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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

८०८

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६५ ]

वेदोत्पत्तावभिधाय, भूतचिन्तायां पुनरुक्तं—यतोऽभिहितं पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष इति, स स्वस्वेष कर्म-पुरुषश्रिक्रिस्ताधिकृत इति ॥२२॥

दूसरे प्रकरण समान (तुल्य) का नाम प्रसंग है, अथवा प्रकरणों के बीच में जो विषय बार-बार कहा जाता है—समाप्त किया जाता है, उसे प्रसंग कहते हैं। यथा—वेदोत्पत्ति अध्याय में 'पंचमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' उसमें, क्रिया, वही अधि-धान हैं, यह कहकर भूतचिन्ता अध्याय में फिर कहना कि क्योंकि कहा है 'पंचमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' इति वही कर्मपुरुष चिकित्सा में अधिकृत है ॥२२॥

(सर्वत्र) यदवधारणेनोच्यते स एकान्तः यथा—त्रिवृद्धिरेचयति, मदनफलं वामयति (एत्र) ॥२३॥

जो विना विकल्प के निश्चित रूप से कहा जाता है, वह एकान्त है, यथा—निशोय विरेचन करता है, मदनफल वमन करता है ॥२३॥

क्वचित्था क्वचिदन्यथेति या सोऽनेकान्तः, यथा—केचिदाचार्यां त्रवते द्रव्यं प्रधानं, केचिद्वरसं, केचिद्वीर्यं केचिद्विपाकमिति ॥२४॥

कहीं ऐसा और कहीं दूसरा ऐसा जहाँ हो (अनिश्चित) उसे अनेकान्त कहते हैं, यथा—कोई आचार्य कहते हैं कि द्रव्य प्रधान है, कोई रस को, कोई वीर्य को और कोई विपाक को प्रधान मानते हैं ॥२४॥

आत्मेपपूर्वकः प्रश्नः पूर्वपक्षः। यथा—कथं वात-निमित्ताश्वत्वारः प्रमेहा असाध्या भवन्तीति ॥२५॥

आत्मेपपूर्वकप्रश्न को पूर्वपक्ष कहते हैं, यथा—वातजन्य चार प्रमेह किस कारण से असाध्य होते हैं ॥२५॥

तस्योत्तरं निर्णयः। यथा—शरीरं प्रपीड्य पश्चा-दधो गत्वा बसामेदोमज्जातुविद्धं मूत्रं विसृजति वातः, एवमसाध्या वातजा इति ॥२६॥

तथा चोक्तम्—

कृत्स्नं शरीरं निष्पीड्य मेदोमज्जावसायुतः।

अधः प्रकृप्यते वायुस्तेनासाध्यास्तु वातजाः ॥२७॥

इसके उत्तर का नाम निर्णय है, यथा—शरीर को पीड़ित करके पीछे नीचे मूत्राशय में जाकर वसा, मेद, मज्जा से मिला मूत्र वायु त्याग करता है, इसलिये वातजन्य प्रमेह असाध्य हैं। कहा भी है—सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करके मेद, मज्जा, वसा से मिली वायु अघोभाग में प्रकृपित होती है, इसलिये वात-जन्य प्रमेह असाध्य हैं ॥२६-२७॥

परमतमप्रतिपिद्धमुमुतम्। यथा—अन्यो ब्रूयात्—सप्त रसा इति, तच्छाप्रतिषेधादुमुन्यते कथचिदिति ॥

दूसरे मत को स्वीकार करना (विरोध न करना) अनुमत है, यथा—दूसरा कहे सात रस हैं, इसका विरोध न करने से किसी भी प्रकार में सहमत होना अनुमत है ॥२८॥

प्रकरणानुपूर्याऽभिहितं विधानम्। यथा—सकथि-मर्मण्येकादश प्रकरणानुपूर्याऽभिहितानि ॥२९॥

प्रकरण के अनुसार कहने का नाम विधान है, यथा—टांग के मर्म ग्यारह प्रकरण के अनुसार कह दिये हैं ॥२९॥

एवं वक्ष्यतीत्यनागतावेश्मम्। यथा—इलोकस्थाने ब्रूयात्—चिकित्सितेषु वक्ष्यामीति ॥३०॥

इस प्रकार से कहेंगे, यह कहना अनागतावेश्म है, यथा—इलोकस्थान में कहे कि—चिकित्सा में कहेंगे ॥३०॥

यत्पूर्वमुक्तं तदतिक्रान्तावेश्मम्। यथा—चिकित्सितेषु ब्रूयात्—इलोकस्थाने यद्विरितमिति ॥३१॥

