सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५५ ]
गङ्कद्वसं तुरङ्गस्य सुगुष्कं भावयेदति ।
निष्कवायेन विडङ्गानां चूर्णं प्रधमनं तु तत् ॥३५॥
घोड़े की लीद के स्वरस को मलीप्रकार सुखाकर इसे विडंग के क्वाथ से भावित करके इस चूर्ण का नासा में प्रधमन नस्य (फूँकार से देना) देवे ॥३५॥
अयश्चूर्णाग्न्यनेनैव विधिना योजयेद् भिषक् ।
सकांस्यनीलं तैलं च नस्यं स्यात्सुरसादिकं ॥३६॥
घोड़े की लीद की मांति रांगा, सीसा आदि धातुओं का चूर्ण विडंग के क्वाथ से भावना देकर प्रधमन नस्य देवे । कांठी को घिसकर इसकी स्याही को-सुरसादि गन्ध में सिद्ध किये तैल में मिलाकर नस्य देवे ॥३६॥
इन्द्रलुप्तविधिश्चापि विधेयो रोमभोजिषु ।
रोम को खानेवाले क्रमियों में इन्द्रलुप्त रोग की चिकित्सा करे ।
दन्तादानां समुद्दिष्टं विधानं मुखरोगिकम् ॥३७॥
दांत को खानेवाली क्रमियों की चिकित्सा मुख रोगों में कह दी है ॥३७॥
रक्तजानां प्रतीकारं कुर्यात् कुष्ठचिकित्सिते ।
रक्तजन्य क्रमियों की चिकित्सा कुष्ठ चिकित्सा की मांति करे ।
सुरसादि तु सर्वेषु सर्वार्थेष्वेवोपयोजयेत् ॥३८॥
सब क्रमियों में सुरसादिगण का उपयोग सब रूपों में (खाने में, पीने में, स्नान आदि में) करना चाहिये ॥३८॥
प्रव्यक्तितत्तकदुर्कं भोजनं च हितं भवेत् ।
जिस भोजन में तित्तक और कटु प्रभुर परिमाण में स्पष्ट रहता हो वह देना हितकारी है ।
कुल्लस्थक्षारसंसृष्टं क्षारपानं च पूजितम् ॥३९॥
कुल्लस्थी की भस्म को पानी में घोलकर, इसके साथ यवक्षार का पानी उत्तम है ।
‘यावश्कस्य पानं तु कुल्लस्थक्षारविणि’ ॥३९॥
क्षीराणि मांसानि घृतानि चैव
दधीनि शाकानि च पर्णवन्ति ।
समासतोऽम्लान्मधुरान् हिमांश्च
कृमौन् जिघांसुः परिवर्जयेत् ॥४०॥
निदानपरिवर्जनचिकित्सा—दूध, मांस, घृत, दही, पत्तों के शाक (सलाद आदि), अम्ल, मधुर और शीतल पदार्थ इनको संक्षेप में, क्रमियों के नाश की इच्छा रखनेवाला मनुष्य छोड़ देवे ।
वक्तव्य—विटामिन के नाम पर कच्चे टमाटर, हरे शाक, सलाद आदि कच्चे खाने की जो प्रथा चल रही है, इसी प्रकार आईस्क्रीम, रेफ्रेंजेटर में रक्खा ठण्डा भोजन, ठण्डे पदार्थ खाना चला है, ये वस्तुयें आयुर्वेद के सिद्धान्त से अनुकूल
नहीं । इनसे क्रमि उत्पन्न होते हैं, अथवा हृदय रोग-रक्तचाप के रोग होते हैं ।
चरक में—अश्वशकुद्वस के स्थान पर घोड़े की लीद का ही व्यवहार किया है, यथा—“अथाश्वशकुदाहृत्य महति किलिङ्के प्रस्तीयतिषे शोषयित्वोद्बुखले क्षोदयित्वा दृषदि पुनः श्लक्ष्णानि चूर्णानि कारयित्वा विडंगकवायेन त्रिफलाकषायेण वा अष्टकृत्वो दशकृत्वो वा आतपे सुपरिमावितानि भावयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा नवे कलशे समाप्यानुगुप्तं निषापयेत् ॥” चरक वि० अ० ७।२६ ॥४०॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तगते शालाक्यतन्त्रे कायचिकित्सतन्त्रे क्रमप्रतिषेधां नाम (षोडशोऽध्यायः, आदितः) चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५४॥
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
अथात उदावर्तप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अव इसके आगे उदावर्तप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे—
जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था १,२॥
अधश्चोर्ध्वं च भावानां प्रवृत्तानां स्वभावतः ।
न वेगान् धारयेत् प्राज्ञो वातादीनां जिजीविषुः ॥३॥
जीने की इच्छावाला बुद्धिमान् मनुष्य स्वभाव से प्रवृत्त होनेवाले वायु आदि के, नीचे, या ऊपर जानेवाले वेगों को भी न रोके ।
वक्तव्य—वेगनिग्रहजा रोग। य एते परिकीर्तिताः । इच्छं-स्तेषामनुत्पत्ति वेगानेतान् धारयेत् ॥ इमांस्तु धारयेद् वेगान् हितैषी प्रेत्य चेह च । साहसानामशस्तानां मनोवाक्कायकर्मणाम् ॥ लोभशोकभयक्रोधमानवेगान् विधारयेत् । नैर्लज्ज्येष्विति-रागणांमभिध्यायांश्च बुद्धिमान् ॥ पारुष्यस्यातिमात्रस्य सूत्रकस्यानुत्तस्य च । वाक्यस्याकालयुक्तस्य धारयेद् वेगमुत्थितम् ॥ क्षीभोगास्तेयहिंसाद्या तस्या वेगान् विधारयेत् । देहप्रवृत्तिः या काचिद् वर्त्तते परपीडया ॥ आत्मनः प्रतिकूलानि न परेषां समाचरेत् ॥ चरक सू० अ० ७ ॥३॥
वातविषमूत्रजुरुस्माश्रुश्वोदूग्गरवमौन्द्रियैः ।
व्याह्न्यमानसूदितैरुदावर्तां निरुच्यते ॥४॥
वायु, मल, मूत्र, जूम्भा, अश्रु, लीक, उदूग्गर, वसन, इन्द्रिय (शुक्र), इनके उपस्थित वेगों को रोकने से उदावर्त्ता उत्पन्न होता है । (श्रोत्रवागादिसर्वं च शुक्रं चैन्द्रियमुच्यते ॥
छुत्तुष्णाश्वासनदिग्नागमुदावर्तां विधारणार्त ।
भूख, प्यास, श्वास, निद्रा इनको रोकने से उदावर्त्ता उत्पन्न होता है ।
तस्याभिध्यासे व्यासेन लक्षणं च चिकित्सिम् ॥५॥