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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ६५ ]

उत्तरतन्त्रम्

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पत्तिर्दृश्यते, तत्र योऽर्थः पूर्वापरयोगसिद्धो भवति स प्रहीतव्यः, यथा—'वेदोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्याम' इत्युक्ते सन्दिग्धते बुद्धिः—कतमस्य वेदस्योत्पत्तिं वक्ष्यतीति, यतः ऋग्वेदाद्यस्तु वेदाः, 'विद् विचारेण, विद्बल्लाम्बे' इत्येतयोश्च धातवोरनेकार्थयोः प्रयोगात्, तत्र पूर्वापरयोगमुपलभ्य प्रतिपत्तिर्भवति—आयुर्वेदोत्पत्तिमयं विवक्षुरिति एष पदार्थः ॥१०॥

सूत्र में या पद में जो अर्थ कहा हो उसे पदार्थ कहते हैं। एक पद का, दो पद का, वा बहुत से पदों का जो अर्थ होता है, वह पदार्थ है। पदों के अर्थ असंख्येय होते हैं। यथा—स्नेहन स्वेदन-अंजन में कहे हुए दो या तीन अर्थों की प्रतीति (अनुभव) होती है (कौनसा स्नेहन, कौनसा स्वेद, कौनसा अंजन बरते), इनमें पूर्वापर योग को देखकर जो अर्थ निर्णय किया जाये, वह लेना चाहिये। यथा—“वेदोत्पत्ति अध्याय का व्याख्यान करेंगे—” ऐसा कहने पर बुद्धि में सन्देह उत्पन्न होता है कि कौन से वेद की उत्पत्ति को कहें। क्योंकि ऋग्वेद आदि वेद हैं, विद् विचारेण और विद्बल्लाम्बे—इन धातुओं का अनेक अर्थों में प्रयोग देखा जाता है। इस अवस्था में पूर्वापर संयोग को देखकर ज्ञान होता है कि आयुर्वेदोत्पत्ति को कहनेवाले हैं, यह पदार्थ है ॥१०॥

यद्वन्यदुक्तमन्यार्थसाधकं भवति स हेत्वर्थः। यथा मृत्पिण्डोऽग्निः प्रकिलद्यते तथा माषदुग्धप्रभृतिभिर्ब्रणः प्रकिलद्यत इति ॥११॥

अन्य के लिये कही हुई जो बात दूसरे अर्थ को सिद्ध करती है, उसे हेत्वर्थ कहते हैं। यथा—पानी से मिट्टी का ढेला गीला होता है उसी प्रकार उड़द दूध आदि से ब्रण भी क्लेदयुक्त होता है ॥११॥

समासवचनमुद्देशः। यथा—शल्यमिति ॥१२॥

संक्षेप में कहने का नाम उद्देश है, यथा—शल्यम् ॥१२॥

विस्तरवचनं निर्वेशः। यथा—शारीरमागन्तुकं चेति ॥

विस्तार से कहने का नाम निर्वेश है, यथा—शारीरशल्य, आगन्तुजशल्य ॥१३॥

एवमित्युपदेशः। यथा—तथा न जागृयाद्वाग्नी दिवा-स्वप्नं च वर्जयेत् ॥१४॥

इस प्रकार से करे, यह उपदेश है, यथा रात में न जागे और दिन में सोना छोड़ देवे।

वक्तव्य—उपदेश नियोग में भेद—उपदेश प्रायिक होता है, और नियोग अप्रायिक होता है ॥१४॥

अनेन कारणेनेत्यपदेशः, यथाऽपदिश्यते—मधुरः श्लेष्माणमभिवर्धयतीति ॥१५॥

इस कारण से यह कार्य हुआ है, या होता है, ऐसा कहना अपदेश है, यथा—कहते हैं कि मधुर रस कफ को बढ़ाता है ॥

प्रकृतस्यातिक्रान्तेन साधनं प्रदेशः। यथा देवदत्तस्यानेन शल्यमुद्भूतं तथा यज्ञदत्तस्याप्ययमुद्भूतं ॥

प्रकृत वस्तु के भी आगे जाकर सिद्ध करने का नाम प्रदेश है। यथा—इसने देवदत्त का शल्य निकाला है, इसी प्रकार यज्ञदत्त का भी (शल्य) निकाला होगा ॥१६॥

प्रकृतस्यानागतस्य साधनमतिदेशः यथा-यतोऽस्य वायुरूपधर्ममुत्तिष्ठते तेनोदावर्ती स्यादिति ॥१७॥

प्रकृत में न आई हुई वस्तु को सिद्ध करने का नाम अतिदेश है, यथा—क्योंकि इसकी वायु रूप को उठती है, इसलिये वह उदावर्ती रोगी होगा। यह संभावना हो जाती है ॥

अभिन्व्याप्यापकर्षणमपवर्गः, यथा—अस्वेद्या विषोपसृष्टाः, अन्यत्र कीटविषादिति ॥१८॥

सब में व्याप्त होकर फिर अपकर्षण करना (अपवाद करना) अपवर्ग है, यथा—विष से पीड़ितों को स्वेद नहीं देना चाहिये यह कहकर कीट विषादि को छोड़कर यह कहना अपवर्ग है ॥

येन पदेनानुक्तेन वाक्यं समाप्यते स वाक्यशेषः। यथा—शिरःपाणिपादपाशर्वगुष्ठोदरोरसामित्युक्ते पुरुषग्रहणं विनाऽपि गम्यते पुरुषस्येति ॥१९॥

जिस अनुक्त पद से वाक्य समाप्त किया जाता है, वह वाक्यशेष है, यथा शिर, हाथ, पैर, पाशर्व, पीठ, उदर, छाती इतना कहने पर 'पुरुष के' कहे बिना भी पुरुष के, यह जान लिया जाता है ॥१९॥

यदकीर्तितमर्थोदापद्यते साऽर्थोपपत्तिः। यथा—भोदनं मोक्षे इत्युक्तेऽर्थादापन्नं भवति-नार्य पिपासुर्यवागमिति ॥

जो न कहा हुआ भी अर्थ से प्रतिपादित होता है, उसको अर्थोपपत्ति कहते हैं, यथा—चावल खाऊंगा यह कहने से अर्थ से समझ लिया जाता है कि, यह यवाग नहीं पीना चाहता ॥

यद्यत्राभिहितं तस्य प्रातिलोम्यं विपर्ययः। यथा—कुशाल्यप्राणभीरवो दुश्चिकित्स्या इत्युक्ते विपरीतं गृह्णते दृढादयः मुचिकित्स्या इति ॥२०॥

जो यहां कहा हो, उसके विपरीत का नाम विपर्यय है, यथा—कूश, अल्पप्राण, भीरु पुरुष दुश्चिकित्स्य होते हैं, यह कहने पर विपरीत रूप में समझ लिया जाता है कि दृढ़ बहुप्राण निडर व्यक्ति मुचिकित्स्य हैं ॥२०॥

प्रकरणान्तरेण समापनं प्रसङ्गः, यदा प्रकरणान्तरितो योऽर्थोऽसङ्कृष्टः समाप्यते स प्रसङ्गः, यथा—पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषस्तस्मिन् क्रिया सोऽधिष्ठानमिति