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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ५१ ] ६६

उत्तरतन्त्रम्

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यक), मार्गी, शुकाख्या (शिरीष), जलवेतसफल, काकादनी (कौआट्टी), सौठ, पुनर्नवा, कटेरी, कटेरी बड़ी, प्रत्येक आधा कर्ष लेकर इनसे एक प्रस्थ घृत, दो प्रस्थ जल में पकाये। यह कटु-उष्ण घृत पीने से श्वास रोग को नष्ट करता है ॥२३,२४॥ सौवर्चल्यवक्षारकटुकान्योषचित्रकैः ॥२५॥

वचाभयाविडङ्गैश्च साधितं श्वासशान्तये। गोपवल्कयुदके सिद्धं स्यादन्यदु द्विगुणे घृतम् ॥२६॥ सौवर्चल, यवक्षार, कुटकी, त्रिकुट, चित्रक, वच, हरड, विडंग इनके कल्क से जल में सिद्ध किया घृत श्वास को नष्ट करता है। सारिवाक्याथ, घी से दुग्गना लेकर, इसमें सिद्ध किया घृत श्वासनाशक है ॥२५,२६॥

पञ्चैतानि हवींष्याहुभिषजः श्वासकासयोः। हिंसादि ये पांचों घृत वैद्य श्वास, कास में बरतने के लिये कहते हैं। (हिंसादि शृग्यादि, सुवहादि, सौवर्चलादि, गोपवल्की आदि)।

तालीशतामलकयुग्माजोवन्तीकुष्ठसैन्धवैः ॥२७॥ बिल्वपुष्करभूतौकसौवर्चलकृणान्निभः। पथ्यातेजोवतीयुक्तैः सर्पिर्जलचतुर्गुणम् ॥२८॥ हिङ्कुगादयुतं सिद्धं सर्वश्वासहरं परम्। वासाघृतं षट्पलं वा घृतं चात्र हितं भवेत् ॥२९॥ तालीश, भूईआंवला, बच, जीवन्ती, कूठ, सैन्धव, बिल्व, पुष्करमूल, रोहिषघ्रास, सौवर्चल, पिप्पली, चित्रक, हरड, तेजबल इनके कल्क से एक द्रव्य की अपेक्षा हींग चतुर्थांश मिलाकर घी से चारगुणे जल में घृत सिद्ध करे। यह घी सब प्रकार के श्वासों को नाश करने में श्रेष्ठ है। वासाघृत (रक्तपित्तोक, पित्त श्वास में) षट्पलघृत (वातव्याधि में कहा वातप्रधान श्वास में) श्वासरोग में उत्तम है ॥२७-२९॥

तैलं दशगुणे सिद्धं भृङ्गराजरसे शुभे। सेव्यमानं यथान्यायं श्वासकासौ व्यपोहति ॥३०॥ तैल से दसगुणे भांगरे के निर्मलस्वरस में सिद्ध किया तैल उचित विचारणा एवं अच्छपान विधि से सेवन करने पर श्वास कास को नष्ट करता है ॥३०॥

फलाम्ला विकिररसाः स्निग्धाः प्रत्यक्तसैन्धवाः। एणादीनां शिरोभिर्वा कौलथा वा सुसंस्कृताः ॥३१॥ हन्युः श्वासं च कासं च संस्कृतानि पर्याप्ति च। बटेर आदि विकिर प्राणियों के मांसरस में धनारदाना, बिजौरा आदि अम्ल, घी या तैल स्नेह और उत्कट सैन्धव मिलाकर देवे। हरिण आदि के शिरों से बनाये मांसरस अथवा कुलथी के भली प्रकार संस्कृत गूथ श्वास और कास को नष्ट करते हैं, बृहत्पञ्चमूल आदि वातहर द्रव्यों से संस्कृत दूध श्वास, कास को नष्ट करते हैं ॥३१॥ तिमिरस्य च बीजानि कर्कटाल्या सुवर्चिका ॥३२॥