जो पहले कहा हो, उसे कहना अतिक्रान्तावेश्म है, यथा—चिकित्सा में कहे कि—इलोकस्थान में जैसा कहा है ॥३१॥

उभयहेतुदर्शनं संशयः। यथा—तलहृदयाभिघातः प्राणहरः, पाणिपादच्छेदनमप्राणहरमिति ॥३२॥

हेतु का दोनों में घटना संशय है, यथा—तलहृदय (मर्म) पर चोट लगना प्राणहर है, हाथ पैर का काटना प्राणनाशक नहीं है ॥३२॥

तन्त्रेऽतिशयोपवर्णनं व्याख्यानम्। यथा—इह पञ्च-विशतिकः पुरुषो व्याख्यायते, अन्येष्वायुर्वेदतन्त्रेषु भूता-दिप्रभृत्यारभ्य चिन्ता ॥३३॥

अतिरिक्त विषय का कहना व्याख्यान है, यथा—इस सुश्रुत में पञ्चवीस तन्त्रोंवाले पुरुष को कहा जाता है, दूसरे आयुर्वेद तंत्रों में भूतादि अहंकार से आरम्भ करके (अन्यक्त से नहीं) व्याख्यान किया जाता है ॥३३॥

अन्यशास्त्रासामान्या स्वसंज्ञा। यथा—मिश्रुतमिति मधुसर्पिषोप्रहृणं, लोकप्रसिद्धमुदाहरणं वा ॥३४॥

अन्य शास्त्रों के समान न होना स्वसंज्ञा है। यथा मिश्रुत से मधु और घृत का ग्रहण करना, अथवा लोक प्रसिद्ध उदाहरण का नाम स्वसंज्ञा है, यथा महास्नेह ॥३४॥

निश्चितं वचनं निर्वचनम्। यथा—आयुर्विद्यते-ऽस्मिन्नेन वा, आयुर्विन्दतीत्यायुर्वेदः ॥३५॥

निश्चित वचन का कहना निर्वचन है, यथा—इसमें (इस शास्त्र में) आयु (आयु का ज्ञान) रहती है, या इस शास्त्र से आयु प्राप्त की जाती है यह आयुर्वेद है ॥३५॥

दृष्टान्तव्यक्तिनिर्दर्शनम्। यथा—अग्निर्वायुना सहितः कश्चै वृद्धि गच्छति तथा वातपित्तकफदुष्टो ब्रण इति ॥३६॥

अ० ६६ ] १०२

उत्तरतन्त्रम्

६०६

दृष्टान्त देकर स्पष्ट करने का नाम निदर्शन है, यथा-अग्नि वायु के साथ मिलकर तिनकों के ढेर में बढ़ती है, इसी प्रकार वात-पित्त कफ से दूषित व्रण बढ़ता है ॥३६॥

इदमेव कर्तव्यमिति नियोगः । यथा—पथ्यमेव भोक्तव्यमिति ॥३७॥

यही करना चाहिये, इनका नाम नियोग है, यथा पथ्य ही खाना चाहिये ॥

वक्तव्य—इसका अपवाद भी होता है—

“उत्पद्यते हि साऽवस्था देशकालबलं प्रति ।

यस्यां कार्यमकार्यं स्याद् वर्जितं कार्यमेव च ॥”३७॥

इदं चेदं चेति समुच्चयः । यथा—मांसवर्गं एणहरिणादयो लावतिचिरिसारङ्गाश्च प्रधानानीति ॥३८॥

‘यह भी है और यह भी है’ इसका नाम समुच्चय है, यथा—मांसवर्ग में एण, हरिण आदि मुख्य हैं और वटेर-तितर-सारङ्ग आदि भी मुख्य हैं ॥३८॥

इदं वेदं चेति विकल्पः । यथा—रसौदनः सघृता यवा-गूर्वा (भवस्त्विति) ॥३९॥

यह अथवा यह—इसका नाम विकल्प है, मांसरस के साथ भात अथवा घृतमिश्रित यवागूर् खाये ॥३९॥

यदनिर्दिष्टं बुद्ध्याऽवगम्यते तद्ब्रह्म । यथा—अभिहितमन्तपानविषो चतुर्विधं चान्नमुपदिश्यते—भक्ष्यं भोज्यं लेह्यं पेयमिति एवं चतुर्विधं वक्तव्ये द्विविधमभिहितम्, इदमत्रोहम्—अन्नपाने विभिन्नयोर्द्वयोर्ग्रहणे कृते चतुर्णामपि ग्रहणं भवस्तीति चतुर्विधश्चाहारः प्रविरलः प्रायेण द्विविध एव, अतो द्वित्वं प्रसिद्धमति । किञ्चान्यत्-अन्नं भक्ष्यमवरुद्धं, घनसाधन्यार्त्तं, पेयेन लेह्यं, द्रवसाधन्यार्त्तं ॥४०॥

