सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 827, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५४ ]
उत्तरतन्त्रम्
७७१
प्रारम्भ के तेरह क्रमि (पुरीषजन्य और कफजन्य) दृश्य हैं । केशाद आदि रक्तजन्य सात क्रमि अदृश्य हैं । इन रक्तजन्य क्रमियों में प्रारम्भ के दो क्रमि असाध्य हैं ॥१६॥
एषामन्यतमं ज्ञात्वा जिर्वासुः स्निग्धमातुरम् ॥२०॥ सुरसादिविपक्वेन सर्पिषा वान्तमादितः । विरचेयेत्तीक्ष्णतरैर्यागैरास्थापयेच्छ तम् ॥२१॥
इनमें से किसी एक प्रकार के भी क्रमि को मारने की इच्छा से रोगी को सुरसादिगण से सिद्ध किये घृत से स्निग्ध करके, तीक्ष्णतर (अतितीक्ष्ण) योगों से (कफनाशक) प्रथम वमन कराये, फिर विरेचनोक्त योगों से विरेचन देवे ।
वक्तव्य—“तत्र सर्वक्रुमीणामपकर्षणमेवादितः कार्यं, ततः प्रकृतिविधातः, अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवन- मिति ॥” चरक वि० अ० ७।१४ ॥२०,२१॥
यवकोलकुटस्थानां सुरसादिर्गणस्थ च । विडङ्गस्नेहयुक्तेन क्वाथेन लवणेन च ॥२२॥ क्रुमिरोगी को-जौ, बैर, कुलथी और सुरसादिगण के क्वाथ में विडंग से साधित तैल, और लवण मिलाकर आस्थापन बस्ति देवे ॥२२॥
प्रत्यागते निरूहे तु नरं स्नानं सुखास्मनुता । युक्त्यात् क्रुमिन्नेरशनेस्ततः शीघ्रं भिषग्वरः ॥२३॥ स्नेहनोक्तेन चैनं तु योजयेत् स्नेहबस्तिना ।
निरूह के वापिस आजानेपर, रोगी को गरम पानी से स्नान करा के, तुरन्त वैद्य रोगी को क्रुमिनाशक भोजन देवे । विडंग साधित स्नेह से स्नेह बस्ति देवे ॥२३॥
ततः शिरीषकिण्णिहीरसं क्षौद्रयुतं पिबेत् ॥२४॥ फिर शिरीष, अपामार्ग के स्वरस को मधु के साथ पीये ॥ केवूस्वरसं वाऽपि पूर्ववत्तीक्ष्णभोजनः । अथवा केवू का स्वरस मधु के साथ पीये । तीक्ष्ण द्रव्यों से संस्कृत भोजन करे ।
वक्तव्य—तीक्ष्ण द्रव्य—“मूलकसर्पपकलशुनकरंजशिग्रुमधु- शिग्रुमठखरपुष्पाभृत्तुणसुमुखसुरसकुटेरकगणडीरककालमालकप- र्णाक्षश्वकफाणज्जकानि सर्वाणि अथवा यथालाम् ॥” चरक वि० अ० ७।२० ।
पलाशबीजस्वरसं कटकं वा तण्डुलाम्बुना ॥२४॥ ढाक के बीज का स्वरस या इसका कल्क चावलों के पानी से पीये ॥२४॥
पारिभद्रकपत्राणां क्षौद्रेण स्वरसं पिबेत् । पत्तूरस्वरसं वाऽपि पिबेद्वा सुरसादिजम् ॥२६॥ बकायन के पत्तों का स्वरस मधु के साथ पीये । पत्तूर (मछली) या सुरसादि गण के पत्तों का स्वरस मधु के साथ पीये ॥२६॥
लिम्बावृक्षशक्रचूर्णं वैडङ्गं वा समाश्विकम् ।
घोड़ा की लीदें का चूर्ण या विडंग का चूर्ण मधु के साथ चाटे ।
पत्रैर्मुषिकपण्यो वा सुपिष्टैः पिष्टमिश्रितैः ॥२७॥ खादेत् पूरप्लिकाः पक्वा धान्याम्लं च पिबेदनु ।
मूषिकपण्यो (जेंदरकानी) के पत्तों को पीसकर, इसमें पिड़ी मिलाकर, इनसे पूरप्लिका (कचौड़ी) बनाकर खाये और पीछे से कांजी पीये । (कांजी का गुण क्रुमि नष्ट करना है, परन्तु निरन्तर सेवन क्रुमिकारक है) ॥२७॥
सुरसादिगणे पक्वं तैलं वा पान्मिष्यते ॥२८॥ विडङ्गचूर्णयुक्तैर्वा पिष्टैर्भदयांस्तु कारयेत् ।
अथवा सुरसादिगण में पकाया तैल पीना चाहिये । विडंग का चूर्ण पिड़ी में मिलाकर इनसे भक्ष्य अन्न बनाये ॥२८॥
तत्कषायप्रपीतानां तिलानां स्नेहमेव वा ॥२९॥ अथवा विडंग के कषाय से अच्छी प्रकार भावित तिलों का तेल पीये ॥२९॥
इवाविधः जकृतश्चूर्णं समकृत्वः सुभावितम् । विडङ्गानां कषायेण त्रैफलेन तथैव च ॥३०॥
क्षौद्रेण लोहवाऽनुपिबेद्दसमामळकोद्भवम् । अक्षामयारसं वाऽपि
सेह के पुरीष के चूर्ण को विडंग के कषाय से या त्रिफला के कषाय से भली प्रकार सात बार भावना देकर, इसका चूर्ण करके मधु के साथ चाटे, पीछे से आंवले का रस (क्वाथ), या बहेड़े का अथवा हरड का क्वाथ पीये ॥३०॥
विधिरेषोऽयसामपि ॥३१॥ यही विधि रांगा, सीसा, लोह, ताम्र आदि धातुओं में भी बरते, अर्थात् इन धातुओं की भस्म को विडंग या त्रिफला के क्वाथ से भली प्रकार भावना देकर मधु के साथ खाटे, पीछे आंवले आदि का क्वाथ पीये ॥३१॥
पूतीकस्वरसं वाऽपि पिबेद्वा मधुना सह । पिबेद्वा पिप्पलीमूलमजामृत्रेण सयुतम् ॥३२॥ सम्रात्रां पिबेद् घृष्टं त्रपु वा दधिमस्तुना ।
करंज नाटा का स्वरस मधु के साथ पीये । पिप्पलीमूल को बकरो के मूत्र के साथ पीये । त्रपु (रांगा) को दही के पानी में बिसकर सात दिन पीये ॥३२॥
पुरीषजान् कफोत्थांश्च हन्यादेवं क्रुमीन् भिषक् ॥३३॥ पुरीषजन्य और कफजन्य क्रुमियों को इस विधि से नष्ट करे ॥३३॥
शिरोहृदघ्राणकर्णीक्षिसंश्रितांश्च पृथग्विधान् । विशेषेणाज्ञनेर्नस्यैरवपीडेक्ष साधयेत् ॥३४॥
शिर, हृदय, नासिका, कान, आंख में स्थित नाना प्रकार के क्रुमियों की अंजन, नस्य, अवपीडन विधि से विशेष रूप में चिकित्सा करे ॥३४॥