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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४८ ]

उत्तरतन्त्रम्

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वक्तव्य—चरक में—पांच प्रकार की तृष्णा मानी है, उनमें उपद्रवजनित एक तृष्णा मानी है, यथा—भवति लघु योपसर्गा तृष्णा सा शोषिणी कष्टा । ज्वरमेहक्षयशोषश्वा-सायुपसृष्टदेहानाम्॥

क्षीणं विचिन्तं बधिरं तृषातं

विवर्जयेन्निरगतंजिह्वामाशु ॥१५॥

क्षीण, नष्टमनवाले, बहरे, तृष्णा से जिसकी जिह्वा बाहर निकल आई हो, इस प्रकार के रोगी की चिकित्सा न करे । “सर्वास्त्वतिप्रसक्ता रोगकृद्यानां वमिप्रसक्तानाम् । चोरोपद्रव-युक्तास्तृष्णा मरणाय विद्येयाः॥ चरक ॥१५॥

तृष्णाभिवृद्धावुदरे च पूर्णं

तं वामयेनमागधिकोदकेन ।

विशोभनं चात्र हितं विधेयं

स्याद्वाडिमात्रातकमातुलुङ्गैः ॥१६॥

तिष्ठः प्रयोगैरिह सन्निवायाः

शीतैश्च सम्यग्रसवोर्जयतैः ।

तृष्णा के बढ़ा होने से, उदर के भरा होने पर पिप्पली मिश्रित जल से रोगी को वमन कराये । अनार, आम्रपातक, बिजौरा इनको दूसरे व्यक्ति इसके सामने खाये, जिससे इसमें लालच उत्पन्न हो । सम्पूर्ण रस वीर्यवाले शीतल उपचारों से वात-पित्त-कफजन्य तीनों तृष्णायें निवारण करे ।

“फलान्यम्लानि खादेयुस्तस्य चान्येऽप्रतो नराः ।

निःसृतां तु तिलद्राक्षाकल्कलिप्तं प्रवेशयेत्” ॥

वि० मन्तव्य—विलोभनं-अनार आदि अम्लद्रव्यों में लोभ-लालसा होने से मुख में लालाखाव होने लगता है फलतः मुखशोष तथा तृषा का शमन हो जाता है ॥१६॥

गण्डूषमस्लेविरसे च वक्त्रे

कुर्याच्छुभैरामलकस्य चूर्णैः ॥१७॥

मुख की विरसता में मद्य, कांजी, बिजौर, आदि के अम्ल द्रव्यों से गण्डूष कराये । आंवले के चूर्ण से भी गण्डूष कराये-आंवले का चूर्ण मले ॥१७॥

सुवर्णरूप्यादिभिरनितनै-

लौष्टैः कृतं वा सिकतादिभिर्वा ।

जलं सुखोष्णं शमयेत् तृष्णां

सशर्करं क्षौद्रयुतं हिमं वा ॥१८॥

सुवर्ण, चाँदी, लोह ( मिट्टी का ढेला ), सिकता ( रेती ) आदि को अग्नि में लाल गरम करके पानी में बुझाये । जब पानी गुनगुना हो जाये, तब तृष्णा रोगी पीये । अथवा शीतल जल में शर्करा या मधु मिलाकर पीये ॥१८॥

१ तंत्रास्तर में—“उल्लेखनं तु तृष्णाम्ना क्षयादन्यत्र प्रयु-ज्यते ॥” इसमें चीण धातु होने से वमन अनुचित है ।

पश्चाङ्गिकाः पश्चगणा य उक्ता-

स्तेष्वन्मु सुसिद्धं प्रथमे गणे वा ।

पिवेतु मुखोष्णं मनुजोऽधिरेण

तृषो विमुच्येत हि वातजायाः ॥१९॥

पांचद्रव्यवाले जो पश्चमूल कहे हैं, उनमें या विदारिगन्वादि प्रथमगण में सिद्ध किया गुनगुना पानी पीये । इस प्रकार करने से वातजन्य तृष्णा शीघ्र नष्ट होती है ॥१९॥

पित्तवन्तवर्गस्तु कृतः कषायः

सशर्करः क्षौद्रयुतः सुशीतः ।

पीतस्तृषां पित्तकृतां निहन्ति

क्षीरं श्रुतं वाऽप्यथ जीवनीयेः ॥२०॥

उत्पलादि सारिवादि, काकोत्थादि पित्तनाशक गणों से बनाया कषाय शीतल करके मधु और शर्करा मिलाकर पीये । अथवा जीवनीयगण की औषधियोंसे सिद्ध किया दूध पित्तजन्य तृषा को शीघ्र नष्ट करता है ॥२०॥

बिस्वाढकीकन्यकपश्चमूली-

दभंषु सिद्धं कफजां निहन्ति ।

हितं भवेच्छर्दनमेव चात्र

तप्तैन निम्नप्रसवोदकेन ॥२१॥

बिस्व, अरहर, लघुपंचमूल और दाम से सिद्ध पानी कफ-जन्य तृषा को नष्ट करता है । नीम पत्तों के उष्ण पानी से कफज तृषा में वमन कराना उत्तम है ॥२१॥

सर्वासु तृष्णास्वथवाऽपि पैक्तं

कुर्याद्विधि तेन हि ता न सन्ति ।

सब प्रकार की तृष्णाओं में पित्तनाशक विधि (मधुर शीता-दिभिः पान, लेपन) करते, इस पैक्तिक विधि से ये तृष्णायें नष्ट हो जाती हैं ।

पर्याणतोदुम्बरजो रसस्तु

सशर्करस्तत्त्ववथितोदकं वा ॥२२॥

वर्गस्य सिद्धस्य च सारिवादेः

पातन्यसम्भः शिशिरं तृषातः ।

पकी गूजर का स्वरस या पकी गूजर का क्वाथ इनमें शर्करा मिलाकर पीये । सारिवादि वर्ग के क्वाथ को शीतल करके प्यास की पीड़ा में पीना चाहिये ॥२२॥

कशेरुशृङ्गाटकपद्ममोच-

बिसेजुसिद्धं क्षतजां निहन्ति ॥२३॥

कसेरु, सिंघाड़ा, पद्म (कमल), केला, पद्ममूल, ईल से सिद्ध किया जल (इनका काथ) क्षतज तृष्णा को नष्ट करता है ॥२३॥

छाजोत्पलोग्रीकुचन्दनानि

दन्वा प्रवाते निशि वासयेत् ।

तदुत्तमं तोयमुदारगन्धि

सितायुतं क्षौद्रयुतं वदन्ति ॥२४॥