स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 94 में से
संदर्भ में पढ़ें(३८)
(स्वरोदय विज्ञान)
पांव धरती पै धरें। तीन पैड़ आगे चले फिर बैठे। सुर की विचार करे, जौं दाहिनी सुर न चलत होई तो अपनी कारज को अनईतौ जानिये। कै कछु अचीती मार परंत है।
जब वा जगह छांड कै जात रहै, जब सुर मरजादा पर आवै, दिन पर दिन उठन लगे, तब मकान पर आवै तौ चीते कारज होइ जौं डेरै सुर चलत होइ तौ कारज न करै, करै तो फतैन होइ।
स्वर बदले की विधि
चन्द्र के दिन सूर्य अरु सूर्य के दिन चन्द्र, जो आठ दिना लौ अदल-बदल हो चले अरु ना फिरै तौं जौ जतन करे-सौठ, सुहागु, गौरखमुन्डी कौ नासु देइ तौ काल छै महीना को आरबल बडे अरु जो फिर आवै तौ फिर करै। अरु चार रात चार दिन डेरी सुर चले तो जाने मृत पहुची। रोग में परे तो रोगिया कौ जतन करै।
घरी-घरी करैटा लिवावत रहे। अरु रोगिआ की अन्न पानी छुटा देइ। अरु पियावै तौ दूध पियावै। रोगिआ नोको होइ।
अथ तत्व कौ विचार लिख्यते :-
जौन दिन तौन तत्व काहति है। सनीचर, मंगल, इतवार, बुधवार-आकाश अग्नि पृथ्वी-पृथ्वी। बृहस्पति, शुक्रवार सोमवार को तत्व पवन, अग्नि, जल जानिवौ। कांच की आरसी लीजे ऊपर दोनौ नासिका को पवन छाड़िजै। जौन तत्व बहुत होइ ताकौ वर्ण आरसी ऊपर उछरै। पृथ्वी पीत चौकोर नजर आवै। जल सेतु रूप गोल गोल नजर आवै। वायु हरौ रूप छिखुटा नजर आवै। आकास तत्व गोल गोल करन रूप नजर आवै। रोज उठवे की विधि संपुरन।
| वारशः तत्व स्थिति :- | बुध-पृथिवी | शुक्र-अग्नि |
|---|---|---|
| रवि - पृथिवी | गुरु-वायु | शनि-आकाश |
| सोम-जल | मंगल-अग्नि |