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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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२० ६४ ]

उत्तरतन्त्रम्

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करे। सांठी अन्न, जौ (ठण्डे किये), मूँग, नीवार, कोदा आदि को बटरे आदि विकिर मांस रसों के साथ या मूँग कुलरथी आदि के यूष से देवे। वसन्त में परवल, नीम बैंगन, तित्तक वस्तुओं से भोजन करे। मधु, आसव, अरिष्ट, सीधु, मधु-मद्य, माध्वीक, माधव (मधु से बने मद्य) का सेवन करे। व्यायाम, अंजन, तीक्ष्ण धूम, कवलग्रह को बरते। वसन्त में जल के सब कार्यों में गरम पानी बरते। तीक्ष्ण, रूक्ष, कटु, क्षार, कषाय, सुहाता गरम, द्रवरहित, जौ मूँग मधु की अधिकता का भोजन वसन्त में हितकारी है। नियुद्ध (कुशती), मुसाफरी, पत्थर फेंकना आदि व्यायाम हितकारी हैं। उबटन, स्नान, स्निग्धों, वन इनका वसन्त में सेवन करे। हेमन्त में संचित कफ को शिरोविरेचन, वमन, निरूह, कवल आदि से निकाले। मधुर, स्निग्ध, दिन में सोना, भारी द्रव बहुत वस्तुओं का त्याग करे ॥

व्यायाममुष्णमायासं मैथुनं परिशोषि च ॥४०॥

रसांश्चाग्निगुणोद्विकान् निदाघे परिवर्जयेत्।

श्रीमच्छतु में व्यायाम, धूप, परिश्रम, मैथुन, शरीर को सुखानेवाले आहार, अग्नि गुण की अधिकतावाले रसों का त्याग कर देवे। (अग्नि गुण की अधिकतावाले रस कटु, अम्ल और लवण हैं) ॥४०॥

सर्वासि सरितो वापीर्वैतानि रुचिराणि च ॥४१॥

चन्दनानि पराध्याणि स्त्रजः सकमलोत्पलाः।

तालवृन्तानिलाहारास्तथा शीतगृहाणि च ॥४२॥

घर्मकाले निषेवेत वासांसि सुलघूनि च।

शर्कराखण्डद्विघानि सुगन्धानि हिमानि च ॥४३॥

पानकानि च सेवेत मन्थांश्चापि सशकंरान्।

भोजनं च हितं शीतं सधृतं मधुरद्रवम् ॥४४॥

श्रुतेन पयसा रात्रौ शर्करामधुरेण च।

प्रत्यग्रकुसुमाकीर्णं शयने हर्म्यसंस्थिते ॥४५॥

शयोत चन्दनार्द्राङ्गः स्पर्शयमानोऽनिलैः सुखैः।

श्रीमच्छतु में तालाब, नदियाँ, बावड़ी, सुन्दरवन, उत्कृष्ट चन्दन, कमल, नीलोफर की माठायें, ताड़ के बने पंखों की वायु, शीतल घर, हल्के पतले वस्त्रों का सेवन करे। शर्करा, खाँड़ से लिप्त, सुगन्धित, शीतल पानक (शर्बतों) का सेवन करे, और शर्करा मिश्रित मन्थों को पीये। शीतल, घृतयुक्त, मधुर, एवं द्रव भोजन हितकारी है। गरम किये दूध में शर्करा मिलाकर इससे रात्रि में भोजन करना उत्तम है। अदालिका की छत पर बिछाये, नूतन-नये फूलों से भरे बिस्तर पर शरीर पर चन्दन का लेप करके सुखदायक वायु का स्पर्श लेते हुए सोये।

वक्तव्य—“दिवा पानानि शीतानि हितं रात्रौ च भोजनम्।

ससर्पिः शर्करं शीतं श्रुतेन पयसा युतम् ॥ दिवा शीतग्रहे निद्रां निधि चन्द्रांशुशीतले। भजेचन्दनद्विघाङ्गः प्रवाते हर्म्यमस्तके ॥”

