सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 865, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 865

अ० ६६ ] १०२

उत्तरतन्त्रम्

६०६

दृष्टान्त देकर स्पष्ट करने का नाम निदर्शन है, यथा-अग्नि वायु के साथ मिलकर तिनकों के ढेर में बढ़ती है, इसी प्रकार वात-पित्त कफ से दूषित व्रण बढ़ता है ॥३६॥

इदमेव कर्तव्यमिति नियोगः । यथा—पथ्यमेव भोक्तव्यमिति ॥३७॥

यही करना चाहिये, इनका नाम नियोग है, यथा पथ्य ही खाना चाहिये ॥

वक्तव्य—इसका अपवाद भी होता है—

“उत्पद्यते हि साऽवस्था देशकालबलं प्रति ।

यस्यां कार्यमकार्यं स्याद् वर्जितं कार्यमेव च ॥”३७॥

इदं चेदं चेति समुच्चयः । यथा—मांसवर्गं एणहरिणादयो लावतिचिरिसारङ्गाश्च प्रधानानीति ॥३८॥

‘यह भी है और यह भी है’ इसका नाम समुच्चय है, यथा—मांसवर्ग में एण, हरिण आदि मुख्य हैं और वटेर-तितर-सारङ्ग आदि भी मुख्य हैं ॥३८॥

इदं वेदं चेति विकल्पः । यथा—रसौदनः सघृता यवा-गूर्वा (भवस्त्विति) ॥३९॥

यह अथवा यह—इसका नाम विकल्प है, मांसरस के साथ भात अथवा घृतमिश्रित यवागूर् खाये ॥३९॥

यदनिर्दिष्टं बुद्ध्याऽवगम्यते तद्ब्रह्म । यथा—अभिहितमन्तपानविषो चतुर्विधं चान्नमुपदिश्यते—भक्ष्यं भोज्यं लेह्यं पेयमिति एवं चतुर्विधं वक्तव्ये द्विविधमभिहितम्, इदमत्रोहम्—अन्नपाने विभिन्नयोर्द्वयोर्ग्रहणे कृते चतुर्णामपि ग्रहणं भवस्तीति चतुर्विधश्चाहारः प्रविरलः प्रायेण द्विविध एव, अतो द्वित्वं प्रसिद्धमति । किञ्चान्यत्-अन्नं भक्ष्यमवरुद्धं, घनसाधन्यार्त्तं, पेयेन लेह्यं, द्रवसाधन्यार्त्तं ॥४०॥

जो न कहा हो, उसे बुद्धि से जानने का नाम उद्य है, यथा—अन्नपानविधि में कहा है कि चार प्रकार का अन्न कहा जाता है । भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, पेय । इस प्रकार चार प्रकार का कहने में दो प्रकार का कहा है । इसमें यहाँ तक बुद्धि से विचारना चाहिये कि मुख्य रूप से दो प्रकार के अन्नपान के ग्रहण करने में चारों प्रकार के अन्न का ग्रहण हो जाता है । अतिशय विभाग रूप में चार प्रकारका आहार भी दो प्रकार का ही है, इसलिये दो प्रकार का प्रसिद्ध है । और भी कुछ अन्न से भक्ष्य वस्तु अलग नहीं, घन वस्तु की समानता से । पेय में लेह्य का समावेश हो जाता है, द्रव की समानता से ॥४०॥

भवन्ति चात्र—

सामान्यदर्शनेनासां व्यवस्था संप्रदर्शिता ।

विशेषस्तु यथायोगमुपधायीं विपञ्चित्ता ॥४१॥

द्वान्निशयुक्तयो ह्येतास्तन्त्रसारगवेषणे ।

मया सम्यग्निनिहताः शब्दार्थन्यायसंयुताः ॥४२॥

यो ह्येता विधिवद्भेति दोषीभूतास्तु बुद्धिमान् ।

स पूजाहो भिषक्श्रेष्ठ इति धन्वन्तरेभ्यस्तम् ॥४३॥

इस विषय में श्लोक हैं—इन तंत्रयुक्तियों की व्यवस्था सामान्य रूप में यहाँ कह दी है, विद्वान् को चाहिये कि इनकी विशेषताओं को योग के अनुसार निश्चय कर ले । यन्त्र के सार को ढूँढने में बत्तीस युक्तियाँ हैं, इनको शब्द-अर्थ-न्याय के साथ मैंने भली प्रकार कह दिया है । जो बुद्धिमान् इन प्रकाशमान् युक्तियों को भली प्रकार जानता है, वह पूजा के योग्य श्रेष्ठ वैद्य है, ऐसा धन्वन्तरि का मत है ॥४१-४३॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे तन्त्रभूषणाध्यायेषु तन्त्र-

युक्तिनाम (तृतीयोऽध्यायः, आदितः)

पञ्चषष्ठितमोऽध्यायः ॥६५॥

षट्षष्ठितमोऽध्यायः

अथातो दोषभेदविकल्पमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अत्र इसके आगे दोषभेदविकल्प अध्याय का व्याख्यान करेंगे-जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

अष्टाङ्गवेदविद्वांसं दिवोदासं महौजसम् ।

छिन्नशाखाथसंदेहं सूक्ष्मागाधगमोदधिम् ॥३॥

विश्वामित्तसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपुच्छति ।

आयुर्वेद के आठों अंगों के विद्वान् महा तेजस्वी, शास्त्र के अर्थों में सम्पूर्ण रूप से संशय रहित, सूक्ष्म अगाध शास्त्र के सागर दिवोदास को विश्वामित्र पुत्र श्रीमान् सुश्रुत ने पूछा ।

वक्तव्य—विश्वामित्र यद्यपि राजर्षि थे—तथापि तप के कारण ब्रह्म तेज से दीप्त होने के कारण श्रीमान् कहे हैं, यथा—“विद्यासमाप्तो ब्राह्मं वा सत्त्वमार्थमथापि वा । ध्रुवमाविशति ज्ञानात्तस्माद् वैद्यो द्विजः स्मृतः ॥” च० ॥३॥

द्विषष्टिदोषभेदा ये पुरस्तात्परिकीर्तिता ॥४॥

कति तत्रैकशो ज्ञेया द्विजो वाप्यथवा त्रिशः ।

आपने रसभेद विकल्प में दोषों के जो बासठ भेद कहे हैं, उनमें कितने एकवाले, कितने दोवाले और कितने तीनवाले जानने चाहिये ।

वक्तव्य—दोष संसर्ग बासठ हैं, रसभेद तिरसठ हैं, यथा—द्विषष्टिदोषभेदाः स्यु रसभेदाज्जिषष्टिषा ।

स्वास्थ्यं त्रिषष्ठं विज्ञेयं तत्र षड्ख्योजितम् ॥

एकशः षड् द्विधास्त्वैकविधातिश्रुतुरन्विता ।

त्रिषो द्वान्निशदित्येवं त्रयो दोषाः त्रिषष्टिषा ॥

वि० मन्तव्य—अध्याय ६४ श्लो० ४ में अविद्यच अर्थात्