सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 816, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 816

७६०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५१ ]

यथा—

उदधूयमानवातो यः शब्दवत् दुःखितो नरः ।

उच्चैः श्वसिति संकटो मत्सर्पभ इवानिशम् ॥

प्रनष्टशानविशानस्तथा विभ्रान्तलोचनः ।

विकृताक्ष्याननो बद्धमूत्रवर्चा विशीर्णवाक् ॥

वीनः प्रश्वसितं चास्य द्रातुं विशायते भुशम् ।

महार्शवासोपसृष्टः स क्षिप्रमेव विपद्यते ॥१२॥

समर्स्वायस्यमानेषु श्वसनमूढो मुहुश्च यः ।

ऊर्ध्वग्रेष्ठी हृतरवस्तमूर्ध्वश्वासमादिशेत् ॥१३॥

जिसमें, हृदय, वस्ति, शिर इन मर्मों के खिचने पर निश्चै बनकर जो मनुष्य बार-बार श्वास लेता है, ऊगर को देखता है, स्वर बैठ जाता है, उसे ऊर्ध्वश्वास कहते हैं। चरक चि० अ० १७—

दीर्घ श्वसिति यस्तुर्ध्वं न च प्रत्याहरत्यधः ।

श्वेष्माद्यतमुखस्तोताः कूड् गन्धवहादितः ॥

ऊर्ध्वदृष्टिर्विपर्यंश विभ्रान्ताश्च इतस्ततः ।

प्रमुह्यन्वेदनात्संश गुष्कास्योऽरतिपीडितः ॥

ऊर्ध्वं श्वासे प्रकुपिते ह्यधः श्वासो निरुध्यते ।

मुद्यतः ताम्यतश्चोर्ध्वं श्वासस्तस्यै वहन्यस्तु ॥१३॥

तुद्रः साध्यतमस्तेषां तमकः क्रुच्छ उच्यते ।

त्रयः श्वासा न सिध्यन्ति तमको दुर्बलस्य च ॥१४॥

इन श्वासों में तुद्र श्वास साध्य है, तमक श्वास कष्ट साध्य है। शेष तीन श्वास असाध्य हैं, दुर्बल व्यक्ति का तमक श्वास भी असाध्य होता है ॥१४॥

स्नेहवस्ति विना केचिदूर्ध्वं चाधश्च शोधनम् ।

मृदु प्राणवर्ता श्रेष्ठं श्वासिनामादिशन्ति हि ॥१५॥

कई आचार्य स्नेहवस्ति के बिना बलवान् श्वास रोगियों को मृदु (पीड़ा न करनेवाला), वमन और विरेचन देना श्रेष्ठ बताते हैं ॥१५॥

श्वासे कासे च हिकायां हृद्रोगे चापि पूजितम् ।

घृतं पुराणं संसिद्धमभ्याविदरामठैः ॥१६॥

श्वास, कास, हिका, हृदय रोग में—हरइ विडनमक और हींग से सिद्ध दस साल पुराना घृत देना श्रेष्ठ है ॥१६॥

सौवर्चलाभ्याविल्वैः संस्कृतं वाऽनवं घृतम् ।

पिप्पल्यादिप्रतीवापं सिद्धं वा प्रथमे गणे ॥१७॥

सपञ्चलवणं सर्पिः श्वासकासौ व्यपोहति ।

सौवर्चल, हरइ, बिल्व इनसे संस्कृत पुरातन घृत देवे अथवा विदारिगन्धादिगण के क्वाथ में पिप्पल्यादिगण का प्रक्षेप देकर घृत सिद्ध करे। पाँचों नमक के प्रक्षेप के साथ घृत का उपयोग श्वास और कास को नष्ट करता है ॥१७॥

