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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 826

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५४ ]

वक्तव्य—अजीर्ण-आम-विदग्धादि भेद-वाला । अध्यशन-अजीर्ण भोजन । असात्य-जो खाया हुआ मनके अनुकूल न हो । विरुद्ध-हिताहित अध्याय में कहा है ॥३-६॥

विशतैः क्रमिजातीनां त्रिविधः संभवः स्मृतः ।

पुरीषकफरक्तानि, तासां वद्यामि विस्तरम् ॥७॥

क्रुमि की जाति (क्रुमि) बीस प्रकार की हैं, इनका वर्गीकरण-पुरीषज, कफज, रक्तज, भेद से तीन प्रकार का है, इसको विस्तर से कहता हूँ ।

वि० मन्तव्य—पुरीष में उत्पन्न होनेवाले-अतिसार एवं ग्रहणी आदि रोगों के पुरीष में पाए जानेवाले सूक्ष्म एवं स्थूल क्रुमि “पुरीषज” कहे जाते हैं । कफ में उत्पन्न होनेवाले-कास, श्वास, प्रतिशयाय एवं क्षय रोगों में कफ में पाए जानेवाले क्रुमि कफज कहलाते हैं । रक्त में उत्पन्न होनेवाले—कुष्ठ, ब्रण आदि में तथा अन्य रोगों में रक्त में पाये जानेवाले क्रुमि “रक्तज” कहलाते हैं । इनके अतिरिक्त च० वि० अ० ७ में दो क्रुमि बतलाये गये हैं जो शरीर एवं कपड़ों के मल-मैल में उत्पन्न होते हैं । इनका नाम है १-जूका-जूएँ यह दो प्रकार की होती हैं १-काली और २-श्वेत । ३-लिखा-लीख-चमर्ज ॥

अजवा विजवाः किप्याश्चिप्या गण्डुपदास्तथा ।

चूरवो द्विसुखाश्चैव झेया सम पुरीषजाः ॥८॥

पुरीषजन्य क्रुमि सात हैं, यथा अजवा, विजवा, किप्य, चिप्य, गण्डुपद, चूरु, द्विसुख ॥८॥

श्वेताः सूक्ष्मास्तुदन्त्येते गुदं प्रतिसरन्ति च ।

तेषामेवापरे पुच्छैः पृथवश्च भवन्ति हि ॥९॥

श्लान्तिनमान्चापण्डुत्वविष्टम्भवलसंख्याः ।

प्रसेकारुचिहृद्वोगविद्धमेदास्तु पुरीषजैः ॥१०॥

ये क्रुमि रंग में श्वेत, सूक्ष्म तथा गुद में चुभोते हैं तथा गुदा की ओर जाते हैं । इनमें से कुछ क्रुमि पूछ पर चपटे होते हैं । ये पुरीष जन्य क्रुमि शूल, अग्निमान्द्य, पाण्डुरोग, विष्टम्, बल का नाश, लालाखाव, अरुचि, हृदयरोग, अतिसार, उत्पन्न करते हैं, इन लक्षणों से इनको समझना चाहिये ॥

रक्ता गण्डुपदा दीर्घा गुदकण्डूनिपातिनः ।

श्लाटोपशकुदभेदपत्किनाजकराश्च ते ॥११॥

इन क्रुमियों में गण्डुपदक्रुमि लालरंग का, लम्बा, केचुए के आकार का होता है । शूल, आधमान, अतिसार, और अग्निनाश करता है ॥११॥

दर्भपुष्पाः महापुष्पां प्रलूताश्चिपिटास्तथा ।

पिपीलिका दारुणाश्च कफकोपसमुद्भवाः ॥१२॥

कफजन्यक्रुमि—दर्भपुष्प, महापुष्प, प्रलूत, चिपिट, पिपीलिका, दारुण भेद से छे प्रकार के हैं ॥१२॥

