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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १५ ]

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

अथातस्तन्त्रयुक्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथे वाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे तंत्रयुक्ति अध्याय का व्याख्यान करेंगे—

जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—तन्त्र-तत्र आयुर्वेदः, शाखा, विद्या, सूत्रं, शान्, शास्त्रं, लक्षणं तन्त्रम् इति अनर्थन्तरम् ( च० सू० अ० ३० ) अर्थात् ये सब शब्द तन्त्र के पर्याय हैं। युक्ति-योजना-जोड़ना अर्थात् तन्त्रमें लिखे गये वाक्यों के शब्दों को जोड़कर उचित अर्थ निकालना “तन्त्रयुक्ति” कहलाता है। तन्त्रयुक्तियों के बिना वाक्यों का तारय नहीं निकाला-समझा जा सकता ॥

द्वान्त्रिंशत्तन्त्रयुक्त्यो भवन्ति शास्त्रे। तद्यथा-अधिकरणं १, योगः २, पदार्थः ३, हेतुवर्धः ४, उद्देशः ५, निर्देशः ६, उपदेशः ७, अपदेशः ८, प्रदेशः ९, अतिदेशः १०, अपवर्गः ११, वाक्यशेषः १२, अर्थापत्तिः १३, विपर्ययः १४, प्रसङ्गः १५, एकान्तः १४, अनेकान्तः १७, पूर्वपक्षः १८, निर्णयः १९, अनुमतं २०, विधानम् २१, अनागतावैक्षणम् २२, अतिक्रान्तावैक्षणं २३, संशयः २४, व्याख्यानं २५, स्वसंज्ञा २६, निर्वाचनं २७, निदर्शनं २८, नियोगः २०, विकल्पः ३०, समुच्चयः ३१, ऊहम् ३२, इति ॥३॥

सुश्रुत शास्त्र में बत्तीस तंत्रयुक्तियाँ हैं। यथा—अधिकरण, योग, पदार्थ, हेतुवर्ध, उद्देश, निर्देश, उपदेश, अपदेश, प्रदेश, अतिदेश, अपवर्ग, वाक्यशेष, अर्थापत्ति, विपर्यय, प्रसंग, एकान्त, अनेकान्त, पूर्वपक्ष, निर्णय, अनुमत, विधान, अनागतावैक्षण, अतिक्रान्तावैक्षण, संशय, व्याख्यान, स्वसंज्ञा, निर्वाचन, निदर्शन, नियोग, विकल्प, समुच्चय, और ऊह ये बत्तीस तंत्रयुक्तियाँ हैं।

वक्तव्य—अन्य शास्त्रों में छत्तीस तंत्रयुक्तियाँ मानी हैं ॥३॥

अत्रासां तन्त्रयुक्तानां किं प्रयोजनम्? उच्यते—वाक्ययोजनमर्थयोजनं च ॥४॥

इन तंत्र युक्तियों का लाभ क्या है? कहते हैं—असम्बद्ध वाक्य का सम्बन्ध जोड़ना और छिपे हुए अर्थ को प्रकाशित करना, इन तंत्र युक्तियों का प्रयोजन है।

वि० मन्तव्य—प्रयोजन-तन्त्रयुक्तियों का आवश्यकता—अबीयानोऽपि शास्त्राणि तन्त्रयुक्त्यविच्छिन्नः। नाधिगच्छति शास्त्रार्थान् अर्थान् माग्यक्षये यथा ॥ च० सि० अ० १२। अर्थात् जा तन्त्रयुक्तियों को भली भाँति नहीं जानता वह शास्त्रों को पढ़ता हुआ भी शास्त्र के अर्थों को नहीं समझ सकता। और ‘अतश्च प्रकृतं बुद्ध्या देशकालान्तराणि च। तन्त्रकृतः अभिप्रायान् उपमानं च अर्थ आदिशेत्। ३७। ( च० अ० २६ )। तात्पर्य—तन्त्रकृतों के अभिप्राय को समझकर ही अर्थ कहना चाहिये ॥४॥

भवन्ति चात्र लोकाः—

असद्वादिप्रयुक्तानां वाक्यानां प्रतिषेधनम्।

स्ववाक्यसिद्धिरपि च क्रियते तन्त्रयुक्तिः ॥५॥

व्यक्ता नोक्तास्तु ये ३५५ लीना ये चाप्यनिर्मलाः।

लेशोक्ता ये च केचित्स्युस्तेषां चापि प्रसाधनम् ॥६॥

इस विषय में श्लोक भी है—तंत्र युक्तियों द्वारा असद्वादियों से प्रयुक्त वाक्यों का प्रतिषेध किया जाता है। तथा तंत्रयुक्तियों से अपने वाक्य की सिद्धि भी की जाती है। स्पष्ट होने से जो विषय नहीं कहे, तथा जो अर्थ छिपे होने के कारण स्पष्ट नहीं हैं, और जो विषय संक्षिप्त रूप में (लेशमात्र) कहे हैं, उनका भी स्पष्टीकरण तंत्रयुक्तियों से होता है ॥५,६॥

यथाऽस्मज्जवनस्यार्कः प्रदीपो वैश्वानरो यथा।

प्रबोधस्य प्रनाशार्थं तथा तन्त्रस्य युक्तयः ॥७॥

जिस प्रकार कि कमल वन के लिये सूर्य, घर के लिये दीपक प्रकाश करनेवाला होता है, उसी प्रकार तत्र को प्रकाशित करने के लिये, स्पष्ट करने के लिये युक्तियाँ हैं ॥७॥

तत्र यमर्थमधिकृत्योच्यते तदधिकरणं,

यथा—रसं दोषं वा ॥८॥

इसमें जिस अर्थ (विषय) को लेकर कहा जाता है, उसका नाम अधिकरण है, यथा रस या दोष को लेकर कहेंगे।

वि० मन्तव्य—अधिकरण—अध्याय, प्रकरण आदि का पर्याय है। अधिकरण नाम यं अधिकृत्य प्रवर्चते कर्ता ( च० सि० अ० १२ श्लो० ७१ की च० पा० टी० ) ॥८॥

येन वाक्यं युज्यते स योगः यथा—

‘तैलं पिबेत्चासृतवर्हिनिम्ब-

हिंसाभयावृक्षकपिप्पलीभिः।

सिद्धं बलाभ्यां च सदेवदारु

हिताय नित्यं गलगण्डरोगे ॥

इत्यत्र तैलं सिद्धं पिबेदिति प्रथमं वक्तव्ये तृतीयपादे सिद्धमिति प्रयुक्तं; एवं दूरस्थानामपि पदानामेकीकरणं योगः ॥९॥

जिससे वाक्य जोड़ा जाता है वह योग है। गिलोय, नीम, हिंसा, हरड, कुटज, पिप्पली, बला, अतिबला, देवदारु इनसे सिद्ध किया तैल पीये। यह गलगण्ड रोग में हितकारी है। इसमें सिद्ध तैल पीये, इस प्रकार कहने की अपेक्षा है, ‘सिद्ध किया’ यह शब्द तीसरे पाद में है, दूरस्थ होने पर भी पद को मिलाकर एक करने का नाम योग है ॥९॥

योऽर्थोऽभिहितः सूत्रे पदे वा स पदार्थः, पदस्य पदयोः पदानां वाऽर्थः, अपरिमिताश्च पदार्थाः। यथा—स्नेहस्वेदाञ्जनेषु निर्दिष्टेषु द्रव्योद्ययाणां वाऽर्थानासुप-