सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 864, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 864

८०८

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६५ ]

वेदोत्पत्तावभिधाय, भूतचिन्तायां पुनरुक्तं—यतोऽभिहितं पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष इति, स स्वस्वेष कर्म-पुरुषश्रिक्रिस्ताधिकृत इति ॥२२॥

दूसरे प्रकरण समान (तुल्य) का नाम प्रसंग है, अथवा प्रकरणों के बीच में जो विषय बार-बार कहा जाता है—समाप्त किया जाता है, उसे प्रसंग कहते हैं। यथा—वेदोत्पत्ति अध्याय में 'पंचमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' उसमें, क्रिया, वही अधि-धान हैं, यह कहकर भूतचिन्ता अध्याय में फिर कहना कि क्योंकि कहा है 'पंचमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' इति वही कर्मपुरुष चिकित्सा में अधिकृत है ॥२२॥

(सर्वत्र) यदवधारणेनोच्यते स एकान्तः यथा—त्रिवृद्धिरेचयति, मदनफलं वामयति (एत्र) ॥२३॥

जो विना विकल्प के निश्चित रूप से कहा जाता है, वह एकान्त है, यथा—निशोय विरेचन करता है, मदनफल वमन करता है ॥२३॥

क्वचित्था क्वचिदन्यथेति या सोऽनेकान्तः, यथा—केचिदाचार्यां त्रवते द्रव्यं प्रधानं, केचिद्वरसं, केचिद्वीर्यं केचिद्विपाकमिति ॥२४॥

कहीं ऐसा और कहीं दूसरा ऐसा जहाँ हो (अनिश्चित) उसे अनेकान्त कहते हैं, यथा—कोई आचार्य कहते हैं कि द्रव्य प्रधान है, कोई रस को, कोई वीर्य को और कोई विपाक को प्रधान मानते हैं ॥२४॥

आत्मेपपूर्वकः प्रश्नः पूर्वपक्षः। यथा—कथं वात-निमित्ताश्वत्वारः प्रमेहा असाध्या भवन्तीति ॥२५॥

आत्मेपपूर्वकप्रश्न को पूर्वपक्ष कहते हैं, यथा—वातजन्य चार प्रमेह किस कारण से असाध्य होते हैं ॥२५॥

तस्योत्तरं निर्णयः। यथा—शरीरं प्रपीड्य पश्चा-दधो गत्वा बसामेदोमज्जातुविद्धं मूत्रं विसृजति वातः, एवमसाध्या वातजा इति ॥२६॥

तथा चोक्तम्—

कृत्स्नं शरीरं निष्पीड्य मेदोमज्जावसायुतः।

अधः प्रकृप्यते वायुस्तेनासाध्यास्तु वातजाः ॥२७॥

इसके उत्तर का नाम निर्णय है, यथा—शरीर को पीड़ित करके पीछे नीचे मूत्राशय में जाकर वसा, मेद, मज्जा से मिला मूत्र वायु त्याग करता है, इसलिये वातजन्य प्रमेह असाध्य हैं। कहा भी है—सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करके मेद, मज्जा, वसा से मिली वायु अघोभाग में प्रकृपित होती है, इसलिये वात-जन्य प्रमेह असाध्य हैं ॥२६-२७॥

परमतमप्रतिपिद्धमुमुतम्। यथा—अन्यो ब्रूयात्—सप्त रसा इति, तच्छाप्रतिषेधादुमुन्यते कथचिदिति ॥

दूसरे मत को स्वीकार करना (विरोध न करना) अनुमत है, यथा—दूसरा कहे सात रस हैं, इसका विरोध न करने से किसी भी प्रकार में सहमत होना अनुमत है ॥२८॥

प्रकरणानुपूर्याऽभिहितं विधानम्। यथा—सकथि-मर्मण्येकादश प्रकरणानुपूर्याऽभिहितानि ॥२९॥

प्रकरण के अनुसार कहने का नाम विधान है, यथा—टांग के मर्म ग्यारह प्रकरण के अनुसार कह दिये हैं ॥२९॥

एवं वक्ष्यतीत्यनागतावेश्मम्। यथा—इलोकस्थाने ब्रूयात्—चिकित्सितेषु वक्ष्यामीति ॥३०॥

इस प्रकार से कहेंगे, यह कहना अनागतावेश्म है, यथा—इलोकस्थान में कहे कि—चिकित्सा में कहेंगे ॥३०॥

यत्पूर्वमुक्तं तदतिक्रान्तावेश्मम्। यथा—चिकित्सितेषु ब्रूयात्—इलोकस्थाने यद्विरितमिति ॥३१॥

जो पहले कहा हो, उसे कहना अतिक्रान्तावेश्म है, यथा—चिकित्सा में कहे कि—इलोकस्थान में जैसा कहा है ॥३१॥

उभयहेतुदर्शनं संशयः। यथा—तलहृदयाभिघातः प्राणहरः, पाणिपादच्छेदनमप्राणहरमिति ॥३२॥

हेतु का दोनों में घटना संशय है, यथा—तलहृदय (मर्म) पर चोट लगना प्राणहर है, हाथ पैर का काटना प्राणनाशक नहीं है ॥३२॥

तन्त्रेऽतिशयोपवर्णनं व्याख्यानम्। यथा—इह पञ्च-विशतिकः पुरुषो व्याख्यायते, अन्येष्वायुर्वेदतन्त्रेषु भूता-दिप्रभृत्यारभ्य चिन्ता ॥३३॥

अतिरिक्त विषय का कहना व्याख्यान है, यथा—इस सुश्रुत में पञ्चवीस तन्त्रोंवाले पुरुष को कहा जाता है, दूसरे आयुर्वेद तंत्रों में भूतादि अहंकार से आरम्भ करके (अन्यक्त से नहीं) व्याख्यान किया जाता है ॥३३॥

अन्यशास्त्रासामान्या स्वसंज्ञा। यथा—मिश्रुतमिति मधुसर्पिषोप्रहृणं, लोकप्रसिद्धमुदाहरणं वा ॥३४॥

अन्य शास्त्रों के समान न होना स्वसंज्ञा है। यथा मिश्रुत से मधु और घृत का ग्रहण करना, अथवा लोक प्रसिद्ध उदाहरण का नाम स्वसंज्ञा है, यथा महास्नेह ॥३४॥

निश्चितं वचनं निर्वचनम्। यथा—आयुर्विद्यते-ऽस्मिन्नेन वा, आयुर्विन्दतीत्यायुर्वेदः ॥३५॥

निश्चित वचन का कहना निर्वचन है, यथा—इसमें (इस शास्त्र में) आयु (आयु का ज्ञान) रहती है, या इस शास्त्र से आयु प्राप्त की जाती है यह आयुर्वेद है ॥३५॥

दृष्टान्तव्यक्तिनिर्दर्शनम्। यथा—अग्निर्वायुना सहितः कश्चै वृद्धि गच्छति तथा वातपित्तकफदुष्टो ब्रण इति ॥३६॥