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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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वैत्तिक, कफल, सननिपातज, परमद, पानाजीण, पानविभ्रम-यं

सात रोग) ।४२॥

पठ्चेन्द्रियाथेविषया खदुपानयोगा

हयाः खखाश्च मनसः सततं निषेन्याः।

पानात्ययेषु विकटोरुनितस्बवस्यः

पीनोन्नतस्तनभरानतमध्यदेशाः ॥४३॥। प्रौढाः खियोऽभिनवयोवनपीनगाज्यः

सेव्याश्च पश्चविषयातिशयस्वभावाः॥४४॥

कान-नेत्र आदि पांच इन्द्रियों के शब्द्‌ रूप आदि पांच

विषयों का, मृदुपानयोग (पेष्टिक, गौडी, माध्वीक आदि हल्के

सुश्रतंहिता [ अ० ४७ ध्रवं तथा मयहतस्य देहिनो

भवेत्‌ प्रसादस्तत एव नान्यतः ॥४८॥

जिस प्रकार राजा से दण्डित व्यक्ति की प्रसन्नता राजा $ बिना किसी दूसरे से नहीं हो खकती, उसी प्रकार मदे पीद्ित मनुष्य की प्रसन्नता मद्यसेदहीहोती दहै, ओर किसी

दूसरी वस्तु से नदीं होती ।

(मदयोत्थानां च रोगार्णा मद्यमेव प्रत्राघकम्‌? । च० | ।४८॥ विच्छिन्नमद्यः सहसा योऽतिमद्यं निषेवते ।

तस्य पानास्ययोष्िष्टा विकाराः संभवन्ति हि ॥४९॥ मद्यपान को छोडकर जो मनुष्य फिर सहसा मदय का

मद्य), हृदय के ल्यि प्रिय, सुखकर, मानसिक विषयों का | अतिपान करता हे, उस मनुष्य को पानात्यय मे कदे (ध्वंसकं

निरन्तर सेवन करना चाहिये । पानात्ययाों म- विशार ऊख

एवं नितम्बवाली, पुष्ट एवं उन्नत स्तनो के भारसे मध्य

परदेश में की (श्लीण उदरवाली), उठते हए यौवन से भारी

शरीरवाली, शब्द्‌-रूप~रखादि ¶च विषयों के आनन्द लेनेवारी

प्रोढ खियों का सेवन करे ।४२,४४॥

पिवबेद्रखं पुष्पफरोद्‌भवं वा

सितामधूकत्रिसुगन्धियुक्तम्‌ ।

संचृण्यं संयोऽय च नागपुष्पे-

रजाजिकृष्णामरिचैश तुल्यः ॥४५॥

कूष्माण्ड के स्वरस भ-का, महृआ, दाल्चीनी,

इलायची, तेपत्र, नागकेसर, जीरा, पिपली, मरिच, इनका

चृणं मटी प्रकार करके परस्पर समान मात्रा मे मिाकर पीये ॥ वषाभूयष्ट याहमधूकराक्षा- त्वक्नवुदाराङ्करजीरकाणि। द्राक्षं च कृष्णामथ केञरं च हीरे समारोख्य पिवेत्‌ सुखेप्सुः ॥४६॥ पुननवा, सुेहटी, महुभा, कख, दाल्चीनी, कचनार के

कोमल पत्ते, जीरा, द्राक्षा, पिप्यली, नागकेसर इनको दुघ में

घोलकर सुख चाहनेवाटा मनुष्य पीये ॥४६॥ भवेच्च मयेन तु येन पातितः

प्रकामपीतेन सुरासवादिना ।

तदेव तस्मे विधिवत्‌ प्रदापये- `

द्विपयये भरंगमवरयस्च्छति ॥४७॥

जिस सुरा आसव आदि मद्य को बहुत अधिक मात्रामें

इच्छानुसार पीने से मनुष्य मूर्छित हआ होता दै, उसी सुरा आखव आदि मद को, उस पुरुष कै स्यि सौवचंल आदि के

साथ विधि पूवक देवे । क्योकि परिवर्तन करने से, इस मनुस्य

को भ्रम, क्डेश होता ईै, इसय्ि वदी मद्य देवे ॥४७॥ वथा नरेनद्रोपहतस्य कस्यविद्‌- भवेत्‌ भसादस्तत एब नान्यतः। _ `

आदि) रोग होते हैँ | चरक-

“विच्छिन्नमद्यः स्सा योऽतिमययं निषेवते ।

ध्वंसो विक्लेपकश्चैव रोगस्तस्योपजायते ॥

श्टेष्मप्रसेकः कण्ठस्य शोषः शब्दासहिष्णुता ।

तन्द्रानिद्राभियोगश्च चेयं भ्वंखकटश्चषणम्‌ |

हृत्कण्ठरोगः समोहश्छदिरङ्गख्जाञ्वरः |

तृष्णा काखः शिरःश्लमेतद्‌ विक्षेपरुश्चणम्‌” ॥

मद्स्याग्नेयवायन्यो गुणावम्बु (म्भो) वहानि तु।

सखरोतांसि ओषयेयातां तेन कृष्णोपजायते ॥५०॥

मद्य के आग्नेय ओर वायव्य गुण अग्बुवह खोतों को युखा देते हे, इससे तृष्णा उत्पन्न होती दे ।

ओष्णयादामात्‌भयालयानाद तिश्चष्कान्नसेवनात्‌ ।

अम्बुवाहीनि दुष्यन्ति तृष्णायाश्चातिपीडनात्‌ ॥

पिपासां चातिप्रब्दधां दष्टा भिषगुदकबवहान्यस्य ।

खोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात्‌ || च° वि अ० ५-१०-१६॥ पाटलोत्पख्कन्देषु मुद्गपण्यो च साधितम्‌ । पिबेन्मागधिकोन्मिश्रं तत्राम्भो हिमशीतलम्‌ ॥५१॥ `

पाटला. कमल्कन्द्‌ (जठ के कन्द) भर मुद्गपर्णी से षिद्ध

किये हिम के समान शीतल जरू मे पिषलीका चूण मिलक पीये ॥॥५१॥] |

सर्पिस्तेख्वसामञजदधिभरङ्गरसेयुतम्‌ । क्वाथेन बिल्वयवयोः सखवगन्धेश्च पेषितेः ॥५२॥

पक्व मभ्यञ्ञने श्रेष्ठं |

घौ, तेर, वसा, मज्जा, ददी, मगरे का स्वर) बिल्व

ओर जो का क्वाय इनमे एलादि गण का कल्क मिलक

चतुःस्तेह का पाक करे । यह अभ्यंग में शेष है । विधि-ददी)

भांगरे का स्वरस, बिल्व, जौ का क्वाय-सवगन्ध

कल्क चलुर्थश, सर्पि, तैल, वखा मज्जा-ये मिख्ति कटकः

चार गुणे छेकर सिद्ध करे | क्वाथ स्नेह से चार गणा शना

चाहिये ॥५.२।। ¦ तमः = सेके क्वाथश्च सीत; ।