सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 860, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 860

२०४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६४ ]

घोरानुक्रुतान् रोगाद्वाप्नोति स कदाचन ।

इस विधि से जो मनुष्य प्रत्येक ऋतु में बरतता है, वह श्रुतुजन्य भयानक रोगों से कभी भी आक्रान्त नहीं होता ॥५५॥

अत ऊर्ध्वं द्वादशाशनप्रविचारात् वक्ष्यामः । तत्र शीतोष्णस्तिग्धरूक्षद्रवशुष्कैककालिकद्विकालिकौषधयुक्त-मात्राहीनदोषप्रशमनवृत्त्यर्थः ॥५६॥

इसके आगे भोजन के बारह विभागों को कहेंगे—इनमें शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, द्रव, शुष्क, एककालिक, द्विकालिक, औषधयुक्त, मात्राहीन, दोषप्रशमन, वृत्ति के लिये ॥५६॥

तृष्णोष्णमददाहातीन् रक्तपित्तविषातुरान् ।

मूर्च्छातीन् क्षोषु च क्षीणान् शीतरैर्रूपाचरेत् ॥५७॥

तृष्णा, गरमी, मद, दाह से पीड़ित, रक्तपित्त, विष के रोगी, मूर्च्छा पीड़ित, क्षीण से क्षीण पुरुषों की शीतल अन्न (खान-पान) से चिकित्सा करे ॥५७॥

कफवातामयाविष्टान् विरिक्तान् स्नेहपायिनः ।

अक्लिन्नकायांश्च नरानुष्णोरनैरूपाचरेत् ॥५८॥

कफ-वात के रोगों से आक्रान्त, विरेचन लिये, स्नेह पीये, क्लेद रहित शरीरवालों की उष्ण अन्न से चिकित्सा करे ॥५८॥

वातिकान् रूक्षवेहांश्च व्यायायोपहतस्तथा ।

व्यायामिनश्चापि नरान् स्निग्धैर्रूपाचरेत् ॥५९॥

वात प्रकृति, रूक्ष शरीर, मैथुन से पीड़ित (थके), नित्य-प्रति व्यायाम करनेवालों की स्निग्ध अन्न ( खान-पान ) से चिकित्सा करे ॥५९॥

मेदसाऽभिपरीतास्तु स्निग्धान्मेहातुरानपि ।

कफाभिपन्नदेहांश्च रूक्षैर्रूपाचरेत् ॥६०॥

मेद से व्याप्त शरीरवालों की, स्निग्ध एवं मेहरोगियों की कफ से भरे शरीरवालों की रूक्ष अन्न से चिकित्सा करे ॥६०॥

शुष्कदेहान् पिपासातांन् दुर्बलानपि च द्रवैः ।

शुष्कशरीरवाले, पिपासा से पीड़ित, दुर्बल मनुष्यों की द्रव भोजनों से चिकित्सा करे ।

प्रक्लिन्नकायान् त्रणिनः शुष्कैर्मैहिन एव च ॥६१॥

कुष्ठ आदि से सड़े शरीरवाले, त्रण रोगियों की, मेहरोगियों की शुष्क अन्न से चिकित्सा करे ।

वक्तव्य—किलन्न त्रणों में शुष्क भोजन देवे । अक्लिन्न

त्रणों में द्रव भोजन विषेय है ॥६१॥

एककालं भवेद्येयो दुर्बलान्निबद्धये ।

दुर्बल अग्नि को बढ़ाने के लिये एक समय भोजन देना चाहिये ।

समान्नये तथाऽऽहो द्विकालमपि पूजितः ॥६२॥

समान अग्नि के लिये दोनों समय आहार देना उत्तम है ॥

औषधद्वेषिणे देयस्तथौषधसमायुतः ।

औषध से द्वेष रखनेवाले को औषध से मिला अन्न देवे ।

मन्दाग्नेये रोगिणे च मात्राहीनः प्रशस्यते ॥६३॥

तदतुदत्तस्त्वाहारे दोषप्रशमनः स्मृतः ।

मन्दाग्नि और रोगी को मात्रा से कम आहार देवे । श्रुतु के अनुसार दिया अन्न आहार दोष प्रशमक कहा गया है ॥

अतः परं तु स्वस्थानां वृत्त्यर्थं सर्व एव च ।

प्रविचारानिमान्नेव द्वादशात्र प्रयोजयेत् ॥६४॥

इसके उपरान्त समान धातु एवं समदोष प्रकृति स्वस्थ पुरुषों के लिये शरीर के धारण के लिये अन्न देवे । इन बारह विभागों को इस प्रकार प्रयोग करे ॥६४॥

अत ऊर्ध्वं दशौषधकालान् वक्ष्यामः । तत्राभक्तं

प्राग्भक्तमधोभक्तं मध्येभक्तमन्तराभक्तं सभक्तं सामुद्गं मुहुर्मुहुर्मासप्रासान्तरं चेति दशौषधकालाः ॥६५॥

इसके आगे दस औषध कालों को कहेंगे इनमें अभक्त, प्राग्भक्त, अधोभक्त, मध्येभक्त, अन्तराभक्त, सभक्त, सामुद्ग, मुहुर्मुहुः, प्रास, प्रासान्तर-ये दस औषधकाल (औषध देने के समय) हैं ॥६५॥

तत्राभक्तं तु यत केवलमेवौषधमुपयुज्यते ॥६६॥

इनमें जब केवल औषध ही बरती जाती है, उसको अभक्त कहते हैं ।

वि० मन्तव्य—जैसे लंघन-उपवास करते २ औषध खिलाई जाती है ॥६६॥

वीर्याधिकं भवति भेषजमन्मनहोन्

हन्यात्तथाऽऽमयमसंशयमाशु चैव ।

तद्वाळवृद्धवन्तितामृदवस्तु पीत्वा

ग्लानिं परां समुपयान्ति बलक्षयं च ॥६७॥

अन्न के बिना औषध अधिक शक्तिशाली होती है । इससे औषध बिना संशय के रोगों को शान्त करती है । परन्तु इस प्रकार की औषध बालक, बृद्ध, स्त्री एवं कोमल प्रकृति के मनुष्य पीकर विशेष ग्लानि तथा बलक्षय को प्राप्त होते हैं ।

वि० मन्तव्य—इससे लाभ तो बहुत होता है, परन्तु बाल आदि को उससे हानि भी होती है, और उनको भी जिनको लंघन का निषेध है । ऐसे रोगियों को लघु भोजन के साथ २ औषध देना चाहिये देखिये निम्नलिखित श्लोक ६६ ॥६७॥

प्राग्भक्तं नाम श्रोक्तं यत प्राग्भक्तस्तयोपयुज्यते ॥६८॥

जो औषध भोजन से पूर्व दी जाती है, उसका नाम प्राग्भक्त है ॥६८॥

श्रीमं विपाकमुपयान्ति बलं न हिंस्या-

द्वजावृतं न च मुधबंदनान्निरेति ।

प्राग्भक्तसेवितमथौषधमेतदेव

दद्यात्तु च वृद्धशिशुभोक्तुमाक्रान्नाभ्यः ॥६९॥