स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
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(स्वरोदय विज्ञान)
स्त्री सम्भोग केवल रात्रि के समय जबकि भोजन अच्छी तरह से पच जावे—होना चाहिए। दोनों हर तरह से प्रसन्नचित्त हों। दूसरे किसी समय में, स्त्री का संसर्ग ही नहीं होना चाहिए। प्रातःकाल के संभोग से शक्ति व्यर्थ ही नष्ट होती है। संभोग के समय पुरुष का स्वर सदा सूर्य चलना चाहिए। चन्द्रस्वर में गर्भ रहना असम्भव है। सूर्यस्वर के साथ तत्त्व का भी ख्याल रहे।
जल पृथ्वी के योग में, गर्भ रहे सो पूत। वायु तत्त्व में छोकड़ी, और सूत के सूत।। पृथ्वी तत्त्व में गर्भ जो, बालक होवे भूप। धन्वन्ता सोइ जानिये, सुन्दर होय स्वरूप।।
जल और पृथ्वी तत्त्व में यदि गर्भ रह जावे, तो लड़का होता है — वह भाग्यवान् तथा सदाचारी होता है। यदि वायु तत्त्व में स्वर चले तो लड़की होती है। आकाश तत्त्व में गर्भ रहते ही यदि लड़का पैदा होवे, तो उसकी माता की मृत्यु हो जावे। इस तत्त्व में एक तो गर्भ ही बहुत कम रह सकता है। अग्नि तत्त्व में गर्भ रहता नहीं, यदि रहा तो गर्भपात का और स्त्री के मरने का भय रहता है। सूर्यस्वर में लड़का और चन्द्रस्वर में लड़की पैदा होती है। गर्भ उसी समय रहता है, जबकि स्त्री का चन्द्रस्वर चलता हो और मर्द का दाहिना सूर्य स्वर। यह सबसे अच्छा समय है। तत्त्व साथ में पृथ्वी या जल होवे। यदि स्त्री बाँझ है या और कोई खराबी है, तो लिखा है कि यदि पुरुष अपना दाहिना स्वर करे और स्त्री का बाँया और दोनों का तत्त्व जल हो, तो बाँझ को भी गर्भ रह सकता है।
स्वर इच्छानुसार बदल सकता है। तत्त्व इच्छा और धारणा शक्ति से बदल सकता है। अभ्यासी के लिए, जिसने स्वर को और तत्त्वों को वशीभूत किया है, यह अति साधारण बात है। वह अपने और दूसरे के ऊपर जो चाहे स्वर और तत्त्व बदल सकता है। ज्यों ही तत्त्व का ध्यान किया कि वह बदल जाता है।