सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 843, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६० |
बरतक रहती है, जव्रतकं कि दंखरी शकरा गुटिका के रूप मे
छलोत-मूत्र सोत के मुख में नदीं फंस जाती । शकराजन्य मूत्रा-
, धात के ये लक्षण ईह ॥ ११.१५]
चिकिस्सितमथंतेषामष्टानामपि व्यते ॥१५॥
इसके आगे आगो मूत्राघातों की चिकित्सा कदी जायेगी ॥
अर्मरीं च खमाभिस्य यदुक्तं प्रसमीदय तत् |
यथादोषं प्रयुञ्ञीत स्तेदादिमपि च क्रमम् ॥१६॥
अश्मरी चिकित्खा मे वातादिभेदसेजो चिकित्सा कदी
६, उसी चिकित्छाको दोष के अनुसार करे स्नेहादि विधि
मी करे ॥१६॥ धदष्ारममिदो कुम्भीं हपुषां कण्टकारिकाम् । बलां रतावरी रास्नां वरुण गिरिकर्णिकाम् ॥१७॥ तथा विद्ारिगन्धादिं संहृत्य चरेबृतं पचेत् । तें घृतं वा तत् पेयं तेन बाऽप्यनुवासनम् ॥१८॥ द यादुत्तरबस्ति च वातक्ृच्ड्धोपपशान्तये । गोखरु; पाषाणमेद्, कुम्भी (जल्कुम्भी), हाऊवेर, कटेरी
बला, शतावरी, रास्ना, वरण, गिरिकर्णिका ( अपराजिता कोयल), ओर विदारिगन्धादिगण, इन सबको एकत्रित करके
इनसे वेषेत तेर या चेबरेत घृत (वसा, मञ्जा धृत के खाय ते
या वसा मज्जा तल के साथ घी) बनाये। इनको पीये, अनु- वासन बस्ति देवे, ओर उत्तर वस्ति देवे--इससे वातजन्य
मूत्रकृच्छ्र शान्त होता है ॥१७,१८॥ | शच दृषटरास्वरसे तें सगुडक्षीरनागरम् ॥१९॥। पक्त्वा तत् पूबवयोज्यं तत्रानिखरुजा पहम् ।
गोखरू के स्वरस मे गुड़, दुध, सोढ के साथ तेर सिद्ध
| || करे । इस तेर को पान अनुवाखन ओर उत्तरवस्ति मे ब्रते ।
यह वातजन्य वेदना को शान्त करता हे ॥१६॥
तृणोखखादिकाकोडीन्यभोधादिगणेः क (श) तम् २० पीतं घतं पित्तछच्छं नाशयेत् क्षीरमेव वा।_ `
तृणोत्खादि, काकोल्यादि, न्यभरोधादि गण से सिद्ध किया
धृत या दूध पित्तजन्यमूङच्छं को नष्ट करता हे ॥२०॥
द्द्यादुत्तरबस्ति च पित्तङृच्ट्रोरशान्तये ॥२१॥
इसी से - पित्तजन्यङ्च्छ की शान्ति के ण्थि उत्तर बस्ति
देवे ॥२१॥।
एभिरेव कृतः स्तेहखिविधेष्वपि बस्तिषु ।
हितं विरेचनं चेचलक्षीरद्राक्षारसेयुतम्॥२२॥ -
तृणोत्रलादि (पञ्चवृण आदि) से सिद्ध क्था ईनेहनिरूह
अनुवासन, उन्तर वस्ति तीनों मे उत्तम हे । इषुः दुध; द्रा
रस से युक्त विरेचन देना उत्तम है ॥२२॥
सुरसोषकमुस्तादौ बरुणादो च यत् कृतम् ।
तेरं तथा यवाग्बादि कफाघाति प्रशस्यते ॥२२॥
शतरतन्त्रध् ७23
` कफजन्यमूत्रङ्छ मै-युरसादि, ऊषकादि सुक्तादिगण
म तथा वरुणादिगण मे सिद्ध किया ते एवं सुरादि, ऊषकादिगण, वरुणादि गण, समुस्तादिगण से सिद्ध की यवाग्ू-
प्सी आदि देवे ॥२३॥।
यथादोषोच्छयं कुयोदेतानेव च सवज ।
सान्निपातिक मनकृच्छर मे जिस दोष की अधिकता
दिखाई देवे, उस दोष नाशक चिकित्वा करे ।
फल्गुचृश्चीरदभौडमसारचणं च वारिणा ॥२४॥।
सुरेच्रसद भाम्बुपीतं कृच्छं रुजापहम्।
कटगूढर, पुनन॑वा, दभं, शिलाजतु इनका चुणं, पानी
सुरा, इश्चरस, दाम के पानी से (दोष के अनुसार) पीने से
मङ्च्छर की बेदना को नष्ट करता है । (प्रसंग से सन्िपात्-
जन्य कृच्छं को) ||२४॥
तथाऽमिघातजे कयत् सयोत्रणविंकिस्सितम् ॥२५॥
अभिघातजन्यमचक्ृच्छ मे सद्योव्रण चिरकित्खा करे ॥२५॥
मूत्रकच्छ्े शकृऽजाते कायो वातहरी क्रिया ।
स्वेदावगाहावभ्यङ्गबस्तिचण क्रियास्तथा ॥२६॥
राङत्जन्य मचङ्च्छं मेँ वातनाशक चिकित्खा करे | स्वेद्,
अवगाहन, अभ्यंग, बस्ति, चूण क्रिया विधि करे ॥२९॥
ये खन्ये तु तथा कृच्छ्रे तयोः भोक्त क्रियाविधिः ॥२७॥
अश्मरीजन्य, शकीराजन्य शेष दो जो मूत्रङ्च्छं है, उनमें
अश्मरी, शकरा चिकित्सा की विधि बरतनी चाये ॥१७॥
इति श्रीसुश्रतसंहितायामत्त रतन्तरान्तगते कायचिकित्वातन्त्र
मञ्कृच्छप्रतिषेधो नाम (एकर्विंशतितमोऽष्यासः, आदितः)
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥*६॥
८ षष्टितमोश्ध्यायः
अथातोऽमालुषोपसगंप्रतिषेधमथ्यायं व्याख्यास्यामः ॥१९॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरि; ॥२॥
|, अब इसके आगे अमानुषोपसगप्रतिषेष अध्याय का
व्याख्यान करेगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥
वि० मन्तम्य - यहाँ मूतविया-जो आयुवद का एक अङ्ग
है. का वणन किया गया है ॥२,२॥ _ ॑ |
निआचरेभ्यो रल्यस्तु सिस्यमेव क्ष तातुरः । इति यत् प्रागभिहितं विस्तरस्तस्य वदयते ॥३॥
श्त रोगौ कौ निस्य प्रति निशाचरो से रक्षा करनी चाहिये, `
यह जो पिरे कहा है, उखको विस्तार से करेगे । =
वक्तव्य्-ङुछ आघुनिकों का कहना ह
राश्चस, कमि, जम्सं, वे सिरा, कोकाईे, ये सब -स
है । चकि दोनों रात को आक्रमण करे अ मां
=