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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ५० ]

उत्तरतन्त्रम्

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को तोड़कर निकलता है तब हिकका के रूप में निकलता है । अन्नजा हिकका की प्रवृत्ति—अन्नवाही क्षोत्स अर्थात् आमाशय से होती है और आहार मार्ग में से होकर वायु बाहर आता है । यमला वह है जिसमें एक साथ दो हिकका आती हैं, परन्तु इसमें व्यवधान काल अन्य हिककाओं की अपेक्षा कुछ लम्बा होता है । इसे चरक में व्यपेता कहा गया है । व्यपेता अर्थात् विप्रकृष्ट कालं यावत् अपगत्य संशय इता प्राप्ता=जो कुछ ठहरकर आती है । और इसकी प्रवृत्ति भी अन्नवाही क्षोत्स से होती है । देखिये “व्यपेता प्राणीपरोधिनी” पाठ श्लोक० १० के नीचे । गम्भीरा—नाभि से-प्राणवाही क्षोत्स से हृदय एवं फुफ्फुसों में होकर श्वास मार्ग से आती है । इसी कारण इसमें श्वास एवं पार्श्वरुजा होती है । महाहिकका—भीषण हिकका होती है, निम्नलिखित चरकोक्त शीर्ष...सता पाठ देखिये । इसकी प्रवृत्ति में नाभि, हृदय आदि मर्मों के साथ र उदक-वाही क्षोत्स की विकृति भी कारण होती है । अतएव इसमें अतितृष्णा भी रहती है और अतएव चरक के शब्दों में यह हिकका सद्य.प्राणहरा होती है ॥१४॥

आयम्यते हिककतोऽङ्गानि यस्य

हृष्टिशोध्यं ताम्यते यस्य गाढम् ।

क्षीणोऽन्नद्विट् कासते यश्च हिककी

तौ द्वावन्त्यौ वर्जयेद्विककमानौ ॥१५॥

हिककी लेते हुए जिस पुरुष के अङ्ग तन जाते हैं (लम्बे हो जाते हैं), आलें ऊपर को चढ़ जाती हैं, गहरा अन्धेरा सामने आ जाता है, क्षीण, अन्न से द्वेष करनेवाला, जिस हिकका रोगी को खांसी होती हो, महाहिकका और गम्भीरा हिककावाले, ये रोगी असाध्य हैं ।

अतिसंचितदोषस्य भक्तच्छेदकृशस्य च ।

व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्यातिव्यवायिनः ॥

आसां या सा समुत्पन्ना हिकका हन्यशु जीवितम् ।

यमिका च प्रलापार्चिदृणा मोहसमन्विता ॥

अक्षीणश्चाप्यदीनश्च स्थिरधात्वन्दिन्यश्च यः ।

तस्य साधयितुं शक्या यमिका हन्यतोऽन्यथा ॥ चरक ।

वि० मन्तव्य—गम्भीरा तथा महाहिकका राज्यद्वमा आदि अनेक रोगों में मृत्यु के समय उत्पन्न हो जाती हैं अथवा यों कहिये कि उन रोगों में जब उक्त हिकका उत्पन्न हो जाती है तब सद्यः मृत्यु हो जाती है । सद्यः शब्द का प्रयोग सतरात्र-सतराह के लिये प्रयुक्त होता है, यथा—तत्र सद्यः प्राणहराणि सतरात्राम्यन्तरात् मारयन्ति (सु० शा० अ० ६।२३) आयुर्वेदीय परिभाषा में सात दिन के भीतर मृत्यु होना सद्यः मृत्यु कहलाता है ॥

प्राणायामोद्देजनत्रासनानि

सूचीतोदेः संभ्रमश्चात्र गरयः ।

प्राणायाम ( वायु का अवरोध ), उद्देजन, डराना, सूई झुंभोकर मन को व्याकुल करना ये उपाय करे ।

वक्तव्य—कुम्भक, पूरक, रेचक भेदों से कुम्भक प्राणायाम ( वायु को ऊर्ध्वगति को रोकना ) उत्तम है ।

वि० मन्तव्य—सम्भ्रमः-अचम्भा, उद्देजन-घवराहट उत्पन्न करना । देखा जाता है कि स्वस्थ की लुढ़ा हिकका इन उपायों से शान्त हो जाती है ।

यष्ट्याह्वा वा माक्षिकेणावपीडे

पिप्पल्यो वा शर्कराचूर्णयुक्ताः ॥१६॥

मुलैहटी को मधु के साथ या पिपल की शर्करा चूर्ण में मिलाकर अवरीइन नस्य से देवे ॥१६॥

सर्पिः कोष्णं क्षीरमिक्षो रसो वा

नाविक्षोणे छूर्दंनं शान्तिहेतोः ।

गरम घी, दूध या ईल का रस पीना उत्तम है, रोगी बहुत क्षीण न हुआ हो तो वमन देना प्रशस्त है ।

नारीपयःपिष्टमशुक्लचन्दनं

घृतं मुखोष्णं च ससैन्धवं तथा ॥१७॥

चूर्णाकृतं सैन्धवमभ्रसाध्यवा

निहन्ति हिककां च हितं च नस्यतः ।

लालचन्दन को धावन में पीसकर नस्य देवे । सुहाते गरम घृत में सैन्धव मिलाकर नस्य देवे । सैन्धव को चूर्ण करके पानी मिलाकर नस्य देवे । इससे हिकका रोग नष्ट होता है ॥१७॥

युष्क्याद् धूमं शालनिर्वासजातं

नेपालं वा गोविषाणोद्भवं वा ॥१८॥

सर्पिः स्निग्धैश्चम्रं बालैः कृतं वा

हिककास्थाने स्वेदनं चापि कार्यम् ।

राल का धुँवा, या मैनसिल का या गाय के सींग का अथवा गाय के चमड़े-बालों को घी से स्निग्ध करके, इनसे धुँवा देवे । हिकका के स्थान कण्ठ और स्तनों के बीचमें स्वेदन करे । “मधुच्छिष्टं सर्जरसं घृतं मल्लकसंपुटे । कृत्वा धूमं पिबेच्छूर्णं बालं वा स्नायुं वा गवाम्” ॥ चरक ॥१८॥

क्षौद्रोपेतं गैरिकं काञ्चनाह्वं

लिह्याद्भ्रमस्य प्राग्यसत्त्वास्थिजं वा ॥१९॥

तद्रुच्छुवाविन्मेषगोशस्य (झ) कानां

रोमाण्यन्तधूमसदग्धानि चात्र ।

सध्वाज्याक्तं बहिपत्रप्रसूत-

मेवं भस्मोद्भुम्बरं तैलकं वा ॥२०॥

स्वजिज्ञासं बीजपूराद्भ्रमेन

क्षौद्रोपेतं हन्ति लीड्वाऽऽशु हिककाम् ।

स्वर्णगैरिक को मधु के साथ चाटे । ग्राम्य सत्त्व ( गाय-बकरी आदि ) की अस्थियों की भस्म को मधु के साथ चाटे । सेह, मेढा, गाय, झल्लक इनके रोगों को अन्तर्धम विधि से जलाकर इनकी राख को मधु के साथ चाटे । मोर के पंखों