सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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वक्तव्य—चरक में—पांच प्रकार की तृष्णा मानी है, उनमें उपद्रवजनित एक तृष्णा मानी है, यथा—भवति लघु योपसर्गा तृष्णा सा शोषिणी कष्टा । ज्वरमेहक्षयशोषश्वा-सायुपसृष्टदेहानाम्॥
क्षीणं विचिन्तं बधिरं तृषातं
विवर्जयेन्निरगतंजिह्वामाशु ॥१५॥
क्षीण, नष्टमनवाले, बहरे, तृष्णा से जिसकी जिह्वा बाहर निकल आई हो, इस प्रकार के रोगी की चिकित्सा न करे । “सर्वास्त्वतिप्रसक्ता रोगकृद्यानां वमिप्रसक्तानाम् । चोरोपद्रव-युक्तास्तृष्णा मरणाय विद्येयाः॥ चरक ॥१५॥
तृष्णाभिवृद्धावुदरे च पूर्णं
तं वामयेनमागधिकोदकेन ।
विशोभनं चात्र हितं विधेयं
स्याद्वाडिमात्रातकमातुलुङ्गैः ॥१६॥
तिष्ठः प्रयोगैरिह सन्निवायाः
शीतैश्च सम्यग्रसवोर्जयतैः ।
तृष्णा के बढ़ा होने से, उदर के भरा होने पर पिप्पली मिश्रित जल से रोगी को वमन कराये । अनार, आम्रपातक, बिजौरा इनको दूसरे व्यक्ति इसके सामने खाये, जिससे इसमें लालच उत्पन्न हो । सम्पूर्ण रस वीर्यवाले शीतल उपचारों से वात-पित्त-कफजन्य तीनों तृष्णायें निवारण करे ।
“फलान्यम्लानि खादेयुस्तस्य चान्येऽप्रतो नराः ।
निःसृतां तु तिलद्राक्षाकल्कलिप्तं प्रवेशयेत्” ॥
वि० मन्तव्य—विलोभनं-अनार आदि अम्लद्रव्यों में लोभ-लालसा होने से मुख में लालाखाव होने लगता है फलतः मुखशोष तथा तृषा का शमन हो जाता है ॥१६॥
गण्डूषमस्लेविरसे च वक्त्रे
कुर्याच्छुभैरामलकस्य चूर्णैः ॥१७॥
मुख की विरसता में मद्य, कांजी, बिजौर, आदि के अम्ल द्रव्यों से गण्डूष कराये । आंवले के चूर्ण से भी गण्डूष कराये-आंवले का चूर्ण मले ॥१७॥
सुवर्णरूप्यादिभिरनितनै-
लौष्टैः कृतं वा सिकतादिभिर्वा ।
जलं सुखोष्णं शमयेत् तृष्णां
सशर्करं क्षौद्रयुतं हिमं वा ॥१८॥
सुवर्ण, चाँदी, लोह ( मिट्टी का ढेला ), सिकता ( रेती ) आदि को अग्नि में लाल गरम करके पानी में बुझाये । जब पानी गुनगुना हो जाये, तब तृष्णा रोगी पीये । अथवा शीतल जल में शर्करा या मधु मिलाकर पीये ॥१८॥
१ तंत्रास्तर में—“उल्लेखनं तु तृष्णाम्ना क्षयादन्यत्र प्रयु-ज्यते ॥” इसमें चीण धातु होने से वमन अनुचित है ।
पश्चाङ्गिकाः पश्चगणा य उक्ता-
स्तेष्वन्मु सुसिद्धं प्रथमे गणे वा ।
पिवेतु मुखोष्णं मनुजोऽधिरेण
तृषो विमुच्येत हि वातजायाः ॥१९॥
पांचद्रव्यवाले जो पश्चमूल कहे हैं, उनमें या विदारिगन्वादि प्रथमगण में सिद्ध किया गुनगुना पानी पीये । इस प्रकार करने से वातजन्य तृष्णा शीघ्र नष्ट होती है ॥१९॥
पित्तवन्तवर्गस्तु कृतः कषायः
सशर्करः क्षौद्रयुतः सुशीतः ।
पीतस्तृषां पित्तकृतां निहन्ति
क्षीरं श्रुतं वाऽप्यथ जीवनीयेः ॥२०॥
उत्पलादि सारिवादि, काकोत्थादि पित्तनाशक गणों से बनाया कषाय शीतल करके मधु और शर्करा मिलाकर पीये । अथवा जीवनीयगण की औषधियोंसे सिद्ध किया दूध पित्तजन्य तृषा को शीघ्र नष्ट करता है ॥२०॥
बिस्वाढकीकन्यकपश्चमूली-
दभंषु सिद्धं कफजां निहन्ति ।
हितं भवेच्छर्दनमेव चात्र
तप्तैन निम्नप्रसवोदकेन ॥२१॥
बिस्व, अरहर, लघुपंचमूल और दाम से सिद्ध पानी कफ-जन्य तृषा को नष्ट करता है । नीम पत्तों के उष्ण पानी से कफज तृषा में वमन कराना उत्तम है ॥२१॥
सर्वासु तृष्णास्वथवाऽपि पैक्तं
कुर्याद्विधि तेन हि ता न सन्ति ।
सब प्रकार की तृष्णाओं में पित्तनाशक विधि (मधुर शीता-दिभिः पान, लेपन) करते, इस पैक्तिक विधि से ये तृष्णायें नष्ट हो जाती हैं ।
पर्याणतोदुम्बरजो रसस्तु
सशर्करस्तत्त्ववथितोदकं वा ॥२२॥
वर्गस्य सिद्धस्य च सारिवादेः
पातन्यसम्भः शिशिरं तृषातः ।
पकी गूजर का स्वरस या पकी गूजर का क्वाथ इनमें शर्करा मिलाकर पीये । सारिवादि वर्ग के क्वाथ को शीतल करके प्यास की पीड़ा में पीना चाहिये ॥२२॥
कशेरुशृङ्गाटकपद्ममोच-
बिसेजुसिद्धं क्षतजां निहन्ति ॥२३॥
कसेरु, सिंघाड़ा, पद्म (कमल), केला, पद्ममूल, ईल से सिद्ध किया जल (इनका काथ) क्षतज तृष्णा को नष्ट करता है ॥२३॥
छाजोत्पलोग्रीकुचन्दनानि
दन्वा प्रवाते निशि वासयेत् ।
तदुत्तमं तोयमुदारगन्धि
सितायुतं क्षौद्रयुतं वदन्ति ॥२४॥