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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 812

७९६ युश्चतसंहिता [ अ५ ५, वायु क्योकि प्राणो को नेष्ट करती दै, इस्च्यि वेद्य इसको | ुदरवातो यदा कात्‌ व्याथामपरिषदधितः | दिका (दिक्‌ इति कृतवा कायति शम्दायते) कहते दै । कण्ठे प्रपद्यते दिक्कां तदा जुद्रां करोति सः | वि० मन्तव्य दिक्छा-दिक अव्यक्ते शब्दे । अतिदुःखा न सा नोरःशिरोममंप्रवायिनी | परस्मेषदी सेट्‌ ) धातु भी है, जिससे दिका शब्द्‌ निष्पन्न होता नचौच्छवासान्नपानानां मागृ माद्य तिष्ठति ॥ है जर यं पर दिक्‌ हिखायां (बु आ० सेट्‌ ) से हिका शब्द शद्धिमायस्वतो याति सुक्तमातरे च मादंवम्‌ ।

बनाया गया है । हमारा विचार दै कि दिक अव्यक्तं शब्दे यतः प्रतते पूव तत एव निवत्तते ॥ धातु से दी दिका शब्द की निष्पत्ति मानना उचित है, क्योकि हृदयं क्लोम कण्ठं च तालुकं च समाधिता |

समी हिका प्राणों का हिंसन नहीं करती हैँ । हिष्छा को हिचको मृद खा कुद्रदिक्केति णां साध्या प्रकीर्तिता ॥११॥ या इचकी कहते दै । इसमे “हिक” ध्वनि निकलती है, अतः नामिप्रदत्ता या हिका घोरा गम्भीरनादिनी ॥१२ यह दिका कही जाती ३ ॥६॥ ` शष्कोष्ठकण्ठजिहास्यश्वासपावेरजाकरी ।

अन्नजां यमडाी द्रं गम्भीरां महतीं तथा । अनेकोपद्रवयुता गम्भीरा नाम सा स्मृता ॥१३॥ वायुः कफेनायुगतः पठ्च दिक्षा: करोति हि ॥७॥

वायु कफ से मिलकर अन्नजा, यमला, क्ञद्रा, गम्भीरा

ओर महती नाम की पांच हिकाओं को उत्पन्न करती है ॥७॥ मुखं कषायमरतिर्गोरवं कण्ठवक्चषसोः । पूवेरूपाणि दिंक्ानामाटोपो जठरस्य च ॥८॥ ू्॑रूप--युल मे कसेापन, बेचैनी, गले ओर छाती मे

भारीपन, उदर मे आध्मान ये दिका के पूरवेरूप है ॥८॥

त्वरमाणस्य चाहारं सुन्जानस्याथवा घनम्‌ । वायुरन्नेरवस्तीणेः कटुकैरदितो भृशम्‌ ॥९॥ दिकय्य॒ध्वेगो भूर्वा तां विद्यादन्नजां भिषक्‌ ।

आहार को जल्दी जल्दी खाते इए अथवा भारी या सान् अन्न को खाते इण एवं कटु वस्त॒ओं से अतिशय पीडित र वायु अन्न से आत होकर ऊपर की ओर गति करफे हिष्ठा उत्पन्न करती हे, इस हिका को वेय अन्नजा दिका जाने । (वायु खमान एवं उदान्‌) ॥६॥ चिरेण यमरेवगैयो हिका संभरवतते ॥१०॥ कम्पयन्ती शिरोप्रीवं यमलां तां विनिर्दिशेत्‌ । जो दक्वा देर में थमक (एक खाथ दो-युगम रूप म) वेगो स प्रवृत्त होती हे, उसे यमला दिक्का कहते है, हमे शिर ओर ग्रीवा दोनों दिटते ह । चरक-- |

व्यपेता जायते हिक्का याऽन्नपाने चतर्विषे। आह्यपरिणामान्ते मूयश्च लभते बलम्‌ ॥ प्रलापवम्यतीसारवृष्णार्तस्य विचेतसः । . जम्भिणो विष्लुताक्षस्य शुष्कास्यस्य विनामिनः ॥ पय्याष्मातस्य दहिक्धा या जनुमूढादबन्तता । खा व्यपेतेति विचेया दिका प्राणोपरोधिनी ॥१०॥ विङटकाञ्या बेगेमन्द्रः समभिवतेते ॥१९॥ चद्रिका नाम सा हिका जनुम्‌डात्‌ प्रधाविता । प्ररिभम या मेहनत करने के समय मन्दवेग से जो हिक्का भशरभूर से उलन्न शोत ३, उसे दगरका दिक्का कते रं ।

वाटी होती है वह कष्टसाध्य है । इस दिक्का मे ओट-कण्ड- जिहा-मुख सूख जाते रँ, श्वास एवं पाश्वं शरू होता ६। ज्वर, श्वास, वृष्णा आदि अनेक उपद्रव इसमें होते है, इको

गम्भीरा कहते ह ॥१२,१३॥

ममौण्यापोडयन्तीव सततं या प्रवतेते।

देहमायम्य वेगेन घोषयत्यतित॒ष्यतः ॥

महादिकेति सा ज्ञेया सवंगात्रप्रकस्पिनी ॥९४॥

बस्ति, हृदय, शिर मर्मोकोया (नामि हदय ओर स्नः

मू ममो को) पीड़ित करती इर जो हिक्का निरन्तर प्रवृत्त

को बहुत प्यास रहती हो, इसे महा दिक्का कहते है, इसके वेग

के समय रोगी का सारा शरीर दिर जाता है।

क्षीणमांसबलध्राणतेजखः सकफोऽनिकः ।

गहीत्वा सहसा कण्ठशरुच्चेः घोषवतीं भृशम्‌ ॥

करोति सततं हिक्कामेकद्वित्रिगुणां तथा ।

प्राणः खोतांसि ममांणि संरध्योष्माणमेव च ॥

संजा मुष्णाति गात्रस्य स्तम्भं संजनयत्यपि ।

माग चेवान्नपानानां रणद्धिः अपहतस्पृतेः ॥

साशरुविप्ठयुतने्रस्य स्तन्धशंखच्युतभरुवः ।

सक्तजल्पप्रलपस्य निदत्त नाषिगच्छतः ॥

महातेजा महावेगा महाशन्दा महाबला ।

महाषक्केति सा नणां सयः प्राणहरा मता ।'चरक॥ 6

, वि मन्तव्य-मगवान्‌ पुनवेयु के शब्द्‌ व

काऽनवाहीनि लोतांषि खकफोऽनिकः । हिक्काः करा

च° चि० अ० १ ७, अथांत्‌- प्राणबाही, जलवाही तथा वायु

वाही लोतो भ कफ के साथ अथवा कफ द्वारा सकक

हिक्का रोग को उत्वन्न करता दे । ताय यह दैकि

८ मेवायुकफ़ द्वार सक जाता रै भौर अब कफ

ति संरध्य।

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जो हिक्का नाभि से आरम्भ होने के कारण गम्भीर शब्द्‌. `

न क च [वा न का दो ज

ककव

होती दै, शरी को खींचकर वेग के साय शन्द करती ह) रोग |