जो न कहा हो, उसे बुद्धि से जानने का नाम उद्य है, यथा—अन्नपानविधि में कहा है कि चार प्रकार का अन्न कहा जाता है । भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, पेय । इस प्रकार चार प्रकार का कहने में दो प्रकार का कहा है । इसमें यहाँ तक बुद्धि से विचारना चाहिये कि मुख्य रूप से दो प्रकार के अन्नपान के ग्रहण करने में चारों प्रकार के अन्न का ग्रहण हो जाता है । अतिशय विभाग रूप में चार प्रकारका आहार भी दो प्रकार का ही है, इसलिये दो प्रकार का प्रसिद्ध है । और भी कुछ अन्न से भक्ष्य वस्तु अलग नहीं, घन वस्तु की समानता से । पेय में लेह्य का समावेश हो जाता है, द्रव की समानता से ॥४०॥

भवन्ति चात्र—

सामान्यदर्शनेनासां व्यवस्था संप्रदर्शिता ।

विशेषस्तु यथायोगमुपधायीं विपञ्चित्ता ॥४१॥

द्वान्निशयुक्तयो ह्येतास्तन्त्रसारगवेषणे ।

मया सम्यग्निनिहताः शब्दार्थन्यायसंयुताः ॥४२॥

यो ह्येता विधिवद्भेति दोषीभूतास्तु बुद्धिमान् ।

स पूजाहो भिषक्श्रेष्ठ इति धन्वन्तरेभ्यस्तम् ॥४३॥

इस विषय में श्लोक हैं—इन तंत्रयुक्तियों की व्यवस्था सामान्य रूप में यहाँ कह दी है, विद्वान् को चाहिये कि इनकी विशेषताओं को योग के अनुसार निश्चय कर ले । यन्त्र के सार को ढूँढने में बत्तीस युक्तियाँ हैं, इनको शब्द-अर्थ-न्याय के साथ मैंने भली प्रकार कह दिया है । जो बुद्धिमान् इन प्रकाशमान् युक्तियों को भली प्रकार जानता है, वह पूजा के योग्य श्रेष्ठ वैद्य है, ऐसा धन्वन्तरि का मत है ॥४१-४३॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे तन्त्रभूषणाध्यायेषु तन्त्र-

युक्तिनाम (तृतीयोऽध्यायः, आदितः)

पञ्चषष्ठितमोऽध्यायः ॥६५॥

षट्षष्ठितमोऽध्यायः

अथातो दोषभेदविकल्पमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अत्र इसके आगे दोषभेदविकल्प अध्याय का व्याख्यान करेंगे-जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

अष्टाङ्गवेदविद्वांसं दिवोदासं महौजसम् ।

छिन्नशाखाथसंदेहं सूक्ष्मागाधगमोदधिम् ॥३॥

विश्वामित्तसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपुच्छति ।

आयुर्वेद के आठों अंगों के विद्वान् महा तेजस्वी, शास्त्र के अर्थों में सम्पूर्ण रूप से संशय रहित, सूक्ष्म अगाध शास्त्र के सागर दिवोदास को विश्वामित्र पुत्र श्रीमान् सुश्रुत ने पूछा ।

वक्तव्य—विश्वामित्र यद्यपि राजर्षि थे—तथापि तप के कारण ब्रह्म तेज से दीप्त होने के कारण श्रीमान् कहे हैं, यथा—“विद्यासमाप्तो ब्राह्मं वा सत्त्वमार्थमथापि वा । ध्रुवमाविशति ज्ञानात्तस्माद् वैद्यो द्विजः स्मृतः ॥” च० ॥३॥

द्विषष्टिदोषभेदा ये पुरस्तात्परिकीर्तिता ॥४॥

कति तत्रैकशो ज्ञेया द्विजो वाप्यथवा त्रिशः ।

आपने रसभेद विकल्प में दोषों के जो बासठ भेद कहे हैं, उनमें कितने एकवाले, कितने दोवाले और कितने तीनवाले जानने चाहिये ।

वक्तव्य—दोष संसर्ग बासठ हैं, रसभेद तिरसठ हैं, यथा—द्विषष्टिदोषभेदाः स्यु रसभेदाज्जिषष्टिषा ।