दुरालभाश्च पिप्पल्यः कटुकाख्या हरीतकी। श्वाविन्मयूररोमाणि कोला मागधिकाकणाः ॥३३॥ भागीर्वक् शृङ्गवैरं च शर्करा शल्लकाङ्कजम्। नूतकौण्डकबीजानि चूर्णितानि तु केवलम् ॥३४॥ पञ्च श्लोकाधिकस्त्वेते लेहा ये सम्यगीरिताः। सर्पिर्मधुभ्यां ते लेहाः कासश्वासादितैर्नैरैः ॥३५॥ पांचलेह-(१) तिमिर (तिनिश) के बीज, कर्कटशृङ्गी, सज्जीखार, (२) धमासा, पिप्पली, कुटकी, हरड, (३) सेह, मोर, इनके रोम, कोला (चम्य), पिप्पली, तण्डुल, (४) भागी की छाल, सौठ, शर्करा, शल्लक की छाल, (५) नूतकौण्डक के बीज अकेले, इनका चूर्ण, ये पांच लेह आधे श्लोक में कहे हैं, इन लेहों को घी और मधु के साथ कास श्वास से पीड़ित मनुष्यों को चटाना चाहिये ॥३२-३५॥

सप्तच्छदस्य पुष्पाणि पिप्पलीञ्चापि मस्तुना। पिवेतु संचूर्ण्य मधुना धानाश्चाण्यथ भक्षयेत् ॥३६॥ सप्तच्छद के पुष्प, पिप्पली इनका चूर्ण करके मस्तु के साथ पीये। धाना (भुञ्ज जो) को चूर्ण करके मधु के साथ खाये ॥३६॥

अर्काङ्गुरैर्भावितानां यवानां साध्वनेकशः। तर्पणं वा पिवेदेषां सखौद्रं श्वासपीडितः ॥३७॥ शिरीषकदलीकुन्दपुष्पं मागधिकायुतम्। तण्डुलाम्बुयुतं पीत्वा जयेच्छ्वासानशेषतः ॥३८॥ जो को आक के पुष्प एवं कोमल पत्तों के क्वाथ से बहुत बार भावना देकर इन जो का सत्त्व बनावे। इस सत्त्व को मधु के साथ श्वास से पीड़ित पीये। शिरीष के फूल, केले का फूल, कुन्द का फूल, पिप्पली, इनको चावल के धोवन के साथ पीने पर सम्पूर्ण प्रकार के श्वास नष्ट होते हैं। (कुन्द-निर्गन्ध श्वेतपुष्प) ॥३७,३८॥

कोलमर्जा ताळमूलमधुचर्मसमीपि। लिह्यात् क्षौद्रेण भागीर्च्च सर्पिर्मधुसमायुताम् ॥३९॥ नीचैःकदम्बबीजं वा सखौद्रं तण्डुलाम्बुना। बेर की मज्जा, मूसली, हरिण चर्म की राख, इनको मधु के साथ चाटे। अथवा भागी को घी और मधु के साथ चाटे। लघुकदम्ब के बीजों को मधु के साथ चावल के पानी के साथ पीये ॥३९॥

द्राक्षां हरीतकीं कृष्णां कर्कटाल्यां दुरालभाम् ॥४०॥ सर्पिर्मधुभ्यां विलिहन् हन्ति श्वासान् सुदुराणान्। द्राक्षा, हरड, पिप्पली, कर्कटशृङ्गी, धमासा, इनको घी और मधु के साथ चाटने पर भयानक श्वास भी नष्ट होते हैं ॥ हरिद्रां मरिचं द्राक्षां गुडं रास्तां कृष्णां अटीम् ॥४१॥ लिह्यात्तेलेन तुल्यानि श्वासातौ हितभोजनः। हल्दी, मरिच, द्राक्षा, गुड, रास्ता, पिप्पली, कचूर, इनको