सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 861, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६४]
अन्तरत्नत्रय
८०१
इस प्रकार की औषधि शीघ्र ही मुखपूर्वक पच जाती है, बल का नाश नहीं करती। अन्न से आहत होने के कारण मुख से वापिस नहीं निकलती। भोजन से पूर्व सेवन की औषध वृद्ध, शिशु, डरपोक, कृश एवं स्त्रियों के लिये देनी चाहिये ॥६६॥
अधोभक्तं नाम—यदधो भक्तस्येति ॥७०॥
जो औषध भोजन के पीछे दी जाती है, उसका नाम अधोभक्त है ॥७०॥
मध्यभक्तं नाम—यन्मध्ये भक्तस्य पीयते ॥७१॥
जो औषध भोजन के बीच में दी जाती है, उसका नाम मध्येभक्त है ॥७१॥
पीतं यदन्नमुपयुज्य तदूर्ध्वकाये
हन्याद् गदान् बहुविधाश्च बलं ददाति ।
मध्ये तु पीतमपहन्यविसारिभावा-
चे मध्यदेहसमिभूय भवन्ति रोगाः ॥७२॥
औषध पीकर जो अन्न खाया जाता है, वह शरीर के ऊर्ध्व भाग के बहुत से रोगों को नष्ट करके, शरीर के ऊर्ध्व भाग में बल देता है। भोजन के बीच में पी हुई औषध न फैलने के स्वभाव के कारण कोष्ठ के रोगों को नष्ट करती है ॥७२॥
अन्तराभक्तं नाम—यदन्तरा पीयते पूर्वापरयोर्मक्तयोः ७३ पूर्व और अपर भोजनों के बीच में जो औषध पी जाती है, (प्रातः और सायं भोजन के बीच में) वह अन्तराभक्त है ॥७४॥
सभक्तं नाम—यत् सह भक्तैन ॥७५॥
भोजन के साथ सिद्ध की या खाई हुई औषध सभक्त है ॥
पथ्यं सभक्तमबलाबलयोहिं नित्यं
तद्वृद्धिषामपि तथा शिशुवृद्धयोश्च ।
हृद्यं मनोबलकरं त्वथ दीपनं च
पथ्यं सदा भवति चान्तरभक्तकं यत् ॥६५॥
स्त्री, दुर्बल, औषध से द्रव रखनेवाले, शिशु, वृद्ध इनके लिये भोजन के साथ औषध देना सदा हितकारी है। इस प्रकार दी हुई औषध हृदय के लिये प्रिय, मनोबल को देनेवाली, अग्निदीपक, सदा पथ्य है ॥७५॥
सामुद्रगं नाम—यद्वक्तस्यादावन्ते च पीयते ॥७६॥
दोषे द्विधा प्रविस्तृते च समुद्रगसंज्ञ-
माद्यन्तयोर्यदशनस्य निषेध्यते तु ॥७७॥
सामुद्रग—भोजन के आदि में और भोजन के अन्त में जो औषध दी जाती है, वह सामुद्रग है। दोष के ऊपर और नीचे दोनों ओर प्रसृत होने पर औषध को भोजन के आदि और अन्त में दिया जाता है, इसको सामुद्रग कहते हैं ॥७६,७७॥
मुहुर्मुहुर्नाम—
सभक्तमभक्तं वा यदोषधं मुहुर्मुहुर्पयुज्यते ॥७८॥
श्वासे मुहुर्मुहुर्तिप्रस्तृते च कासे
हिक्कावमीपु स वदन्त्युपयोऽयमेतत् ॥७९॥
भोजन के साथ या भोजन के बिना जो औषध बार-बार सेवन की जाती है, उसका नाम मुहुः मुहुः है। श्वास में या कास के बहुत वेगवान् होने पर, हिचकी में, वमन में औषध को बार-बार देना चाहिये ॥
प्रासं तु—यत्पिण्डन्यामिश्रम् ॥८०॥
कवच के साथ मिलाई औषध प्रास औषध है ॥
प्रासान्तरं तु यद्प्रासान्तरेषु ॥८१॥
दो प्रासों ( कवलों ) के बीच में दी गई औषध प्रासान्तर औषध कही जाती है ॥८१॥
प्रासेषु चूर्णमबलाग्निपु दीपनीयं
वाजीकराण्यपि तु योजयितुं यतेत ।
प्रासान्तरेषु वितरेद्दमनीयभूमान्
श्वासादिषु प्रथितदृष्टगुणाश्च लेहान् ॥८२॥
दुर्बलाग्नि में, प्रासों में औषध देवे। दीपन गुण एवं वाजीकरण औषधियों को भी इसी रूप में देने का यत्न करे। वमन कारक धूमों को प्रासों के बीच में देवे। श्वास आदि रोगों में दृष्ट गुणवाले प्रसिद्ध लेहों को प्रासान्तरों में दे ॥८२॥
एवमेते दूगौषधकालाः ॥८३॥
इस प्रकार से ये दश औषधकाल हैं।
रोग्यवेक्ष्य यथा प्रायः निरन्तो बलवान् पिबेत् ।
भेषजं लघुपथ्यान्नैः युक्तमद्यात्तु दुर्बलः ॥
भेषज्यकालो भक्तादौ मध्ये पश्चान्मुहुर्मुहुः ।
सामुद्रगं भक्तसंयुक्तं प्रासे प्रासान्तरे तथा ॥ चरक ॥
विसृष्टे विष्णून्ने विशदकरणे देहे च सुलघौ
विशुद्धे चोद्गारे हृदि सुविमले वाते च सरति ।
तथाऽन्नश्रद्धायां कृमपरिगमे कुक्षौ च शिथिले
प्रदैयस्त्वाहारी भवति भिषजां कालः स तु मतः ॥८४॥
आहारकाल—मलमूत्र का त्याग कर चुकने पर, इन्द्रियों के निर्मल होने पर, शरीर में हल्कापन प्रतीत होने से, उद्गार के शुद्ध हो जाने पर, हृदय में निर्मलता होने से, अपान वायु का अघः प्रवाहण होने पर, भोजन में रुचि होने पर, थकान मिट जाने पर, उदर में ढीलापन होने से, वैद्य को चाहिये कि इस समय आहार देवे, क्योंकि भोजन का सच्चा समय यही है ॥८४॥
इति श्रीमुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे तन्त्रभूषणाध्यायेषु
स्वस्थवृत्ताध्यायो नाम (द्वितीयोऽध्यायः, आदितः)
चतुःषष्ठितमोऽध्यायः ॥६४॥