स्वास्थ्यं त्रिषष्ठं विज्ञेयं तत्र षड्ख्योजितम् ॥

एकशः षड् द्विधास्त्वैकविधातिश्रुतुरन्विता ।

त्रिषो द्वान्निशदित्येवं त्रयो दोषाः त्रिषष्टिषा ॥

वि० मन्तव्य—अध्याय ६४ श्लो० ४ में अविद्यच अर्थात्

द९४ सुश्रतसंहितीं

प्रकतिस्थ तथा विदग्ध अथात्‌ विकंतं दोषों के जो ६३ भद्‌

के ह उन्हीं का विवरण इस अध्याये किया गया हे ।

जव दोष प्रकृतिस्थ रहते है तब स्वास्थ्य (आरोग्य-नीरोगता,

बना रहता है ओर जब विकृत हो जाते है तब विविष रोग

उन्न हो जाते है | देखिये- सू अ० १५ । विधिमेद से

विदग्ध दोषदो प्रकारके होते दै, श-बृद्ध-स्वपरिमाण से

अधिक-बड़े इए, ₹-श्चीण-स्वपरिमाण से घटे इए ॥४॥

तस्य तद्रचनं श्रस्वा खंशयच्छिन्महातपाः ॥५॥ `

प्रोताव्मा चपजाद्‌ छः सुश्चतायाह त्वतः ।

सुश्रत ॐ इन वचनो को सुनकर संशय को नाश करने

वाके महातपस्वी, प्रसन्न आत्मा, दप्ाद्‌ल धन्वन्तरि ने

सुश्रत के ल्यि यथाथरूप मे कहा कि-

त्रयो दोषा धातवश्च पुरीषं मूत्रमेव च ॥६॥

देहं सन्धारयन्त्येते ह्यग्यापन्ना रघैर्हितेः।

पथ्य रसो से अविकत इए तीन दोष, सातां घातु मल

ओर मू इस शरीर को धारण करते हं ॥५,६॥

पुरुषः षोडञकखः प्राणाश्चैकादशेव ये ॥७।

रोगाणां तु सहसरं यच्छतं वि तिरेव च । डतं च पञ्च द्रव्याणां तरिसप्रत्यधिकोत्तरम्‌ ॥८॥।

व्यासतः कीर्तितं तद्धि षोडशकलावाखा पुरुष, एकादश (ग्यारह) प्राण, एकर्हजार

२ रोग, पाच सो तिहत्तर द्रव्य ये विस्तार से क

वक्तव्य-षोडश कलावाठा -पुरुष - पंचमहामूत, -पएकाद्रा

इन्द्रिया, ये सोलह विकार, ग्यारह -प्राण-अग्नि, सोम; . वायु सत्त्व, रज, तम ओर पाँच इन्द्रर्या, एक, हजार -एकयो . बीस

रोग, इन रोगों का विस्तरत दणन श्लोक बद्धः करके उल्हण. ने रीकामेंदियाइे। चरक भे सोलह कठा से- चतुष्पदं षोडशकरं भेषजमिति

भिषजो भाषन्ते, इख वाक्य से षोडशगुण रोगी, वेय, परिचारक,

ओषध इनके सोह गुण कोद मानते हँ ।. उनके मत में कला

शब्द गुणव] ची है १ । इसपे कोई सवभत चिन्तां शरीरोक्त सुख दुःख इच्छा द्वेष प्रयत्नादि को धोढडश् गुण मानते है । वि० मन्तव्य--डल्लन टीका में श्लोक बद्धं विवरण इस प्रकार दे-- „ . अत्र सोते तन्ते षट्स्थानेषु प्रोक्तरोगाः शोकैः अभि- _ घीयन्ते-

हीनाऽतिदग्धो क्षारेण, बधः प्लुष्टादयोऽग्निना । चदु धूमविदहितः पश्च शोणितदुटयः ॥१॥ दोषधातमलादीनां द्वात्रिंशत्‌ श्चयब्रद्धितः। . . 2 स्योल्यकाश्य नरिविघो बिखंसाचो बलक्षयः ॥२॥ त वय विषाविम्‌। - षट्‌ शोफाः षडन्रणा वंहिन्ितयं विषयादिकम्‌ |

