सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५१ ]
साध्यविसूचिका में एड़ी में दाह (संज्ञा प्रबोधन के लिये) करे। अभिपाचन के लिये अग्नि से सेक देवे। अन्नशल्य को निकालने के लिये तीक्ष्ण वमन देवे। दोष के पाकामिमुख होने पर लंघन, स्वेद आदि से पाचन, और विरेचन देवे ॥१२॥
विशुद्धदेहस्य हि सद्य एव
मूर्च्छातिसारादिरूपैति शान्तिम् ।
इस प्रकार वमन विरेचन से शोधन हो जाने पर मूर्च्छा, अतिसार आदि शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं।
आस्थापनं चापि वदन्ति पथ्यं
सर्वोसु योगानपराश्रिबोध ॥१३॥
विसूचिका आदि में आस्थापन को भी पथ्य कहते हैं, अन्य योगों को भी सुनो। (विसूचिका, अलसक सब में निरुह देवे) ॥
पथ्यावचाहिङ्कुकलिङ्गगुच्छ-
सौवचलेः सातिविषैश्च चूर्णम् ।
सुखाम्नुपीतं विनिहन्त्यजीर्णं
शूलं विसूचीमरुचिं च सद्यः ॥१४॥
हरड, वच, हींग, इन्द्रजो, लहसुन, सौवचल, अतीष, इनका चूर्ण गरम पानी से पीने पर शूल विसूचिका और अरुचि को तुरन्त नष्ट करता है। (गुञ्जन-लहसुन) ॥१४॥
क्षारागदं वा लवणं विडं वा
गुडप्रगाढानथ सर्पपान् वा ।
अम्लेन वा सेन्धवहिङ्कुयुक्तौ
सबोजपूरौ सघृतौ त्रिवर्गौ ॥१५॥
कटुत्रिकं वा लवणैरुपेतं
पिवेतं स्नुहोक्षीरविस्मिश्रितं तु ।
कल्याणकं वा लवणं पिवेतु
यदुक्तमादावनिलासयेषु ॥१६॥
धवाश्वकर्ण शिरीष आदि से दुन्दुभिस्वनीय में कहे क्षारागद को या विडलवण को अथवा प्रचुर गुड युक्त सरसों को गरम पानी से पीये। सेन्धव और हींग को कांजी से पीये। त्रिफला, त्रिकटु को समान मात्रा में विजौरे के रस से पीये। त्रिकटु को-पाँचों नमक के साथ थोर के दूध में मिलाकर पीये। वातव्याधि में गण्डीर पलाश आदि से जो कल्याणक लवण कहा है, वह भी इसमें बरते ॥१५, १६॥
कृष्णजमोदक्षवकाणि वाऽपि
तुल्यो पिवेद्वा मगधानिकुम्भो ।
दन्तीयुतं वा मगधोद्भवानां
कल्कं पिवेतु कोषवतीरसेन ॥१७॥
लुष्णाभिरिद्भिर्भर्गधोद्भवानां
कल्कं पिवेद्वागरकल्कयुक्तम् ।
पिप्पली, अजवाइन, खवक (नकछिकनी) इनको या पिप्पली और दन्ती को कांजी से पीये। पिप्पली के कल्क को दन्ती के साथ कडुई तुरई के रस से पीये। पिप्पली और सौठ के कल्क को गरम पानी से पीये ॥१७॥
व्योषं करञ्जस्य फलं हरिद्रं
मूलं समं चाप्यथ मातुलुङ्ग्याः ॥१८॥
छायाविशुष्का गुटिकाः कृतास्ता
हन्युविसूचीं नयनाङ्गनेन ।
त्रिकटु, करंज का फल, हल्दी, दारुहल्दी, इनके बराबर विजौरे की जड़, इनको पानी में पीसकर, गोळियाँ बनाकर छाया में सुलाये। इन गोळियों के अंजन करने से विसूचिका नष्ट होती है।
वि० मन्तव्य—यह अंजन विसूचिका में उत्पन्न मूर्च्छा की शान्ति के लिये किया जाता है, मूर्च्छा शान्त हो जाने पर तत्कालोचित अन्य उपचार करते रहना चाहिये ॥१८॥
सुवासितं साधु विरेचितं वा
सुलक्षितं वा मनुजं विदित्वा ॥१९॥
पेयादिभिर्दीपनपाचनीयैः
सम्यकलुधार्तं समुपक्रमेत ।
भली प्रकार वमन, विरेचन, लंघन हो जाने पर, रोगी को भूख लगने पर दीपनीय पाचनीय (चित्रक आदि) औषधियों से संस्कृत पेया, विलेपी आदि से चिकित्सा करे ॥१९॥
आमं शकृद्वा निचितं क्रमेण
भूयो विबद्धं विगुणानिलेन ॥२०॥
प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं
विकारमानाहमुदाहरन्ति ।
क्रमशः आम (अपक्व अन्न रस) और मल संचित होकर कुपित-ऊर्ध्वगामि अपानवायु से अवरुद्ध होने पर और भी बढ़कर अपने स्वाभाविक मार्ग में जब प्रवृत्त नहीं होता, तब इस अवस्था को आनाह कहते हैं।
वि० मन्तव्य—आनाह—यह रोग आहार की आमावस्था में भी होता है और पक्वावस्था में भी हो जाता है। इसमें आमाशय, अंत्र एवं मलाशय की गति रुक जाती है। यह सामान्यतः दो प्रकार का होता है १-आमाशय की गति रुकने से 'आमसमुद्भवः' (श्लो० २१) और २-पक्षाशयज (श्लो० २२) अर्थात् मलाशय की गति रुकने से होता है। इन दोनों आशयों के मध्यवर्त्ती अन्त्र की गति भी रुक जाती है। आनाह को आभमान कहना या समझना उचित नहीं है, आभमान में उदर में वायु