सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 810, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें७५४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४९ ]
वमन जाने, इसको दोष की अधिकता से ही पहचानना चाहिये।
“द्विष्टप्रतीपा, शुचिपूर्ययेध्वनीभत्सगन्वाशनदर्शनेश्च। यश्छदयेत्पत्तमना मनोघ्नः द्विष्टार्थसंयोगमवा मता सा ॥” चरक ॥१२॥
शूलहृत्तलासबहुला क्रुमिजा च विशेषतः। क्रुमिहृद्भोगतुल्येन लक्षणैन च लक्षिता ॥१३॥
- क्रुमिजन्य छर्दि में शूल, जी मचलाना विशेषरूप में होता है, क्रुमिजन्य हृद्भोग के समान लक्षणों से युक्त होती है ॥१३॥ क्षीगस्योपद्रवैर्युक्तां सासुक्प्रयां सचन्द्रिकाम्। छर्दिं प्रसक्तां कुशलो नारभेत चिकित्सितुम् ॥१४॥ क्षीण व्यक्ति की, उपद्रवों से युक्त, रक्त एवं पूय मिश्रित, चन्द्रिका (मोरपंख की चांदनी) के समान रंगोंवाली, निरन्तर चालू रहनेवाली वमन की वैद्य चिकित्सा न करे।
क्षीणस्य या छर्दिरतिप्रसक्ता सोपद्रवा शोषितपूर्युक्ता। सचन्द्रिकां तां प्रवदन्यसाध्यां साध्यां चिकित्सेदनुपद्रवां च ॥ (चरक)। चरक में द्विष्टार्थजन्य छर्दि को पांचवीं माना है ॥१४॥
आमाशयोक्त्तलेशमवा हि सर्वा- स्तस्माद्वितं लह्वनमेव तासु ॥१५॥
सब प्रकार की छर्दियां आमाशय के उत्कलेश से उत्पन्न होती हैं, इसलिये इन सब में लंघन करना हितकारी है ॥१५॥
वभीषु बहुदोषासु छर्दंन हितमुच्यते। विरेचनं वा कुर्वीत यथादोषोच्छ्रुयं भिषक् ॥१६॥
बहुत दोषवाले वमनों में वमन कराना उत्तम है। अथवा दोष की अधिकता को देखकर वैद्य विरेचन देवे। (बहुत कफ में वमन, बहुत पित्त में विरेचन देवे) ॥१६॥
संसर्गाश्चातुपूर्णेण यथास्वं भेषजायुतान्।
वातादि दोषों से विरोधि औषधियों से युक्त पेयादि संसर्जन क्रम को वमन, विरेचन के पीछे बरते।
लघूनि परिशुष्काणि सात्स्यान्यन्नानि चाचरेत् ॥१७॥ लघु, अतिशुष्क, सात्स्यभोजन खाने को देवे ॥१७॥
यथास्वं च कषायणि व्वरघ्नानि प्रयोजयेत्।
दोषों के उनके अपने अनुसार व्वरघ्न कषायों को बरते।
हन्यात् क्षीरघृतं पीतं छर्दिं पवनसंभवाम् ॥१८॥
ससैन्धवं पिबेत् सर्पिर्वातच्छर्दिं निवारणम्।
मुद्गमासलकृष्यो वा ससर्पिष्कः ससैन्धवः।
यवार्गु मधुमिश्रां वा पञ्चमूलीकृतां पिबेत् ॥१९॥
पिवेद्वा व्यक्तसिन्धूर्थं फलास्त्वं वैष्किरं रसम्।
सुखोष्णलवणं चात्र हितं स्नेहविरेचनम् ॥२०॥
दूध को मथकर बनाया घृत या दूध के साथ दिया घृत वातजन्य छर्दि को नष्ट कर देता है। सैन्धव के साथ घी को पीये, इससे वात छर्दि नष्ट होती है। मूंग और आंवले का घृत घी और सैन्धव के साथ देवे। वृहत्पंचमूल से बनाई यवार्गु में मधु मिलाकर पीये। लाव आदि विकिर प्राणियों के मांसरस में प्रचुर, नमक, अनारदाना मिलाकर पीये। उष्ण एवं लवण मिश्रित एरण्ड तैल आदि का स्नेह विरेचन वात छर्दि में प्रशस्त है। ('कोष्णं सलवणं चात्र हितं स्नेहविरेचनम्' अंधागहृदय)।
पित्तोपशमनीयानि पाक्यानि शिशिराणि च। कषायान्युपयुक्तानि धनन्ति पित्तकृतां वसीम् ॥२१॥
शोधनं मधुरैश्चात्र द्राक्षारससमायुतैः।
बलवत्यां प्रशंसन्ति सर्पिस्तैल्वकमेव च ॥२२॥
पित्तव्वरशामक कषाय, क्षीतकषाय सेवन करने पर पित्तजन्य वमन को शान्त कर देते हैं। मधुर शोधन द्रव्यों को द्राक्षारस में मिलाकर वमन विरेचन या कैवल विरेचन रूपी शोधन देवे। बलवती छर्दि में तैल्वकघृतपान उत्तम है। (तैल्वकघृत वातव्याधि में कहा है) ॥२१, २२॥
आरग्वधादिनियुहं दशाङ्गयोगमेव वा।
पाययेताथ सखोद्भ कफजायां चिकित्सकः ॥२३॥
कफजन्य छर्दि में आरग्वधादि गण का कषाय या दशांग योग को मधु के साथ पिलाये।
वक्तव्य—दशांग शब्द से कोई दशमूल लेते हैं। कोई कटुका चित्रण इत्यादि कफव्वरैक लेते हैं। दूसरे—“नागर धान्यकं भार्गामभयां सुरदारु च। वचां पर्पटकं मुस्तं भूतीकमय कटफलम्। विनिष्कवाध्य पिबेत् ॥” इसका ग्रहण करते हैं ॥
कृतं गुड्वचना विधिवत् कषायं हिमसंज्ञितम्।
तिसुष्वपि भवेत् पथ्यं माक्षिकेण समन्वितम् ॥२४॥
गिलोय का क्षीतकषाय विधि से बनाया कषाय मधु के साथ वातादि तीनों प्रकार की वमन में प्रशस्त है।
विधि—“द्रव्यादापोस्थितास्त्रोये प्रतप्ते निधि संस्थितात्। कषायो योऽभिनियति स क्षीतः समुदाहृतः ॥ षड्भिः पलैः चतुर्भिर्वा सलिलाच्छीतफाण्टयोः। आप्लुतं भेषजपलं रसाख्यस्य पलहृयम्” ॥२४॥
बीभत्सजां हृद्यतमेदौहृदीं काङ्क्षितैः फलैः।
लह्वनैर्वसनेश्चामां सात्स्यैः सात्स्यप्रकोपजाम् ॥२५॥
क्रुमिहृद्भोगवद्यापि क्रुमिजां साधयेद्भीमम्।
बीभत्सजन्य छर्दि को हृदय के लिये अति प्रिय फल देकर, दौहदजन्य (गर्भावस्थाजन्य) वमन को इच्छित फलों को देकर, आमजन्य छर्दि को लंघन एवं वमन से, सात्स्य प्रकोपजन्य वमन को सात्स्य वस्तुओं से, क्रुमिजन्य छर्दि को क्रुमिजन्य हृद्भोग की भांति चिकित्सा करे ॥२५॥