` त्वगाभिषसिरास्नायुखन्ध्यस्थिमञ्जसम्भवाः |

.= णएवरःसुखेः ससषष्टिः. इति स्थाने द्वितीयके 4

. . द्राचत्वारिशदधिका"त्रिशती-परिकीर्निता ॥१६॥

कणपाल्याऽऽमयाः पञ्च क्रव्यं उक्तं चतुर्विधम्‌ ॥१६॥

, वान्तरेचितयोः प्रोक्ता व्यापदो दश पञ्चः च|

` _ षटं नेत्रप्रणिधानस्य नेत्रस्य. एकादश एव ठ ॥२९०॥

ˆ पञ्चवस्तिकृताः तत्र चत्वारः पीडने कृताः ।

एकादश द्रव्यङृताः, ससत शय्याङतास्तया ॥२९॥ , „>+

` “ चचवत्वारिशैत्‌ चर्तलश्च वेयतों व्यापदस्तथा | & ।

करोषाऽऽयासादिकाः पच्च दश चं आदरदेदुकाः ॥२२॥

___ | स्नेदस्यःकारणानि.उो.अप्रस्यांगमङ्ृन्ति च ।

“ इतिनेत्रादिदोष्रेण षष्ठिः सप्त षमासतः ॥२३॥

[ > ६६

आमं विदग्धं विष्टन्घं' अजीणं' च तथा त्रिधा ॥३॥ `

इति षटषष्िः आतङ्कः सूत्रस्थाने नि दरशिताः ।

आमपक्वाशये त्रे तथा इन्द्रियचवुष्टये ॥४॥ 4 न =>

४ = 5

शक्रे चेकाङ्गसवाङ्गगताः साधिका दश ॥५॥

त्रयोदशाऽऽब्रतैः अन्यैः. दोषैः स्युः मारुतेः. खलु । :

पक्षाघातोऽयतन्वश्च मन्यास्तम्भोऽर्दितस्तथा ॥&॥

गृध्रसी सह विश्वाच्या शिरः करोष्टुकपूवकम्‌ ।

खज्ञः पङ्कः कलायाख्यः कण्टकः. पाद्‌ द्‌ाहङत्‌ +1॥७॥ `

पादहषोंऽववाह्श्च मृकमिन्मिनगद्‌गदा,

तून्याऽध्मानद्वयेऽष्टीलादयं अयासि षट्‌ तथा ॥८।) . :

चमकीलः चतललश्चाऽश्मयः पञ्च भगन्दराः। _.

तथाऽद्य कष्टानि किलासानि पुनः त्रिषा ॥६॥।

प्रमेहा वि्तिः प्रोक्ताः पिडका नव॒ तत्कृताः ।

उदराणि तथाऽष्टो च मूढगभस्तथाऽष्टषा ॥१०॥

ना । व

` बाह्या विद्रधयः षट्‌ स्युः तयाऽन्तःस्थाः स्मूता दशः ।

विख्पनाडीस्तनजाः तशेवं॒पञ्च पञ्च च ॥११॥

ग्रन्थयः सप्त, चेका स्यात्‌ अपची, खतधाऽब दम्‌ ! ˆ ` ~

गढगण्डाः त्रयः; सप्त, द्धयः;परिकौत्तिताः;॥ ९२६.

उपदशा मताः पञ्च; -श्लीपदं चतथा. व्रि्षुः॥ ~

~ -मगनाःअ्टदय जग्रा शकदोषास्तथेव च ॥॥॥१३॥ `

~. चत्वारिशत्‌-तथाऽ्टौ च छुद्ररोगाः प्रकीततिताः-।:-- = >

+; -अष्टौ ओष्ठ्भवा दन्तमूङेषु द (प्र च ॥१४]।: . `. <

-.> अष्टौ. दन्तुषु,:जिहायां पञ्च). ताल्वगताःनव.॥ = ` > ५

कण्ठे चःअशाद्‌श. रयाः च्तुःस॒वरखरा गदाः ॥१५५॥

अष्टौ शुक्रगता रोगा अष्टो आत्तवदु्टयः. -.; स - । त = [' १4

चत्वारोऽपग्दराः प्रोक्ता अपातः व॒ .अपराङ्तः ॥१५॥ क

„ मक्कल्लटीनयोषाश्च नगमेशाहतस्तथा । ` ~ + ~ 8 | |

. . नागोदरः स्वुतिगमं शारीरे संप्तविश्चतिः ॥ १८॥ ६

अथ मेदोऽनिकवेगात्‌ श्वयथु; सरुजश्च . यः आब्यवातः सवंसराः शोफाः पञ प्रकीतिताः ।... ~

१ क १४ ४, २९,

भू न्द त त ज क १०५ ,५१.-*

जक # जन

अ० ६६ ]