हिंसाविदङ्गपूतीत्रिफलाव्योपचित्रकैः ॥१८॥

द्विक्षीरं साधितं सर्पिश्चतुर्गुणजलाप्लुतम् ।

कोलमात्रैः पिबेत्तद्वि श्वासकासौ व्यपोहति ॥१९॥

अर्गस्यरोचकं गुल्मं शक्रद्वैदं क्षयं तथा ।

कृत्स्ने वृषकषाये वा पचेत् सर्पिश्चतुर्गुणे ॥२०॥

तन्मूलकुसुमाबापं शीतं क्षौद्रेण योजयेत् ।

हिंसा (क्षिटी), बिडंग, करंज, त्रिफला, त्रिकटु, चित्रक, इनके कल्क से चौगुने जल में, एक प्रस्थ घी को दो प्रस्थ दूध के साथ सिद्ध करे। इसकी एक कर्ष मात्रा पीये, यह श्वास और कास को नष्ट करता है। अर्श, अरोचक, गुल्म, अतिसार और क्षय को नष्ट करता है। समूल पुष्प, शाला के साथ अडूसे का कषाय चार प्रस्थ लेकर इसमें एक प्रस्थ घी को अडूसा के मूल और पुष्प का प्रक्षेप देकर सिद्ध करे। इस शीतल घृत को मधु के साथ मिलाकर खाये।

वि० मन्तन्त्र—सुश्रुत के पुराने टीकाकार श्रीजिजट जी का कथन है कि “कृत्स्ने वृषकषाये……‘‘योजयेत्’’ पाठ यहाँ नहीं होना चाहिये क्योंकि अभ्रिम श्लोक २१ में “वासाघृतं…… भवेत्’’ पाठ में वासा घृत का विधान किया गया है। और श्री इल्लनाचार्य श्लो० २६ की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि ‘वासाघृतं घटपलं च इत्यादि वासाघृतं कृत्स्ने विषे तत्कुसुमैः इत्यादिना रक्तपित्तोक्तं पित्तप्रधाने श्वासे हितं’ (इ० टी०)। परन्तु वर्त्तमान सुश्रुत में ‘कृत्स्ने’ आदि पाठ रक्तपित्त प्रतिषेध में नहीं है अपितु शेष प्रतिषेध अ० १४ में है। अस्तु, हमारे विचार में यह कोई बड़ी समस्या नहीं है, क्योंकि एक स्थान पर योग एवं निर्माण विधि का उल्लेख और दूसरे स्थान पर केवल नामनिर्देश है। इन दोनों घृतों में भी एक में केवल कुसुमों का कल्क डालने का विधान है और दूसरे में मूल एवं कुसुमों का कल्क डालने का, अतः कोई दोष भी नहीं है॥

श्रुद्धीमधूलिकाभार्गीशुण्ठीतादर्थसिताम्बुवैः ॥२१॥

सहरिद्रैः सयष्ट्याहैः समेरावाण्य योगतः ।

घृतप्रस्थं पचेद्दीमान् शीततोये चतुर्गुणे ॥२२॥

श्वासं कासं तथा हिकां सर्पिरेतन्त्रियच्छति ।

काकडाशुंगो, मधूलिका, भागी, सोंठ, रवौत, शर्करा, मुस्ता, हल्दी, मुलेहटी, प्रत्येक समान भाग लेकर इनके कल्क से चारप्रस्थ शीतल जल में—एक प्रस्थ घी बुद्धिमान् सिद्ध करे। यह घृत श्वास, कास, को नष्ट करता है। (योगतः—का अर्थ कल्क इस प्रमाण में मिलाये कि घृत कटु न हो, चतुर्थीय परिभाषा से नहीं) ॥२१, २२॥

सुवहा कालिका भार्गीं शुकाख्यां नैचुलं फलम् ॥२३॥

काकादनीं श्रुद्धवैरं वर्षाभूवृहतीद्वयम् ।

कोलमात्रैर्घृतप्रस्थं पचेदेभिर्जलद्विकम् ॥२४॥

चट्टुणं पीतमेतद्वि श्वासामयविनाशनम् ।

सुवहा (निशोथ या गोधापदी), कालिका (काले