सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुभतसंहिता
[ अ० ५० ]
की भरम को गुलर या तिल्वक ( लोध ) के छाल की भरम को मधु और घी के साथ चाटे । स्वर्जिक क्षार को बिजौर के रस और मधु के साथ चाटने से हिक्का तुरन्त शान्त होती है ।
वक्तव्य—कफ से वायु का मार्ग अवरुद्ध होने से हिक्का होती है, इसलिये इन लेहों से मार्ग शोधन होता है । यथा— भारतः प्राणवाहीनि स्रोतांसि आविश्य कुप्यति । उरःस्थकफ-मुदधूय हिक्का श्वासान्करोति सः ॥ प्राणोदकवाहीनि स्रोतांसि सकफोऽनिलः । हिक्कां करोति संस्थ्य ॥ चरक ॥१८,२॥
सर्पःस्निग्धा इन्ति हिक्कां यवाग्बः
कोष्णप्रासाः पायसो वा सुखोष्णः ॥२१॥
घी से स्निग्ध हुई यवागू हिक्का को नष्ट करती है, गरम कवल (गण्डूधू) अथवा गरम खीर हिक्का को नष्ट करती है ॥
गुण्टीतोये साधितं क्षीरमाजं तद्वत् पीतं शर्करासंयुतं वा ।
आतृप्तेर्वा सेयमानं निहन्त्याद् प्रातं हिक्कामाशु मूत्रं त्वर्जान्योः ॥२२॥
सोठ के क्वाथ में ( दूध से चार गुणे ) सिद्ध किया बकरी का दूध पीने पर हिक्का को नष्ट करता है । शर्करा मिश्रित दूध वृत्ति पूर्वक ( पेटभर कर ) पीने से हिक्का को नष्ट करता है । बकरी या भेड़ का मूत्र नासा से सूँघने पर ( नस्य लेने पर ) हिक्का को नष्ट करता है ॥२२॥
सपूतिकीटं लघुनोमग्रन्धा-
हिक्कं वज्रमाचूर्ण्य सुभावितं तत् ।
पूतिकीट ( तेलिया कीड़ा ) को लहसुन, वज्र, हींग कमल के चूर्ण में मिलाकर बकरी या भेड़ के मूत्र में बहुत बार भावित करके सूँघने पर हिक्का को नष्ट करता है । ( पूतिकीट-तेलियाकीड़ा-वर्षा में बहुत होता है ) ।
श्वोद्रं सितं वारणकेशरं च
पिवेद्रे सेनेनुमधूकजेन ॥२३॥
नागकेशर, मधु, शर्करा, इनको ईख के रस से तथा महुए के रस के साथ पीये ।
वक्तव्य—षोडशाष्टचतुर्भागवातपित्तकफात्तिष्ठु । श्वोद्रं कषाये दातव्यं विपरीता तु शर्करा ॥ कर्षश्चूर्णस्य कल्कस्य गुटिकानां तु सर्वशः । द्रवशुक्त्याऽवलेदव्यः पातव्यश्च चतुर्गुणे ॥२३॥
पिवेत् पलं वा लवणोत्तमस्य
द्वारभ्यां पलाभ्यां हविषः समग्रम् ।
सैन्धव नमक एक पल को घी की दो पल मात्रा के साथ सम्पूर्ण रूप में पीये । ( यह उत्तम मात्रा है, हीन, मध्यम रोगी के विचार से कम कर लेवे ) ।
हरीतकी कोष्णजलातुपानां
पिवेदधूतं क्षारमधूपपन्नम् ॥२४॥
रसं कपिथान्मधुपिप्ललीभ्यां
गुक्तिप्रमाणं प्रपिबेत् सुखाय ॥२५॥
गरम जल के अनुपान से हरङ्ग का चूर्ण पीये । यवक्षार, मधु को गरम घी में मिलाकर पीये । कैथ के रस से मधु-पिप्लली को आधे पल की मात्रा में पीये । ( मधु आधापल पिप्लली कर्ष-मात्र, कैथ के स्वरस से आरोग्य के लिये पीये । डल्हण ने क्षार के स्थान में क्षीर पढ़कर अर्थ किया है ) ॥२४,२५॥
कृष्णां सितं चामलकं च लीठं
समृद्धवैरं मधुनाऽथवाऽपि ।
कोलास्थिमज्जाञ्जनलाजचूर्णं
हिक्कां विह्नयान्मधुनाऽवलीदम् ॥२६॥
पिप्लली, शर्करा को मधु से चाटे, आंवला सोंठ और मधु को चाटे, यह दूसरा योग है । बेर की गुठली मज्जा, सौवीरांजन, लाजा-चूर्ण, इनको मधु से चाटे, इस से हिक्का नष्ट होती है ॥
पाटलायाः फलं पुष्पं गैरिकं कटुरोहिणी ।
खजूरं मध्यां मागध्यां काशीसं दधिनाम च ॥२७॥
चत्वार एते योगाः स्युः प्रतिपादप्रदर्शिताः ।
मधुद्वितीयाः कर्तव्यास्ते हिक्कासु विज्ञानता ॥२८॥
चारयोग—( १ ) पाटला का फल और पुष्प, ( २ ) गेह और कुटकी, ( ३ ) खजूर की गुठली और पिप्लली, ( ४ ) काशीस और कैथ, ये चार योग प्रत्येक पाद में कहे हैं, इनको मधु के साथ मिलाकर चाटे, इनको हिक्का में बरतना चाहिये ॥
कपोतपारावतलावशल्लक-
श्वदंष्ट्रगोधावृषदंशजान् रसान् ।
पिवेत् फलाच्छान्हिमान् ससेन्धवान्
स्निग्धस्तित्थैवर्ष्यमृगद्विजोद्भवान् ॥२९॥
कबूतर, पारावत, बटेर, शल्लकी ( सेह ), श्वदंष्ट्र, गोधा, वृषदंश ( बिल्ली ) इनके तथा ऋष्य, मृग, पक्षी ( जंगल विकिराः ) इनके मांस रसों को अनार आदि अम्ल से खड़ा करके घूत से स्निग्ध करके, सैन्धव मिलाकर गरम-गरम पीये ॥
विरिचनं पथ्यतमं ससेन्धवं
घृतं सुखोष्णं च सितोपलायुतम् ।
सदागतावृषगतेऽनुवासनं
वदन्ति केचिच्छ हिताय हिक्किनाम् ३०
सैन्धव मिश्रित विरेचन अतिशय पश्य है, मिश्री मिला सुहाता गरम घूत पीना उत्तम है । कई आचार्य ऊर्ध्वगामि वायु के लिये हिक्का रोगियों को अनुवासन बस्ति देना हितकारी कहते हैं । ( ये योग दोष की अधिकता देखकर बरतने चाहिये ) ॥३०॥