रोमशा रोममूर्धनः सपुच्छाः श्यावमण्डलाः ।

रुद्धधान्याङ्गुराकाराः शुक्लास्ते तनवस्तथा ॥१३॥

इनका आकार—सारे शरीर पर रोआटेवाले, घिरपर बड़ेरोम, पूछवाले आकार के, काले चकत्तोंवाले, उगते हुए धान्य के अंकुर के समान आकार के, श्वेत एवं पतले होते हैं । (रोग जहाँ बालों के लिये है, वहाँ सिरपर का रोमशब्द आगे बढ़े हुए पतले प्रवर्धन को भी बताता है, जिससे ये वस्तु का पकड़ते हैं, गति में सहायता पूछ करती है) ॥१३॥

मञ्जादा नेत्रलेढारस्तालुश्रोत्रमुजस्तथा ।

ये क्रुमि मञ्जा की खाते हैं, तालु एवं श्रोत्र की खाते हैं, आँखों को चटाते हैं, (आँखों में रेंगते हैं कण्डू करते हैं) ।

शिरोहृद्वोगवमशुप्रतिश्यायकराश्च ते ॥१४॥

इनसे शिरारोग, हृद्वरोग, वमन, और प्रतिशयाय उत्पन्न होता है ॥१४॥

केशरोमनखादाश्च दन्तादाः किक्किशस्तथा ।

कुष्ठजाः सपरीसर्पा झेयाः शोणितसंभवाः ॥१५॥

केशाद, रोमाद, नखाद, दन्ताद, किक्किश, कुष्ठज और परिसर्प भेद से रक्तजन्य क्रुमि सात प्रकार के हैं । (केश-सिर के बालों को खानेवाले, रोमाद-शरीर के रोम को खानेवाले, किक्किश-गर्भवती स्त्री के उदर पर जो श्वेत सी धारियाँ पड़ जाती हैं, इस प्रकार की रेखायें उत्पन्न करनेवाले) ॥१५॥

ते सरक्ताश्च कृष्णाश्च स्निग्धाश्च पृथवस्तथा ।

रक्ताधिष्ठानजान् प्रायो विकारान् जनयन्ति ते ॥१६॥

ये रक्तजन्य क्रुमि ईषत् रक्तवर्ण, कृष्णवर्ण, चिकने और चपटे होते हैं । प्रायः करके ये क्रुमि रक्त के आश्रय से होनेवाले कुष्ठ, विसर्प, पिड्का आदि (व्याधि समुद्देश में कहे) रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥१६॥

माषपिष्टान्विदलपर्णशकैः पुरीषजाः ।

मांसमाषगुड्क्षीरदधितैलैः कफोद्भवाः ॥१७॥

बिरुद्धाजीर्णशकाद्यैः शोणितोत्था भवन्ति हि ।

ज्वरो विवर्णता शूल हृद्वोगः सदनं भ्रमः ॥१८॥

भक्तृष्टेषोऽतिसारश्च संजातकृमिलक्षणम् ।

उड्डद, पिडो के भक्ष्य, दाल-पत्तों के शाक से पुरीषजन्य

क्रुमि उत्पन्न होते हैं । मास, उदड़, गुड्ड, दुष, दही, तैल से कफजन्य क्रुमि उत्पन्न होते हैं । विरुद्ध भोजन, अजीर्ण में भोजन, शाक आदि से रक्तजन्य क्रुमि उत्पन्न होते हैं । ज्वर, शरीर में विवर्णता, शूल, हृद्वरोग, शिथिलता, चक्कर आना, भोजन में अरुचि, अतिसार, ये क्रुमियों के उत्पन्न होने के लक्षण हैं ॥१७,१८॥

हृश्याख्योदशाद्यास्तु क्रुमीणां परिकीर्तिताः ॥१९॥

केशाद्याद्यास्त्वहृश्यास्ते द्रावाद्यां परिवर्जयेत् ।

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