सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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वत्सरतन्त्रम्
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परिषेक में शीतल क्वाथ बरते । परिषेकावगाहेषु व्यजनानां च सेवने । शस्यते शिशिरं तोयं दाहदुष्णप्रशान्तये ॥४२॥ रसवन्ति च भोज्यानि यथास्वमवचारयेत् ॥४३॥ पानकानि शुशोतानि हृद्यानि सुरभीणि च । दोष के अनुसार उसके विपरीत प्रचुर मधुर रसयुक्त भोजनों को, शीतल, मन के प्रिय, सुगन्धित पानकों (पेयों) को देवे ॥४३॥ त्वचं प्राप्तस्तु पानोष्मा पित्तरक्ताभिमूर्च्छितः । दाहं प्रकुरुते घोरं पित्तवत्त्र भेषजम् ॥४४॥ मत्थपान जनित उष्मा पित्त-रक्त से मिश्रित होकर त्वचा में आकर भयानक दाह उत्पन्न करती है, इसमें पित्त के समान चिकित्सा करे। चरक—
वदरीपल्लवोत्थश्च तथैवारिष्टकोदुम्भः । फेनिलायाश्च यः फेनस्तेदहि लेपनं शुभम् ॥ सुरासमण्डादध्यम्लं मातुलंघरसो मधु । सेके प्रदेहे शस्यन्ते दाहधनाः साम्लकाजिकाः ॥४४॥
शीतं विधानमत ऊर्ध्वमहं प्रवक्ष्ये दाहप्रशान्तिकरमृद्धिमतां नराणाम् । तत्रादितो मल्यजेन हितः प्रदेह- श्रन्नाशुहारतुहिनोदकशीतलेन ॥४५॥ शीताम्बुशीतलतरैश्च शयानमेनं हारैर्मृणालवलयेरंबलाः स्पृशेयुः । भिन्नात्पल्लोञ्जवलहिमे शयने अर्थात् पत्रेषु वा सजलबिन्दुषु पद्मिनीनाम् ॥४६॥
ऐश्वर्यशाली पुरुषों के दाह को शान्त करने के लिये शीत उपचार अब कहेंगे—सबसे प्रथम चन्दन का पतला लेप शरीर पर करना उत्तम है । चन्द्रमा की किरणों का, मुक्ताहार का, बर्फ के समान शीतल जल का सेवन करे । शीतल पानी से अतिशीतल बनी, मुक्ताहार पहने कमलनाल के कंकणों को धारण करके स्त्रियाँ लेटे हुए इस पुरुष का आलिंगन करें । खिले कमलवाले निर्मल एवं शीतल बिस्तर पर रोगी लेटे । अथवा जलबिन्दुवाले कमलिनी पत्तों पर लेटे । “पौष्करेषु सशीतिषु पद्मोत्पलदलेषु च । कल्लाराणां च पत्रेषु क्षोमेषु विमलेषु च ॥ चन्दनोदकशीतिषु सुप्त्याद् दाहादितः सुलम् ॥”
चरक० चि० अ० ३।२६० ।
(शीतलतरैश्च के स्थान पर शीतलकरैश्च पाठ सुन्दर है) ॥ आसाद्यन् पवनमाहृतमङ्गनाभिः कल्लारपद्मदलशैवलसंचयेषु । कान्तिर्वैरान्तपवनैः परिमृशयमानः शक्तश्चरेद् भवनकान्तदीर्घिकासु ॥४७॥
कमल, लालकमल के पत्ते, शैवाल (सरवाल) के समूह में पंखों के द्वारा स्त्रियों से लाई हुई वायु का सेवन करते हुए तथा कमनीय मद शीतल, सुगन्धित वायु का स्पर्श करते हुए— समर्थ बनकर घर की बगीची एवं सीढ़ियोंवाली बावड़ी में धूम्र ॥
दाहाभिभूतमथवा परिषेचयेत् लामज्जकाम्बुरुहचन्दनतोयतोयैः । विस्त्रावितां हृतमलां नववारिपूर्णां पद्मोत्पलाकुलजलामधिवासिताम्बुम् ॥४८॥ वापीं भजेत हरिचन्दनभूषिताङ्गः कान्ताकरस्पृशनकरकशरोमकूपः । खस, कमल, चन्दन, नेत्रवाला इनके क्वाथ से, दाह से पीड़ित मनुष्य का परिषेक करे । बावड़ी में से पुराना सब पानी भरकर, इस पानी को कमल, लालकमल, इनसे भरकर-सुगन्धित बनाकर इस जल में, शरीरपर श्वेतचन्दन का लेप करके, स्त्रियों के हाथ के स्पर्श से रोमांचित (खड़े रोमांचावाली) बनकर स्नान करे ॥४८॥
तत्रैतमम्बुरुहपत्रसमैः स्पृशन्त्यः शीतैः करोहरुवदनेः कठिनैः स्तनैश्च ॥४९॥ तोयावगाहकुञ्जला मधुरस्वभावाः संहर्षयेयुरबलाः सुकलैः प्रलापैः ।
वहाँ इस वापी में कमल पत्र के समान कोमल एवं शीतल हाथ, ऊरु एवं मुख से तथा कठिन स्तनों से स्पर्श करती हुई, जल क्रीड़ा में कुशल, मधुर स्वभाववाली प्रौढ़ स्त्रियाँ अपने उत्तम कलापूर्ण वचनों से इस दाह पीड़ित मनुष्य को प्रसन्न करें । संकथाहास्यगीतानां विश्वाशरचैव योजनाः । प्रियाश्चानुगता नायों नाशयन्ति मदात्ययम् ॥ नाक्षोभ्य हि मनो मयं शरीरमबह्य च । कुर्यान्मदात्ययं तस्मादेक्ष्या दर्शणी क्रिया ॥
चरक चि० अ० २४ ॥५६॥
धारागृहे प्रगलितोदकदुर्दिनाभे क्लान्तः शयीत सलिलानिलशीतकुञ्जो ॥६०॥ गन्धोदकैः सकुसुमैरुपसिक्तभूमौ पत्राम्बुचन्दनरसैरुपल्लिप्तकुञ्ज्ये । जाल्युत्पलप्रियककेशरपुण्डरीक- पुन्तनागनगरवीरकुतोपचारे ॥६१॥ तस्मिन् गृहे कमलरेणवरुणे अर्थात् यत्नाहृतानिलविकसिप्तपुष्पदाम्नि ।
जिस धारागृह में निरन्तर बरसात की भाँति पानी की फुवारें पड़ रही हों, जहाँ जल मिश्रित वायु शीतल बने कमरे में थका हुआ सोये । सुगन्धित (इत्तर से वासित) फूलों से युक्त पानी से भूमिपर छिड़काव करके, तेजपत्र, मोथा, चन्दन