सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 815, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५१ ]
उत्तरतन्त्रम्
७५६
इति श्रीसुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सा तन्त्रे हिककाप्रतिषेधो नाम (द्वादशोऽध्यायः, आदितः) पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५०॥
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
अथातः श्वासप्रतिषेधं व्याख्येयस्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे श्वास प्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे—
जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
यैरेव कारणैर्हिकका बहुभिः संप्रवर्तते ।
तैरेव कारणैः श्वासो घोरो भवति देहिनाम् ॥३॥
जिन विदाहि आदि बहुत से कारणों से हिकका उत्पन्न होती है, उन्हीं कारणों से मनुष्यों में भयानक श्वास उत्पन्न होता है । इसी से कहा है—
कारणस्थानमूलैक्यादेकमेव चिकित्सितम् ।
द्वयोरपि यथा दृष्टं श्रुषिभिः तन्निबोधत ॥ चरक ॥३॥
विहाय प्रकृतिं वायुः प्राणोऽथ कफसंयुतः ।
श्वासयस्यूर्ध्वगो भूत्वा तं श्वासं परिच्छत्ते ॥४॥
प्राणवायु अपनी प्रकृति को छोड़कर (ऊर्ध्वगामि बनकर) कफ के साथ मिलकर जब श्वास उत्पन्न करता है, तब इस अवस्था को श्वासरोग कहते हैं ।
यदा क्षोतांसि संदृध मातुतः कफपूर्वकः ।
विष्वगं व्रजति संदृद्धः तदा श्वासान् करोति सः ।
प्राणवायु कफ के साथ मिलता है, परन्तु अन्य दोष भी इसमें मिलते हैं, यथा—
“तुद्रको वातिकः श्लेभमभूषिष्ठस्तमकः स्मृतः ।
छिन्नः रिक्तप्रधानः स्यादन्यो मातुतकोपजो ॥”४॥
तुद्रकस्तमकश्चिन्नो महान्पूर्ध्वश्च पञ्चधा ।
भिद्यते स महान्याधिः श्वास एको विशेषतः ॥५॥
तुद्रक, तमक, छिन्न, महान्, और ऊर्ध्वश्वास भेद से श्वास नामक एक महान् रोग पाँच प्रकार का है ॥५॥
प्रामृपं तस्य हृत्पीडा भक्तद्वेषोऽरतिः परा ।
आनाहः पार्श्वयोः शूलं वैरस्यं वदनस्य च ॥६॥
पूर्वरूप—हृदय में पीड़ा, भोजन में द्वेष, बहुत बेचैनी, आनाह, पार्श्वों में शूल, मुख में विरसता, ये पूर्वरूप हैं ॥६॥
किञ्चिद्वायरभमाणस्य यस्य श्वासः प्रवर्तते ।
निषण्णस्यैति श्रांतिं च स तुद्र इति संज्ञितः ॥७॥
कुछ भी (थोड़ा सा भी यकान होने पर) काम करने से जिसको श्वास चढ़ने लगता है, और बैठ जाने से शान्त हो जाता है, उस श्वास को तुद्र श्वास कहते हैं ।
वक्तव्य-पहाड़ पर चढ़ने से या कईयों को सीढ़ी पर चढ़ने से जो हांपनी चढ़ती है, थोड़ी देर बैठने से शान्त हो जाती है, वह तुद्रश्वास है ॥७॥
तुद्रस्वेदवमशुभ्रायः कण्ठघुर्णुरिकान्वितः ।
विशेषाद् दुर्दिने ताम्येच्छासः स तमको मतः ॥८॥
षोषेण महताऽऽविष्टः सकासः सकफो नरः ।
यः श्वसित्यबलोऽन्तद्विट् सुमस्तमकपीडितः ॥९॥
स शाम्यति कफे हीने स्वपतश्च विवर्धते ।
मूच्छांज्वराभिभूतस्य ज्ञेयः प्रतमकस्तु सः ॥१०॥
जिस श्वास में प्यास, स्वेद, वमन अधिकता से हो, गले में घर्षादह हो, खासकर बादल के आने पर पीड़ा देवे, इस श्वास को तमक कहते हैं । तमक श्वास से पीड़ित, निर्बल, अन्न से द्वेष करनेवाला, सोते हुए बड़े भारी शब्द के साथ, कफयुक्त खांघता है, तथा कफ के कम होने पर जो शान्त हो जाता है, सोने पर बढ़ता है, रोगी मूच्छां, ज्वर से पीड़ित हो, उस श्वास को प्रतमक कहते हैं ॥
ज्वरमूच्छांज्वरातीत्य विद्यात्प्रतमकं तु तत् ।
उदावत्सरजोऽजीर्णकिल्नकायनिरोधजः ॥
तमसा वर्धतेऽत्यर्थं शीतैश्चाशु प्रशम्यति ।
मज्जतस्तमसीवाऽथ विद्यात्संतमकं तु तम् ॥११॥
आधमातो दह्यमानेन बस्तिना सरुजं नरः ।
सर्वप्राणेन विच्छिन्नं श्वस्यच्छिन्नं तमादिशेत् ॥१२॥
आधमानयुक्त, बस्ति (मूत्राशय में) दाह, वेदना के साथ जो प्राणि सम्पूर्ण रूप में रुकता हुआ श्वास लेता है, उसे छिन्नश्वास कहते हैं ॥
वक्तव्य—इसमें रोगी का श्वास कुछ समय (मिनिटों) के लिये एकदम रुका प्रतीत होता है, फिर कुछ देर बाद आरम्भ हो जाता है । यथा—यस्तु श्वसिति विच्छिन्नं सर्वप्राणेन पीडितः । न वा श्वसिति दुःखात्तौ मर्मच्छेदरुग्गदितः । आनाहस्वेदमूच्छांज्वरां दह्यमानेन बस्तिना । विष्णुताश्च परिक्षीणः श्वसनं रत्नेकलोचनः ॥ विचेताः परिशुष्कास्थौ विवर्णः प्रलपन्नः छिन्नश्वासेन विच्छिन्नः स शीघ्रं प्रजहात्यस्तु ॥१३॥
निःसंज्ञः पार्श्वशूलार्तः शुष्ककण्ठोऽतिघोषवान् ।
संरुधनेनस्तव्यायम्य यः श्वस्यात् स महान् स्मृतः ॥
चेतना रहित, पार्श्वशूल से पीड़ित, शुष्क कण्ठ युक्त, जोर के शब्द के साथ, शोथ युक्त आँखोंवाला, झुककर (तुहैरा होकर) —जिसमें श्वास लेता है, उसे महान् श्वास कहते हैं ।
वक्तव्य—जैसे गाड़ी के बैल जब भागकर आते हैं, उनका श्वास दूर से ही सुनाई देता है, उस प्रकार इस रोगी के श्वास का शब्द दूर से सुना जाता है,—