उत्तरतन्त्रम्

८११

एवं चिकित्सितस्थाने रुजोऽधानवतिः तथा । अच्चादिरखाविज्ञाने विशतिः विषहेतुका ॥२४॥ स्थावरे वेगाः स्युः दर्वाकरमण्डलिनां विषे । राजिलवैकरञ्जानां प्रत्येकं सप्त सप्त च ॥२५॥ मृषिकास्तु दशाऽष्टौ च सप्तवेगा अलर्कजाः । सप्तषष्टियतं चात्र कीटानां विषपायिनाम् ॥२६॥ सप्त चत्वारिशयुतं कल्पस्थाने शतद्वयम् । नव सन्ध्याश्रयाः प्रोक्ता वर्त्मजाश्च एकविंशतिः ॥२७॥ शुक्लभागे दशैकश्च चत्वारः कृष्णभागजाः । सर्वाश्रयाः सप्तदश दृष्टिजा द्वादशेव तु ॥२८॥ बाह्यजौ द्वौ नेत्ररोगौ इति षट्सप्ततिः स्मृता । कुक्कुणकः शिशोरेव, कर्णऽष्टाविंशतिर्गुणम् ॥२९॥ एकविंशद्वद्वाणगताः सप्रतिश्यायपञ्चकाः । एकादश शिरोरोगाः परं शालाक्यसंज्ञिते ॥३०॥ आतङ्कानां शतं प्रोक्तं षट्चत्वारिंशता युतम् । नव बालग्रहा योनिव्यापदो विंशतिः त्रियाः ॥३१॥ एवं कुमारतन्त्रेऽस्मिन् एकोनविंशद्वद्वाणमयाः । अष्टौ ज्वरा, अतीसारः षट्, चतुष्टयः प्रवाहिकाः ॥३२॥ चत्वारौ ग्रहणीदोषा, यद्वमेको गुल्मपञ्चकम् । हृद्द्वोगाः पञ्च, चत्वारः पाण्डुवाल्याः कामलाद्वयम् ॥३३॥ हलीमकः पानकी च रक्तपित्तं चतुर्विषम् । षट् प्रकारा मता मूर्च्छा विकाराः सप्त मद्यजाः ॥३४॥ दाहाः पञ्च, तृषः सप्त लृदयः पञ्च देहिनाम् । हिकाः क्षासाः तथा कासाः प्रत्येकं पञ्च पञ्च च ॥३५॥ स्वरभेदाः तथा षट् स्युः, विंशतिः कुमिजातयः । नवोदावर्त्तका दृष्टा विस्मृत्यः तिष्ठ एव च ॥३६॥ आनाही द्वौ आमविट्को तथाऽरोचकपञ्चकम् । मूत्राधाता द्वादश स्युः इति कायचिकित्सिते ॥३७॥ आमयानां शतं प्रोक्तं चत्वारिंशत् च सप्त च । देवता दैत्य-गन्धर्व-यक्ष-पितृ-अहि-रक्षसाम् ॥३८॥ पिशाचस्याऽभिषक्त्रेण गदाः च अष्टौ प्रकीर्तिताः । अपस्माराश्च चत्वारः उन्मादाः षड् उदीरिताः ॥३९॥ अष्टादश गदा भूतविद्यायां सूक्ष्मदक्षिभिः । एवं हि सौश्रुते तन्त्रे काशिराजेन कीर्तिताः ॥४०॥ रोगाणां तु सहस्रं यत् शतं विशतिरेव च ।

भिन्ना दोषाण्यो गुणाः ।

द्विषष्टिधा भवन्त्येते भूयिष्ठमिति निश्चयः ॥४१॥

जिस प्रकार सत्त्व, रज, तम गुण भिन्न हुए बासठ प्रकार के होते हैं, उसी प्रकार से तीनों दोष भी विभक्त होकर बासठ प्रकार के हो जाते हैं ।

वक्तव्य—“रजोभृष्टिष्ठो भावतः, रजो हि प्रवर्त्तकं सर्वभा- वानाम् पित्तं सत्त्वोत्कटम् लघुप्रकाशकत्वात् । कफः तमोबहुलः— गुरुप्रावरणकत्वात् ।” कफप्रकृति पुरुष में सत्त्व गुण की प्रधानता कफ में सत्त्व और तम दोनों गुण के रहने से है । यथा— “सत्त्वतमोबहुला आपः” ॥

त्रय एव पृथग् दोषा द्विगो नव समाधिजैः । त्रयोदशाधिकैकद्विसप्तमध्योत्पन्नोऽस्त्रिगः ॥१०॥ पञ्चागदेवं तु सह भवन्ति क्षयमागतैः । क्षीणमध्यधिकक्षीणक्षणवृद्धैस्तथाऽपरे ॥११॥ द्वादशेवं समाख्याताऽक्षयो दोषा द्विषष्टिधा ।

