमति (पि) पानहर्तं विजहात् ॥२२॥
जिह्वाघृद्धन्तमसितं त्वथवाऽपि नीलं पीते च यस्य नयने रुधिरप्रभे च ।
अधरोष्ठ अन्दर की दबा हुआ हो, रोगी बहुत ठण्डा हो या तीव्र दाह हो, मुख पर तैल की चमक हो तो मध्यपान से पीड़ित रोगी की चिकित्सा न करे । जिह्वा-ओठ दाँत काले अथवा नीले हो गये हों, आँखें लाल या पीली हो गई हों, वैसे मध्यपान रोगी को भी असाध्य समझे ॥२३॥
हिक्काज्वरी वमशुधेपशुपार्श्वशूलाः कासभ्रमावपि च पानहर्तं भजन्ते ॥२३॥
उपद्रव-हिक्का, ज्वर, वमन, कम्पन, पार्श्वशूल, कास, भ्रम ये पान से पीड़ित रोगी को होते हैं ॥२३॥
तेषां निवारणमिदं हि मयोच्यमानं व्यक्ताभिधानमखिलेन विधि निबोध । मुष्टसे कहीं हुई इसकी चिकित्सा स्पष्ट लक्षणों के साथ सम्पूर्ण रूप में सुनो ।
भिन्नं तु चुकमरिचार्द्रकदीप्यकुष्ठ- सौवर्चलायुतमलं पवनस्य शान्त्यै ॥२४॥
पृथ्वीकदीप्यकमहौषधहिङ्कुभिर्वा सौवर्चलेन च युतं वितरेत् सुखाय ।
वातजनित पानात्यय की शान्ति के लिये-चुक, मरिच, आर्द्रक, अजवायन, कूठ, ईषसौवर्चल युक्त मद्य देवे । पृथ्वी का (बड़ी इलायची), अजवायन, सौठ, हींग सौवर्चल युक्त मद्य देवे ॥२४॥
आम्रातकाश्रफलदाडिममातुलुङ्गोः कुर्याच्छुभान्यपि च पाडवपानकानि ॥२५॥
सेवेत वा फलरसोपहितान् रसादी- नानूपवर्गपिशितान्यपि गन्धवन्ति ।
आम्रातिक (आमड़ा), आम, अनार, बिजौरा इनसे बनाये उत्तम पाडव पानक देवे । बिजौरा के रस से मिश्रित मांवरस, यूष आदि का, प्रभूत हींग-जीरकवाले आनूपवर्ग (कूलचरादि वर्ग) के मांछों का सेवन करे ।
पाडव-पानक—“युतमितुविकारेण क्वथितं चूतजं फलम् । घृतशुण्ठीतिलयुतं विज्ञं यो घनपाडवः” ॥२५॥
पिचात्मके मधुरवर्गकषायमिश्रं मद्यं हितं समधुशर्करमिष्टगन्धम् ॥२६॥
पिचाजन्म मदात्यय में काकोल्यादि मधुरवर्ग (गिलोय को छोड़कर) से मिश्रित, मधु, शर्करा एवं मनपसन्द युक्त गन्ध-वाला मद्य हितकारी है ॥२६॥
पीत्वा च मध्यमपि चैतुरसप्रगाढं निःशेषतः क्षणमवस्थितमुल्लिखेत् च ।
लावैणतितिरिरसांश्च पिबेदनम्लान् मौद्गान् सुभाय सघृतान् ससितांश्च यूषान् ॥
मद्य में ईख का रस (अभाव में गुड़) प्रचुर मात्रा में मिलाकर पीये, फिर कुछ देर रुककर इसको सम्पूर्ण रूप में वमन कर देवे । अम्लरस रहित-बटेर, हरिण तीतर के मांस को, घृतयुक्त मृग के यूर्षों को सुख के लिये पीये ॥२७॥
पानात्यये कफकृते कफमुल्लिखेत् मद्येन त्रिम्बिबिदुलोचकसंयुतेन ।
सेवेत तिक्तकटुकांश्च रसानुदारान् यूषांश्च तिक्तकटुकोपहितान् हिताय ॥२८॥
कफजनित पानात्यय में कन्दूरी, विदुल के स्वाध से मिश्रित मद्य द्वारा कफ का वमन करे । जांगल मेदयुक्त मांस रसों को तिक्त कटु के साथ सेवन करे । दुरालभादि तिक्त, पिप्पल्यादि कटुद्रव्यों से मिश्रित यूर्षों का सेवन करे ॥२८॥
पथ्यं यवात्रविकृतानि च जाङ्गलानि इलेष्वमनमन्यदपि यच्छ निरत्ययं स्यात् ।
जो के बने नाना प्रकार के मध्य, जांगलमांस, कफनायक एवं निर्दोष जो अन्य वस्तुयें हों, वे भी उत्तम हैं ।
कुर्याच्छ सर्वमथ सर्वभवे विधानं द्रन्द्द्रोद्भवे द्रयमवेदय यथाप्रधानम् ॥२९॥
सन्नपातज मद्य विकार में सब द्रव्यों को मिलित, द्रन्द्द्रज में दो द्रव्यों को देखकर योगप्रधान (जो द्रव्य प्रधान) हो, उसकी प्रथम चिकित्सा करे ॥२९॥
सामान्यमन्यदपि यच्छ समप्रमध्यं वदयामि यच्छ मनसो मदकृतं सुखं च ।
दूसरी भी जो सामान्य मन को प्रसन्न करनेवाली है, सम्पूर्ण रूप में सब अवस्थाओं में सुखदायक हैं, उस चिकित्सा को कहता हूँ ।
त्वङ्नागपुष्पमगधैलमधुकधान्यैः श्लक्ष्णैरजाजिमरिचैश्च कृतं समासैः ॥३०॥
पानं कपित्थरसवारिपरुषकाद्व्यं पानात्ययेषु विधिवत्त्वतमन्वरान्ते ।
होवेरपदमपरिपेठवसंप्रयुक्तैः पुष्पैर्विलिप्य करवीरजलोद्भवेश्च ॥३१॥
पिष्टैः सपद्मकयुतैरपि सारिबाद्यैः सेकं जलेश्च वितरेदमलैः सुरीतैः ।
त्वक्पत्रचोचमरिचैलभुजङ्गपुष्प- श्लेष्मातकप्रसववलकगुडैरुपेतम् ॥३२॥
प्राक्षाणुतं हृतमलं मद्रिरामयार्तै- स्तत्पानकं शुचि सुगन्धि नरैनिषेव्यम् ।