चरक ॥४१-४५॥

तापास्तये हिता नित्यं रसा ये गुरवक्षयः ॥४६॥

पयो मांसरसाः कोष्णस्तैलानि च घृतानि च।

बृंहणं चापि यत्किञ्चिदभिष्यन्दि तथैव च ॥४७॥

निद्राघोषचित्तं चैव प्रकृप्यन्तं ससौरणम्।

निहन्त्यादुनिलक्ष्नेन विधिना विधिकोविदः ॥४८॥

(नदीजलं रूक्षमुष्णमुदुमन्थं तथाऽऽतपम्।

व्यायामं च दिवास्वप्नं व्यवयं चात्र वजयेत् ॥४९॥

(नवात्ररूक्षशीताम्लुसक्तृश्चापि विवर्जयेत्।)

यवषष्टिकगोधूमान् शालीश्चाप्यनवांस्तथा ॥५०॥

हर्म्यमध्ये निवाते च भजेच्छ्रुयां सूदुत्तराम्।

सविषप्रापिविषमूत्रलाठानिष्टोवनाद्विभिः ॥५१॥

समाप्लुतं तदा तोयमान्तरिक्षं विषोपमम्।

वायुना विषदुष्टेन प्रावृषेण्येन दूषितम् ॥५२॥

तद्वि सर्वोपयोगे तु तस्मिन् काले विवर्जयेत्।

अरिष्टासवमैरेयान् सोपदंशास्तु युक्ततः ॥५३॥

पिबेत् प्रावृषि जोगांस्तु रात्रौ तानपि वर्जयेत्।

निरूहेर्वैस्तिभिश्चान्यैस्तथाऽन्यैर्मांरूतापहैः ॥५४॥

(कुपितं शमयेद्वायुं वाषिर्कं चाचरेद्विधिम् ॥)

श्रीम के बीत जाने पर प्रावृड काल में नित्य भारी तीन

रसों का (मधुर, अम्ल, लवण का) सेवन करे। दूध सुहाते गरम मांसरस, तैल, घृत इनका सेवन करे। जो भी कोई द्रव्य बृंहण एवं अभिष्यन्दि हो, उनका सेवन करे। श्रीम में संचित वायु के प्रकोप को, विधि को जाननेवाला वैद्य बातनाशक विधि से शान्त कर दे। (इसी श्रुतु में नदी का पानी, रूक्ष, उष्ण वस्तुएँ, पानी में घुले सत्, धूर, व्यायाम, दिन में सोना और मैथुन छोड़ देवे।) नूतन अन्न (एक साल से कम), रूक्ष, शीतल अन्न, शीतल जल, सत् (पानी में घुले) छोड़ दे। जो, गेहूँ, पुराने साँठों, शाली का सेवन करे। मकान के मध्य में वायु रहित स्थान पर अतिशय कोमल शय्या पर सोये। वर्षा का जल विषकाले प्राणी के मल मूत्र, लाला, थूक आदि से मिला होने के कारण विष के समान होता है, प्रावृड श्रुतु के विष से दूषित वायु से दूषित होने के कारण इस श्रुतु में प्रत्येक कार्य में यह निन्दित होता है। प्रावृड श्रुतु में चटनी आदि (या मांस को) खाकर युक्ति से पुरातन अरिष्ट, आसव, मैरेय को पीये। रात्रि में इनका भी परित्याग कर देवे। निरूह से, अनुवासन वस्ति से, तथा दूसरी बातनाशक विधियों से कुपित वायु को शान्त करे। वर्षा की श्रुतुचर्या का सेवन करे।

वक्तव्य—प्रावृडकाल में वायु का संचय होता है, संचय काल में ही वायु को शान्त करना चाहिये। यथा—“संचयेऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरा गतीः” ॥४६-४५॥

श्रुतावृतौ य एतेन विधिना वत्से नरः ॥५५॥