पृथग रूप में वात, पित्त, कफ, तीन दोषों में दो दोष स्वस्थ और एक बढ़ा रहे, इस प्रकार से तीन भेद बनते हैं । दो दोष के समान रूप में बढ़ने से और एक के स्वस्थ रहने से, तीन, तथा दो दोषों में एक दोष के अधिक बढ़ने से और तीसरे दोष के स्वस्थ रहने से छे भेद, इस प्रकार सप्त अधिक भेद से कुल नौ भेद होते हैं । तीनों दोषों के बढ़ने से तेरह भेद होते हैं, यथा—तीनों दोषों के मिलने पर एक दोष की अधिकता से तीन, तीनों दोषों के मिलने पर दो दोषों के बढ़ने से तीन, सप्त, मध्यम, उत्पन्न भेद से छे, तीनों की अधिकता से एक, इस प्रकार तेरह भेद हैं । जिस प्रकार दोषों की वृद्धि से ये पच्चीस भेद होते हैं, उसी प्रकार दोषों के क्षीण होने से भी पच्चीस भेद हो जाते हैं । क्षीण मध्य, अधिक क्षीण, क्षीण, भेद होते हैं, इस प्रकार से ये बासठ भेद हैं ।

१ (१) वायुवृद्धः पित्तकफौ समौ । पित्तं वृद्धं वायुकफौ समौ । कफो वृद्धो वायुपित्तै समौ ।—३,

(२) वायुपित्तै वृद्धे, कफः समः । वायुकफौ वृद्धौ पित्तं समम् । पित्तकफौ वृद्धौ वायुः समः । एक को अति वृद्धि है— वायोःपित्तै वृद्धे कफः समः । पित्ताद् वायुवृद्धः कफः समः । कफात् वायुवृद्धः पित्तं समम् । वायोः कफौ वृद्धः पित्तं समम् । पित्तात्कफौ वृद्धौ वायुः समः । कफात् पित्तं वृद्धं वायुः समः ॥७-८-९॥

(३) वायोः पित्तकफौ वृद्धौ । पित्तात्कफवायु । कफाद् वायुपित्तै । वातपित्ताम्यां कफौ वृद्धः वायुकफाम्यां पित्तं वृद्धम्, पित्तकफाम्यां वायुवृद्धः ॥—६

(४) वायुपित्तकफा वृद्धा वृद्धतरा वृद्धतमाः । इसी प्रकार वायु कफ पित्त । पित्त कफ वायु । पित्त वायु कफ । वायु पित्त कफ । कफ पित्त वायु ।—६

(५) वायुपित्तकफा वृद्धाः ।—१ इस प्रकार दोष की वृद्धि से पच्चीस ३+९+६+१+१ = २५ बनते हैं ।

वृद्ध शब्द के स्थान पर क्षीण शब्द प्रयोग कर देने से इसी प्रकार २५ बनते हैं ।

८१२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६३ ]

वि० मन्तव्य—यह स्मरण रखिये कि दोषों के बढ़ने ही से रोग नहीं होते, अपितु घटने से भी रोग होते हैं। विदग्ध दोषों के ये ६२ भेद अर्थात् अवस्थाएँ हैं, और रोग का निदान करते समय दोषों की अंशांश कल्पना द्वारा इनका विवेचन किया जाता है। चिकित्सक इसका विचार करे कि कौन दोष वृद्ध है, कौन दोष क्षीण है, तथा कौन दोष सम है। रोगस्तु दोषवैषम्य—दोषों की विषमावस्था रोग है, और दोष-साम्यमरोगता—दोषों की समवस्था अरोगता (स्वास्थ्य) है। यह ६२ भेद तो केवल परस्पर मिले हुए तीन दोषों के हैं, परन्तु रस आदि धातुओं तथा मलों के साथ मिलाकर तो इनके भेद असंख्य हो जाते हैं, (देखिये श्लो० १२)।

द्वयुत्पन्नैकोत्पन्नैः षट् स्युर्हीनमध्याधिकैश्च षट्। समैश्चैको विकारास्ते सन्निपाताख्योदश ॥ संसर्गे नव षट् तेभ्य एक वृद्धया समैज्यः। पृथक् त्रयः स्युस्तैर्वृद्धैर्याषयः पंचविशतिः ॥ यथा वृद्धेस्तथा क्षीणदोषैः स्युः पंचविशतिः। वृद्धिक्षयकृतश्रान्यो विकल्प उपदेष्टव्ये ॥ वृद्धिरैकस्य समता चैकस्यैकस्य संक्षयः। ब्रह्मं वृद्धिः क्षयश्चैकस्यैकवृद्धिर्द्वयोः क्षयः ॥

