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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रुतसंहिता

[ अ० ६०

हैं। इनके गुण धर्म समान हैं, इसलिये इनको राक्षस कहते हैं, परन्तु ॥३॥

गुह्यानागतविज्ञानमनवस्थाऽसहिष्णुता ।

क्रिया वाऽमानुषी यस्मिन् स ग्रहः परिकीर्त्यते ॥४॥

सामान्यलक्षण—गुप्तवस्तु का, भावी का ( भविष्य का ) ज्ञान, अनवस्थिति (अस्थिरता), असहिष्णुता मनुष्यों से अधिक क्रिया (वर देना आदि, या कूदने फाँदने की क्रिया), जिस रोगी में होती है उसे ग्रह से आक्रान्त जाने ।

अमर्यवळवीर्यपौरुषपराक्रमग्रहणधारणस्मरणज्ञानविज्ञानवच नविज्ञानानि.....चरक । वि० अ० ७ ।

वि० मन्तव्य—आयुर्वेद के सिद्धान्तानुसार ग्रह अर्थात् भूत से आक्रान्त मानव में गुह्याऽनागत विज्ञान आदि भाव उत्पन्न हो जाते हैं, जो अमानुष-अमानवीय होते हैं। इन उन्मादों के निदान, पूर्वरूप, रूप, सम्प्रति एवं उपशय दोष-जनित उन्मादों से विलक्षण होते हैं ॥४॥

अशुचि भिन्नमर्यादं क्षतं वा यदि वाऽक्षतम् ।

हिंस्युहिंसाविहारार्थं सत्कारार्थमर्थापि वा ॥५॥

अपवित्र, मर्यादा का अतिक्रमण करनेवाले, व्रणवाले, अथवा व्रण रहित मानव को मारने की इच्छा से अथवा विहार रति के लिये अथवा सत्कार (पूजा) प्राप्त करने के लिये हिंसा करते हैं ।

“त्रिविधं तु खलुन्मादकराणां भूतानामुन्मादने प्रयोजनं भवति । तथाया-हिंसा, रतिः, अभ्यर्चनं चेति ॥” चरक ॥५॥

असङ्ख्येया ग्रहगणा ग्रहाधिपतयस्तु ये ।

व्यञ्ज्यन्ते विविधाकारा भिद्यन्ते ते तथाऽष्टधा ॥६॥

देव-दैत्य राक्षस आदि जो असंख्य ग्रह समूह हैं, वे भिन्न भिन्न प्रकार के लक्षणोंवाले होने से आठ प्रकार के हैं ॥६॥

देवास्तथा शत्रुगणाश्च तेषां

गन्धर्वयक्षाः पितरो भुजङ्गाः ।

रक्षासि या चापि पिशाचजाति-

रेषोऽष्टको देवगणो ग्रहाख्यः ॥७॥

देवता (दीव्यन्तीति-देवाः), देवताओं के शत्रुगण (दैत्य), गन्धर्व, यक्ष, पितर, भुजंग (सांप), राक्षस, और पिशाच (मांस खानेवाले) यह आठ देवगण हैं ।

वक्तव्य—चरक में गुरु, बुद्ध, सिद्ध, श्रुषि भी इसका कारण कहे हैं। उन्होंने दैत्य और भुजंग को नहीं गिना ॥७॥

संतुष्टः शुचिरपि चेषगन्धमाल्यो

निस्तन्द्री ह्यवितथसंस्कृतप्रभाषी ।

तेजस्वी स्थिरनयनो वरप्रदाता

ब्रह्मण्यो भवति नरः स देवजुष्टः ॥८॥

देवग्रह से युक्त मनुष्य—संतोषी, पवित्र गन्ध माला की चाह रखनेवाला, आलस्य रहित निरन्तर संस्कृत बोलता (शुद्ध

धाराप्रवाह भाषा) है, तेजस्वी, पलकें नहीं गिरतीं (जैसा दम-यन्ती के स्वयंवर में देवताओं में पलक नहीं झपकती थी), सबको वर देनेवाला, ब्रह्मण्य (ब्राह्मण के आचार-विचारवाला) मनुष्य देवग्रह से युक्त रहता है ॥८॥

संस्वेदी द्विजगुरुदेवदोषवक्ता

दिक्षाक्षो विगतभयो विमार्गदृष्टिः ।

सन्तुष्टो भवति न चान्नपानजाते-

दुष्टात्मा भवति च देवशत्रुजुष्टः ॥९॥

प्रस्वेद युक्त, ब्राह्मण गुरु देवता के दोषों को कहनेवाला, देदी आँखों का, भयशून्य, कुमार्ग में दृष्टिवाला, खान पान समूह से भी सन्तुष्ट नहीं होता, दूषित आत्मावाला मनुष्य देव-शत्रु (दैत्य) से आक्रान्त रहता है ॥९॥

हृष्टात्मा पुलिनवनान्तरोपसेवी-

स्वाचारः प्रियपरिगीतगन्धमाल्यः ।

नृत्यन् वै ग्रहसति चारु चाल्यशब्दं

गन्धर्वग्रहपरिपीडितो मनुष्यः ॥१०॥

प्रसन्नचित्त, पुलिन (द्वीप) तथा वन के बीच में रमण करनेवाला, शोभन आचार का, गीत-गन्ध माला में रुचिवाला, नाचते हुए-हँसकर सुन्दर और थोड़ा बोलनेवाला मनुष्य गन्धर्वग्रह गण से पीड़ित रहता है ॥१०॥

ताम्राक्षः प्रियतनुरक्तवृक्षधारी

गम्भीरो द्रुतमतिरल्पवाक् सहिष्णुः ।

तेजस्वी वदति च किं द्वादमि कस्मै

यो यक्षग्रहपीडितो मनुष्यः ॥११॥

लालनेत्रों का, कमनीय पतले लाल वक्ष को पहनने का आदी, गम्भीर, चंचल बुद्धि, थोड़ा बोलनेवाला, सहनशील, तेजस्वी, ‘किसको क्या दै’ ऐसा कहनेवाला मनुष्य यक्षग्रह से पीड़ित रहता है ॥११॥

प्रतेभ्यो विसृजति संस्त्रेषु पिण्डान्

शान्तात्मा जलमपि चापसत्यवक्षः

मासेषुस्तिलगुडपायसाभिकाम-

स्तद्वुक्तो भवति पितृग्रहाभिभूतः ॥१२॥

कुशा को बिछाकर भूतों के लिये जौ-तिल आदि पिण्ड देता है, शान्तस्वभाव, दक्षिण की ओर वक्ष करके, पितरों को जल भी देता है। मांस, तिल, गुड़, खीर की चाह रखता है, इनको खाता है, ऐसा मनुष्य पितृग्रह से आक्रान्त रहता है ॥

भूमौ यः प्रसरति सर्पवत् कदाचित्

सृक्किण्यो विलिखति जिह्वया तथैव ।

निद्रालुगुंडमधुगुंधपायसेषु-

विन्नेयो भवति भुजङ्गमेन जुष्टः ॥१३॥

जो मनुष्य छाती से सांप की भांति कभी भूमि पर रंगता है, कभी ओठों को जीभ से चाटता है, सोनेवाला, गुड़, मध,