सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४८ ]
द्राक्षाप्रगाढं च हिताय वैद्य-
लाजा, कमल, खस, चन्दन, इनको पानीमें घोलकर खुली वायु में रात भर रक्खा रहने देवे । इसको प्रातः नितारकर इसमें उदार-गन्धा-सुगन्धिपुष्पों से सुवासित करके, सिता ( शर्करा ) और मधु के साथ मिलाकर प्रचुर द्राक्षा घोलकर वैद्य तृष्णा से पीड़ित रोगी को देवे ॥२४॥
स्तृष्णादिदेश्यो वितरेक्षरेभ्यः ।
ससारिवादौ तृणपञ्चमूले
तथोत्पलादौ प्रथमे गणे च ॥२५॥
पंचतृणमूल को सारिवादि गण के साथ, उत्पलादि गण को-विदारीगन्धादि गण के साथ पूर्वोक्त विधि से पानी में मिगोकर खुली वायु में रातभर रखकर प्रातः छानकर मधु-शर्करा मिलाकर प्रचुर द्राक्षा मिलाकर देवे ॥२५॥
कुर्यात् कषायं च यथेरितेन
मधुकपुष्पादिषु चापरेषु ।
राजादनक्षीरकपीतनेषु
षट् पानकान्यत्र हितानि च स्युः ॥२६॥
मधुकपुष्प आदि ( महुआ, शोभांजन, कचनार, प्रियंगु के पुष्प), राजादन ( खिरनी), एवं क्षीर-कपीतन ( पारस पीपल ) इन छैः द्रव्यों से पूर्वोक्त विधि के अनुसार रात में मिगोकर प्रातः नितारकर मधु शर्करा मिलाकर देना हितकारी है ॥२६॥
सतुण्डिकेराण्यथवा पिबेत्
पिष्टानि कार्पाससमुद्भवानि ।
तुण्डिकेरी ( बन कपास ) एवं ग्राम्यकपास के फलों को पीसकर पानी में घोलकर पीये ।
क्षतोद्भवां रुग्निविचारणेन
जयेद्वसानामसृजश्च पानैः ॥२७॥
क्षतजन्य तृष्णा को क्षतोद्भव वेदना को शांत करने से, मांस रसों के पान से, हरिण आदि के रक्त के पान से शान्त करे ॥
क्षयोस्थितां क्षीरघृतं निह्न्यान्-
मांसोदकं वा मधुकोदकं वा ।
क्षयजन्य तृष्णा को दूध से निकाला घृत या दूध मिला घृत, मांस का सौरवा, मुलेहटी का पानी शान्त करता है ।
आमोद्भवां बिल्बवचायुतैस्तु
जयेत् कषायैरथ दीपनीयैः ॥२८॥
आम्रातभलातवलायुतानि
पिवेत् कषायण्यथ दीपनानि ।
आमजन्य तृष्णा में पिप्पल्यादि द्रव्यों के साथ बिल्ब और वचा मिलाकर काथ करके पिलाये । अम्बाड़ा, भिलावा, बला-मिश्रित दीपनीय द्रव्यों का कषाय आमजन्यतृष्णा में पिलाये ॥
गुर्वन्नजातां वमनैर्जयेच्च
क्षयाहते सर्वकृतां च तृष्णाम् ॥२९॥
भारी अन्न के खाने से उत्पन्न तृष्णा को वमन से शान्त करे । आमजन्य तृष्णा में भी वमन कराये, क्षयजन्य तृष्णा में वमन न कराये । ( क्षयाहते सर्वकृताश्च तृष्णाः—यह पाठ रुचिकर है ) ॥२९॥
श्रमोद्भवां मांसरसो निहन्ति
गुडोदकं वाऽप्यथवाऽपि मन्यः ।
यकान से उत्पन्न तृष्णा को मांस रस, या गुड़ का शर्वत अथवा घृतमिश्रित पानी में घुला सच् ( मन्य ) नष्ट करता है ( सक्तवः सर्पिवाऽभ्यक्ताः क्षीतवारिपरिप्लुताः ) ।
भक्तोपरोधान्तुषितो यवाग्-
मुष्णां पिबेन्मन्यमथो हिंसं च ॥३०॥
आहार निरोधजनित तृष्णा में उष्ण यवाग् को पीये । अथवा पित्ता प्रबल तृष्णा में शीतल मन्य पीये ॥३०॥
या स्नेहपीतस्य भवेच्च तृष्णा
तत्रोष्णसम्भः प्रपिबेन्मनुष्यः ।
स्नेहपान जनित तृष्णा में मनुष्य उष्ण पानी पीये । “उदीर्णपित्ता ब्रह्मी यस्य चाग्निबलं महत् । भस्मीभवति तस्याशु स्नेहः पीतोऽग्नितेजसा ॥ स जग्ध्वा स्नेहमात्रां तामोजः प्रक्षारयन् बली । स्नेहाऽग्निवृत्तामां तृष्णां सोपसर्गमुदीरयेत् ॥ नालं स्नेहसमुद्भस्य शमायान्नं सुगुर्वपि । स चेतुशीतं सलिलं नासादयति दक्षते ॥”
चरक सू० अ० १३-७०-७३ ॥
यहाँ पर शीतल जल के पान का विधान है । इसलिए गरम पानी को ठण्डा करके पीना उत्तम है । अथवा शुद्ध स्नेहपान में शीतल जल एवं भोजन के साथ अधिक स्नेहपान होने पर प्यास लगने से गरम पानी पीये ।
मद्योद्भवामधेजलं निहन्ति
मद्यं तृषां याऽपि च मद्यपस्य ॥३१॥
मद्यपी मनुष्य को मद्यजनित तृष्णाको आधा जल मिला मद्य नष्ट कर देता है ॥३१॥
उष्णोद्भवां हन्ति जलं सुशीतं
सशर्करं सेलुरसं तथाऽम्भः ।
शर्करा मिश्रित शीतल जल, गन्ने का शीतल रस ये तृष्णा से उत्पन्न तृष्णा को ( हृद्द्वोगसे क्रुश पुरुष में उवद्रवजनित तृष्णा को नष्ट करते हैं । तृष्णोद्भवां के स्थान पर उष्णोद्भवां पाठ भी ठीक है ) ।
स्वैः स्वैः कषायैर्वमनानि तासां
तथा व्वरोक्तानि च पाचनानि ॥३२॥