सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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वातादिजनिता तृषाओं की शांति के लिये जो जो उनके अपने अपने कषाय कहे हैं, उन कषायों से उन दोषों में वमन कराये। ज्वर में कहे पाचन देवे ॥३१॥
लेपावगाही परिषेचनानि कुर्यात्तथा शीतगृहाणि चापि।
संशोधनं क्षीररसौ घृतानि
सर्वासु लेहान्मधुरान् हिमांश्च ॥३२॥
लेप, अवगाहन, परिषेचन, शीतलघरों का सेवन, विरेचन, दूध, मांसरस, घृत, मधुर एवं शीतल लेह सब प्रकार की तृष्णाओं में बरते ॥३३॥
इति श्रीशुभ्रतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे तृष्णाप्रतिषेधो नाम (दशमोऽध्यायः, आदितः) अधचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४८॥
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
अथातइच्छद्विप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे छद्विप्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
अतिद्रवैरतिस्निग्धैरहृत्चैर्वैणैरति।
अकाले चातिमात्रैश्च तथाऽसात्क्यैश्च भोजनैः ॥३॥
श्रमात् क्षयात्तथोद्रेगादजीर्णात् क्रुमिदोषतः।
नार्याश्चापन्नसत्वायास्तथाऽतिद्रुतमश्नतः ॥४॥
(अत्यन्तमापरीतस्य छद्वैवं संभवो ध्रुवम्।)
अतिद्रव, अतिस्निग्ध, मन के अग्नि, अतिनमकवाले
भोजनों से, असमय में, मात्रा में बहुत अधिक एवं असात्म्य भोजनों से, श्रम से, क्षय से, दैचैनी से, अजीर्ण से, क्रुमिदोष से, गर्भवती स्त्री में, अतिशीघ्र खाने के कारण, अत्यर्थ आम से उक्त होने पर, निश्चित रूप में वमन उत्पन्न होती है ॥३-४॥
बीभत्सैर्हंतुभिश्चान्यैर्द्रुतमुक्तेलेगितो बलात् ॥५॥
छादयन्तानानं वैगैरदंयन्नन्नभञ्जनैः।
निरुच्यते छद्विरिति दोषो वक्राद्विनिस्सरन् ॥६॥
दूसरे बीभत्सोत्पादक कारणों से जल्दी, बलपूर्वक उत्स्वेलीत होने से वमन आरम्भ होते हैं। मुख से निकलता हुआ दोष अंगों के टूटने के साथ वेगपूर्वक मुख में भरने से, छद्वि (वमन) कहा जाता है ॥५,६॥
दोषानुदीरयन् वृद्धानुदानो न्यानसङ्गतः।
ऊर्ध्वमागच्छति भुजं विरुद्धाहारसेवनात् ॥७॥
व्यान से मिली उदानवायु विरुद्ध अहार के सेवन करने से बढ़े हुए दोषों को बाहर की ओर प्रेरित करती हुई अतिशय वेग से ऊपर को आती है ॥७॥
प्रसेको हृदयोत्कलेगो भक्तस्यानभिनन्दनम्।
पूर्वरूपं मत्तं लघोः।
वमन के पूर्वरूप—मुख से लालाखाव, हृदयप्रदेश (आमाशय) में बेचैनी, भोजन की अरुचि होती है।
यथास्वं च विभावयेत् ॥८॥
अपने अपने दोषों के अनुसार प्रत्यक्ष पूर्वरूप को स्वरूपावस्था में पहचानना चाहिये ॥८॥
प्रच्छद्वयेत् फेनिलमल्पमल्पं
शूलादितोऽभ्यर्दितपाशर्वपृष्ठः।
श्रान्तः सघोषं बहुशः कषायं
जीर्णोऽधिकं साऽनिलज्जा वमिस्तु ॥९॥
पार्श्व एवं पीठ में पीड़ा अनुभव करता हुआ, शूल से पीड़ित मनुष्य श्वागदार, थोड़ा, शब्द के साथ बहुत बार वमन करता है। वमन करने से रोगी थक जाता है, वमन का रस कषाय तथा भोजन के जीर्ण होने पर वमन अधिक होती है, यह वमन वातजन्य है। (प्रायः प्रेक्कियेटिक ब्रण में ऐसा होता है—वमन भोजन के जीर्ण होने पर होती है) ॥९॥
योऽम्लं भुजं वा कटुतिक्तवक्रः
पीतं सरक्तं हरितं वमेद्वा।
सदाहचोषज्वरवक्रत्रगोषो
मूर्च्छन्वितः पित्तनिमित्तजा सा ॥१०॥
रोगी का मुख अति अम्ल, कटु या तिक्त हो, वमन पीला, रक्त मिश्रित या हरे रंग का हो, रोगी को दाह, चोष, ज्वर, मुख की शुष्कता रहती हो, मूर्छा आये, यह वमन पित्तजन्य होती है ॥१०॥
यो हृष्टरोमा मधुरं प्रभृतं
शुक्लं हिमं सान्द्रकफानुविद्धम्।
अभक्तुरगौरवसादयुक्तो
वमेद्दमी सा कफकोपजा स्यात् ॥११॥
जो रोगी रोमांच होकर मधुर, मात्रा में प्रचुर, रवेत, शीतल, सान्द्र कफ से मिश्रित वमन करे, रोगी को भोजन में अरुचि, भारीपन शिथिलता हो, वह वमन कफकोपजन्य होती है ॥११॥
सर्वाणि रूपाणि भवन्ति यस्यां
सा सर्वदोषप्रभवामता तु।
जिस वमन में सब दोषों के लक्षण होते हैं, वह वमन सन्निपातजन्य होती है।
बीभत्सजा दौर्हृदजाऽऽमजा च
सात्क्यप्रकोपात् क्रुमिजा च या हि।
सा पञ्चमी तां च विभावयेत्
दोषोच्छयेणैव यथोक्तमादौ ॥१२॥
बीभत्सजन्य, दौर्हृदजन्य (गर्भावस्थाजन्य), आमजन्य, सात्क्यप्रकोपजन्य और क्रुमिजन्य जो छद्वियां हैं, उनको पांचवीं