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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ५० ]

उत्तरतन्त्रम्

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वितरेच्छ चथादोषं शस्तं विधिमतन्तरम् ॥२६॥ वमन (तात्कालिक रूप में) बन्द हो जाने पर दोष के अनुसार चिकित्सा करना उत्तम है, (जिससे फिर वमन न हो)॥ दधिस्थरससंसर्का पिप्पली माक्षिकाविक्ताम् । मुहुर्मुहुर्नरो लीडवा छर्दिभ्यः प्रवि (ति) मुच्यते ॥२७॥ समाक्षिका मधुरसा पीता वा तण्डुलाम्बुना । तर्पणं वा मधुयुतं तिस्रणामपि भेषजम् ॥२८॥ स्वयंगुमां सयष्टथाङ्गां, तण्डुलाम्बुमधुद्रवाम् । पिबेद्यवागूमथवा सिद्धां पत्रैः करञ्जैः ॥२९॥ युक्ताम्ललवणाः पिष्टाः कुस्तुम्बुयोर्यथवा हिताः । तण्डुलाम्बुयुतं खादेतुं कपिर्थं ज्यूपणेन वा ॥३०॥ सितचन्दनमध्वार्क्तं लिह्याद्वा मक्षिकाशक्तम् । पिबेत् पयोऽग्नितामं च निर्वाप्य गृहगोधिकाम् ॥३१॥ सर्पिः क्षौद्रयुतान् वाऽपि लाजशक्तान् पिबेत्या । सर्पिः क्षौद्रसितोपेतां मागधीं वा लिहेत्तथा ॥३२॥ धात्रीरसे चन्दनं वा घृष्टं सुदृगदलाम्बुना । कोलामलकमञ्जानं लिह्याद्वा त्रिसुगन्धिकम् ॥३३॥ सखौद्रां शालिलाजानां यवागूं वा पिबेन्नरः । घ्रेयाण्युपहरेच्छापि मनोप्राणसुखानि च ॥३४॥ जाङ्गलानि च मांसानि शुभानि पानकानि च । भोजनानि विचित्राणि कुर्यात्सर्वास्वतन्द्रितः ॥३५॥

कैथ के रस में पिप्पली मिलाकर मधु के साथ बार-बार चाटने से रोगी वमन से मुक्त हो जाता है। मूवों को मधु के साथ चावलों के पानी से पीने पर वमन शान्त होता है। लाजा सत्तू का तर्पण मधु के साथ देना वातादि तीनों छर्दियों में उत्तम है। कौंच, मुलेहटी, इनको चावल के धोवन में घोलकर मधु मिलाकर पीये। करंज के पत्तों से सिद्ध की हुई यवागू को पीये। उचित परिमाण में अनारदाना इमली अमचूर आदि अम्ल, लवण के साथ पीसा धनिया (धनिया की बटनी, पोदीना भी) उत्तम है। कैथ को चावलों के पानी से या त्रिकटु के साथ खाये। मक्खी की बिछा को शर्करा, चन्दन और मधु के साथ चाटे। गृहगोधिका को आग में गरम करके पानी में डालकर, इस पानी को पीये। इसी प्रकार लाजा सत्तूओं को घी और मधु के साथ खाये। पिप्पली को घी, मधु, शर्करा के साथ चाटे। आंवले के रस में चन्दन को घिसकर मूँग की दाल के पानी से पीये (मूँग के ओसावण से पीये) बेर, आँवले की मउजा को या स्वग् (दालचीनी, इलायची, तेजपात) इनको मधु के साथ चाटे। शालिधान्यों से बनाई लाजा को यवागू को पीये। मन और नासिका को सुख देनेवाली सुगन्धियों को सूँघे। जांगल, मांस, उत्तम पेय, विचित्र नाना प्रकार के भोजन सब प्रकार की छर्दियों में बिना आलस्य के बरते।

वक्तव्य—सन्निपातजन्य छर्दि में तीनों दोषों की कड़ी चिकित्सा करे, यथा—“येषां पृथक्त्वेन मया क्रियोक्ता तां सन्निपातेषु च तीक्ष्णबुद्ध्या । रोगेषु दोषान्नवलाद्यपेक्षया, कुर्वाद्भिषक् शाल्कविवौ विचक्षणः ॥ गृहगोधिकारमटीकृतं मुन्मयं गृहमुच्यते ।” इससे वर्णित कीड़े का मिट्टी का घर लेकर उसे आग में गरम करके पानी में बुझाकर पानी पीये। यथा चरक में—“मृदुभुजलोघ्रमवं वा” ॥२७-३५॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे छर्दिप्रतिषेधो नाम (एकादशोऽध्यायः, आदितः) एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥४६॥

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अथातो हिंकाप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ अब इसके आगे हिंका प्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे— जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥ विदाहिगुरुविष्टभिर्लक्ष्मभिष्यन्दिभोजनेः । शीतपानासनस्थानरजोभूमानिलानलेः ॥३॥ व्यायामकर्मभाराधवैगाघातापतर्पणेः । आमदोषाभिघातव्क्षोद्यदोषप्रपीडनेः ॥४॥ विषमाशनाध्यशनेस्तथा समशनेरपि । हिंका श्वासश्च कासश्च नृणां समुपजायते ॥५॥ विदाही, गुरु, विष्टभिर्, लक्ष्म, अभिष्यन्दि भोजनों से शीतपेय, शीतआसन, शीतलस्थान, धूल, धूम, वायु और अग्नि से, व्यायाम, कार्य (परिश्रम कर्म), भार उठाना, मुसाफरी, मलमूत्रादि के वेगों को रोकने से, अपतर्पण से, आमदोष से, अभिघात से, स्त्री सेवन से, दोषों से पीड़ित होने से, विषमाशन से, अध्यशन से, और समशन से मनुष्यों में हिंका, श्वास, कास उत्पन्न होते हैं। वक्तव्य—आम-उष्णोऽल्लवलत्वेन धातुमायमराचितम् । दुष्टमामाशयगतं रसमामं प्रचक्षते ॥ हिताहितोपसंयुक्तमलं समशनं स्मृतम् । बहुशस्तोकमकाले वा तज्ज्यं विषमाशनम् । अजीर्णं भुज्यते त्रयमेतन्निहन्त्याशु यत्तु तदध्यशनमुच्यते । बहून्याधीनकरोति वा ॥

सु० सू०अ० ४६-५० ॥३-५॥

मुहुर्मुहुर्वायुरुदेति सस्वने यकृत्प्लिहान्न्राणि मुखादिवाक्षिपन् ।

स घोषवानाशु हिन्त्यस्यसून् यत-

स्ततस्तु हिंकेति भिषगिभिरुच्यते ॥६॥

शब्द के साथ उदानवायु बार-बार, यकृत, लीडा, आँतों को सुख में लाकर बाहर फेंकती प्रतीत होती है, यह शब्दयुक्त

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