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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६३ ]

वि० मन्तव्य—यह स्मरण रखिये कि दोषों के बढ़ने ही से रोग नहीं होते, अपितु घटने से भी रोग होते हैं। विदग्ध दोषों के ये ६२ भेद अर्थात् अवस्थाएँ हैं, और रोग का निदान करते समय दोषों की अंशांश कल्पना द्वारा इनका विवेचन किया जाता है। चिकित्सक इसका विचार करे कि कौन दोष वृद्ध है, कौन दोष क्षीण है, तथा कौन दोष सम है। रोगस्तु दोषवैषम्य—दोषों की विषमावस्था रोग है, और दोष-साम्यमरोगता—दोषों की समवस्था अरोगता (स्वास्थ्य) है। यह ६२ भेद तो केवल परस्पर मिले हुए तीन दोषों के हैं, परन्तु रस आदि धातुओं तथा मलों के साथ मिलाकर तो इनके भेद असंख्य हो जाते हैं, (देखिये श्लो० १२)।

द्वयुत्पन्नैकोत्पन्नैः षट् स्युर्हीनमध्याधिकैश्च षट्। समैश्चैको विकारास्ते सन्निपाताख्योदश ॥ संसर्गे नव षट् तेभ्य एक वृद्धया समैज्यः। पृथक् त्रयः स्युस्तैर्वृद्धैर्याषयः पंचविशतिः ॥ यथा वृद्धेस्तथा क्षीणदोषैः स्युः पंचविशतिः। वृद्धिक्षयकृतश्रान्यो विकल्प उपदेष्टव्ये ॥ वृद्धिरैकस्य समता चैकस्यैकस्य संक्षयः। ब्रह्मं वृद्धिः क्षयश्चैकस्यैकवृद्धिर्द्वयोः क्षयः ॥

चरक सू० अ० १७-४१-४४ ॥

मिश्रा धातुमलैर्दोषा यान्त्यसंख्येतान् पुनः ॥१२॥ तस्मात् प्रसङ्गं संयम्य दोषभेदविकल्पनैः। रोगं विदित्वोपचरेद्दसभेदैर्यथैरितैः ॥१३॥

(६) वातो वृद्धः पित्तं समं कफः क्षीणः। पित्तं वृद्धं वातः समः कफः क्षीणः। कफो वृद्धः वातः क्षीणः पित्तं समम्। कफो वृद्धः वातः समः पित्तं क्षीणम्। वातो वृद्धः कफः समः पित्तं क्षीणम्। पित्तं वृद्धं कफः समो वातः क्षीणः।—६

(७) वायुः क्षीणः पित्तकफौ वृद्धौ। पित्तं क्षीणं कफवायु वृद्धौ। कफः क्षीणो वायुपित्तौ वृद्धौ। वायुपित्तौ क्षीणौ कफौ वृद्धः। पित्तकफौ क्षीणौ वायुवृद्धः। कफवायु क्षीणौ पित्तं वृद्धम् ॥—६

८—वायु पित्त कफ सम १ +

इस प्रकार ६ + ६ + १ = १३, कुल २५ + २५ + १३ = ३३ भेद हुए।

† “समवातपित्तार्लेष्माणं प्रकृतितस्थानां समा भवत्यन्यन्यः ॥”

चरक वि० अ० ६।

भिषक् कर्ताऽथ करणं रक्षा दोषास्तु कारणम्।

कार्यमारोग्यमेवैकमनारोग्यमभतोऽन्यथा ॥१४॥

दोष रक्तादि धातु और मलों से मिलकर असंख्येय बन जाते हैं। इसलिये दोष भेद विकल्पना का नियमन करके रोग को जानकर कहे हुए रस भेदों से चिकित्सा करे। वैद्य कर्ता है, रस-करण (साधन) हैं, दोष कारण हैं, आरोग्य कार्य है, अनारोग्य-अकार्य है।

वि० मन्तव्य—चिकित्सा कर्म में—वैद्य “कर्ता”—चिकित्सा करनेवाला है। मधुर आदि रस करण अर्थात् चिकित्सा के उपकरण हैं। इनके द्वारा चिकित्सा की जाती है—दोषों का शमन किया जाता है। वात आदि दोष रोगों का कारण—हेतु है। और आरोग्य (स्वास्थ्य) कार्य—कर्तव्य कर्म है। वैद्य (कर्ता) रसों (उपकरणों) द्वारा दोषों (रोगकारणों) का शमन करता है, यही कार्य—कर्तव्य कर्म है ॥१४॥

अध्यायानां तु षट्पञ्चुषा प्रथिताथेपदक्रमम्।

एवंमेतदरोषेण तन्त्रमुत्तरमुद्दिमत ॥१५॥

छथासठ अध्यायों में अर्थ-पद क्रम से ज्ञान ऐश्वर्य से भरा यह सम्पूर्ण उत्तर तंत्र गूँथा हुआ है।

वि० मन्तव्य—इन ६६ अध्यायों द्वारा प्रथित है, अर्थ-पद-क्रम जिसमें ऐसा यह उत्तर तन्त्र पूर्ण रूप से बुद्धिमान्-बुद्धिमान्-महान् है ॥१५॥

स्पष्टगृढार्थविज्ञानमगाढमन्धचेतसाम्

यथाविधि यथाप्रश्नं भवतां परिकीर्तितम् ॥१६॥

स्पष्ट, गृढ अर्थ को बतानेवाला, मन्द बुद्धिवाले भी जिसको सरलता से जान सकते हैं, इसको विधि एवं प्रश्न के अनुसार आपको कह दिया है ॥१६॥

सहोत्तरं त्वेतदधीत्य सर्वं

ब्राह्मं विधानेन यथोदितेन।

न हीयतेऽर्थान्मनसोऽभ्युपेता-

देतद्रुचो ब्राह्ममतीव सत्यम् ॥१७॥

कही हुई विधि के अनुसार उत्तर तंत्र के साथ इस सम्पूर्ण ब्राह्म (ज्ञान) को पढ़कर, मन से ग्रहण किये हुए (मली प्रकार समझे हुए) विषयों से अलग नहीं होता, यह ब्राह्म वचन (ब्रह्म का वचन) पूर्ण सत्य है ॥१७॥

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे दोषभेदविकल्पो नाम

षट्पञ्चितीभोऽध्यायः ॥१६॥

इति सौश्रुते आयुर्वेदशास्त्रे उत्तरस्थानं समाप्तम्।

समासोऽयं ग्रन्थः।