चरक सू० अ० १७-४१-४४ ॥

मिश्रा धातुमलैर्दोषा यान्त्यसंख्येतान् पुनः ॥१२॥ तस्मात् प्रसङ्गं संयम्य दोषभेदविकल्पनैः। रोगं विदित्वोपचरेद्दसभेदैर्यथैरितैः ॥१३॥

(६) वातो वृद्धः पित्तं समं कफः क्षीणः। पित्तं वृद्धं वातः समः कफः क्षीणः। कफो वृद्धः वातः क्षीणः पित्तं समम्। कफो वृद्धः वातः समः पित्तं क्षीणम्। वातो वृद्धः कफः समः पित्तं क्षीणम्। पित्तं वृद्धं कफः समो वातः क्षीणः।—६

(७) वायुः क्षीणः पित्तकफौ वृद्धौ। पित्तं क्षीणं कफवायु वृद्धौ। कफः क्षीणो वायुपित्तौ वृद्धौ। वायुपित्तौ क्षीणौ कफौ वृद्धः। पित्तकफौ क्षीणौ वायुवृद्धः। कफवायु क्षीणौ पित्तं वृद्धम् ॥—६

८—वायु पित्त कफ सम १ +

इस प्रकार ६ + ६ + १ = १३, कुल २५ + २५ + १३ = ३३ भेद हुए।

† “समवातपित्तार्लेष्माणं प्रकृतितस्थानां समा भवत्यन्यन्यः ॥”

चरक वि० अ० ६।

भिषक् कर्ताऽथ करणं रक्षा दोषास्तु कारणम्।

कार्यमारोग्यमेवैकमनारोग्यमभतोऽन्यथा ॥१४॥

दोष रक्तादि धातु और मलों से मिलकर असंख्येय बन जाते हैं। इसलिये दोष भेद विकल्पना का नियमन करके रोग को जानकर कहे हुए रस भेदों से चिकित्सा करे। वैद्य कर्ता है, रस-करण (साधन) हैं, दोष कारण हैं, आरोग्य कार्य है, अनारोग्य-अकार्य है।

वि० मन्तव्य—चिकित्सा कर्म में—वैद्य “कर्ता”—चिकित्सा करनेवाला है। मधुर आदि रस करण अर्थात् चिकित्सा के उपकरण हैं। इनके द्वारा चिकित्सा की जाती है—दोषों का शमन किया जाता है। वात आदि दोष रोगों का कारण—हेतु है। और आरोग्य (स्वास्थ्य) कार्य—कर्तव्य कर्म है। वैद्य (कर्ता) रसों (उपकरणों) द्वारा दोषों (रोगकारणों) का शमन करता है, यही कार्य—कर्तव्य कर्म है ॥१४॥

अध्यायानां तु षट्पञ्चुषा प्रथिताथेपदक्रमम्।

एवंमेतदरोषेण तन्त्रमुत्तरमुद्दिमत ॥१५॥

छथासठ अध्यायों में अर्थ-पद क्रम से ज्ञान ऐश्वर्य से भरा यह सम्पूर्ण उत्तर तंत्र गूँथा हुआ है।

वि० मन्तव्य—इन ६६ अध्यायों द्वारा प्रथित है, अर्थ-पद-क्रम जिसमें ऐसा यह उत्तर तन्त्र पूर्ण रूप से बुद्धिमान्-बुद्धिमान्-महान् है ॥१५॥

स्पष्टगृढार्थविज्ञानमगाढमन्धचेतसाम्

यथाविधि यथाप्रश्नं भवतां परिकीर्तितम् ॥१६॥

स्पष्ट, गृढ अर्थ को बतानेवाला, मन्द बुद्धिवाले भी जिसको सरलता से जान सकते हैं, इसको विधि एवं प्रश्न के अनुसार आपको कह दिया है ॥१६॥

सहोत्तरं त्वेतदधीत्य सर्वं

ब्राह्मं विधानेन यथोदितेन।

न हीयतेऽर्थान्मनसोऽभ्युपेता-

देतद्रुचो ब्राह्ममतीव सत्यम् ॥१७॥

कही हुई विधि के अनुसार उत्तर तंत्र के साथ इस सम्पूर्ण ब्राह्म (ज्ञान) को पढ़कर, मन से ग्रहण किये हुए (मली प्रकार समझे हुए) विषयों से अलग नहीं होता, यह ब्राह्म वचन (ब्रह्म का वचन) पूर्ण सत्य है ॥१७॥

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे दोषभेदविकल्पो नाम

षट्पञ्चितीभोऽध्यायः ॥१६॥

इति सौश्रुते आयुर्वेदशास्त्रे उत्तरस्थानं समाप्तम्।

समासोऽयं ग्रन्थः।

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