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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 804

= > "चु ।

ऽध

केसर,

के रस

कमल,

से दिवारों

पुन्नाग,

पर लेप

नागकेखर,

करके, चमेटी,

करवीर

कमल,

इनसे क्िड़के

हए

घर मे कमल धूली से खाक बने आंगनवाङे धाराृह मे-यत्न- पूवक लाई हुई वायु से कम्पित पुष्पों को माला पहने हए सोये ॥

हेमन्तविन्ध्यहिमवन्मख्याच खानां खीताम्भसां सकदरीह रितद्वमाणाम्‌ ॥६२॥

उद्धिन्ननीकनख्निम्बुरुहाकराणां

चन्द्रोदयस्य च कथाः णुयान्मनोज्ञः | स्छानं प्रतान्तमनखं मनसोऽनुकरूखाः

पीतस्तनोरुजघना हरिचन्दनाङ्गयः ॥६२॥

ता एनमाद्रवसनाः सह सं विशेयुः हिल्राऽ्बखाः शिथिकमेखख्हारयष्टयः ।६४।

हेमन्त्रूतु की, विन्ध्याचल, हिमाल्य, मलयाचल पतों की, शीतर जलों की, केठे एवं हरे मरे इषो की, खिरते हए

नीलोफर एवं कमरों की, चन्द्रमा कौ चांदनी की मनके अनु-

कू कथाओं को सुने । ग्लानि एवं दीनता से युक्त मनवाले

मनुष्य को, मनके अनुकू, पुष्टस्तन ऊस जघनवाटी, शरीर

पर चन्दन का लेप किये इए, गीला महीन वल्रधारण करके,

ढी्कीमेखला, एवं मुक्ताहारवाटी लिव आगन करके, इसके

साथ सोयं ।

“वनानि रमणीयानि स्पद्याः सटिलाशयाः |

विशदान्यन्नपानानि सहायाश्च प्रहषणाः |

माल्यानि मन्धयोगाश्च वासांसि विमलानि च ।

गान्धवश्ब्दाः कान्ताश्च गोष्ठधश्च हृदयप्रियाः।। संकथाहास्यगीतानां विशद्‌ाश्चेव योजनाः । प्रियाश्चाचुगता नायो नाशयन्ति मदात्ययम्‌ ॥ जल्यंत्राभिवर्षीणि वातयं्रवदहाणि च । कल्पनीयानि मिषजा दहि धाराण्डाणि च ॥६२.६४॥ हषयेयुनेरं नायः स्वगुणे रहसि स्थिताः

ताः ओत्याच्छमयेयुश्च पित्तपानात्ययान्तरम्‌ ॥६९५॥ एकान्त म स्थित सिया अपने मृदुभाषण-दत्य आदि रणो

से इसको प्रसन्न करं । ये जिया अपनी शीतलता से पित्तपाना- त्ययको शांत कर ॥६५॥ `

तृड्दाहरक्तपित्तषु कार्योऽयं भेषजक्रमः। सामान्यतो प्यास, दाह, रक्तपित्त में यह कही ओषधविषि सामान्य स्पमेंकरे। | | ¦

विशेषं तु णु दादेष्वरेषतः ॥६६॥ दाह के ्थि विशेष चिकित्सा सम्पूणं रूप मे सुनो ॥६६॥ छृस्नदेहानुगं रक्मुद्रितं दहति इति ।

. सचूस्यते दहते च तान्नाभस्ता्नढो चनः ॥६७॥ गोदग्ाङ्गवदनो वहिनेवावकीयते । बहि

सुश्रतसं्िता | अ० ४७ तं विरुङध्य विधानेन सं सष्टाहारमाचरेत्‌ ६८

अप्रशाम्यति दाहे च रसेस्ठरप्रस्य जाङ्गलैः | शाखाश्रया यथान्यायं रोहिणीभ्यंधयेत्‌ सिराः ॥६९॥ सम्पूणं शरीर म फठा हुभा बदा हआ रक्त बहुत जखन

उत्पन्न करता है, इससे रोगी को खिचाव, ओर दाह होता ३,

रोगी का चेहरा ताप्रवणं दो जाता है, आंखें ता्रवणं हो जाती

है, अंग ओर मुख से लोहं (रक्त) की गन्ध आती है, जरते

हए अंगार से व्याप्त अपने को मानताहै। इस्रोगीको

लंघन कराके, क्रम से पेया आदि आदार देवे । इस उपचार से

भी यदि दाह शन्तन दहो, तब जांगल्मांस रसां से तृप्त करके सिरा वेध विधि के अनुखार शाखाभ्ित (दाथ पैर को) रोहिणी चिरा ( लोदित सिरा ) का वेधन करे ।६ऽ-६६॥

पित्तञ्वरसमः पित्तात्‌ स चाप्यस्य विधिर्हितः

पित्त के कारण दाह पित्तव्वर के समान होता है, इसल्यि

पित्तज्वर के समान चिकित्ा करे | |

तृष्णानिरोधादब्धाती क्षीणे तेजः समुद्धतम्‌ ॥७०॥

सबाह्याभ्यन्तरं देहं ददे मन्द चेतसः । संरुष्कगङ्तात्वोषठो जिह्यं निष्टरृष्य चेष्टते ।५१॥

प्यास के रोकने से पानीयधातु के क्षीण होने पर अतिशय

बदा पित्त- मन्दचित्तवाल़े रोगी के शरीर को अन्दर ओर

बाहर से जलाता है, रोगी की चेतना मन्द हो जाती है । रोगी

का गला तालु ओर ओष्ठ सूख जाता है, जीम बाहर निकल

आती ह ॥७०,७१॥

तत्रोपशमयेत्तजस्सन्धातुं च विषधयेत्‌।

पाययेत्‌ काममम्भश्च जकराद्वं पयोऽपि वा ॥५२॥

जीत मिल्लरसं मन्थं वितरेच्चरितं विधिम्‌ । इस अवस्था मे तेज. को शान्त करे, ओर पानीयधाठ का

बद़ाये । करा बद्र पानी या दुष य॒येच्छ पिये । शीत

इसतुपप्र;देवे, मन्थ देवे, पित्तनाशक उपचार करे ।

मन्यहदलववृःसर्िपराऽभ्यक्ताः शीतवासिसिष्लुताः ॥७२॥

अद्जा पूणकोष्ठस्य दाहो भवति दुःसहः ॥५३॥

विधिः सयोव्रणीयोक्तस्तस्य खक्षणमेव च ।

रक्त से कोष्ठ के भर जाने पर अति दुःखदायी दाह दता

है, इसके रक्षण ओर चिकित्खा सद्योव्रण. मे की विधि क

अनुसार जाने ॥७३॥ | |

धातुक्षयोक्तो यो दादस्तेन मूच्छीतृषान्वितः ॥४॥

क्षामस्वरः क्रियाहीनो भशं सीदति पीडितः ।

रक्तपित्तविधिस्तस्य हितः स्निग्धोऽनिापहः ॥५५॥

रक्तक्षय के कारण जो दाह हदौता है, इससे क

प्याख, श्षीणस्वर, चेष्टा हानि; होकर मच अति

शियिल तथा दाह से दुःखी. दोता दै। इसमे रक्तपित्त

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