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स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा

स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)

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य विज्ञान)

(स्वरोदय विज्ञान)

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पार्वत्युवाच

गौरी कही सुनौं सिव देवा, स्वर पलटन कौ कहियै भेवा। रवि में ससि ससि में रवि आवै, कहा करै जिहि फेरिन चावै।

श्री शिव उवाच

जब सिव संकर बोले बानी, सुनौ प्रिया सुन्दर सुखदानी। बहनि जु नाडी तूल सौ रोकै, औरौं भांति गुनी अबलोकै। जो स्वर सरे सोइ दिसि जानौ, लावै कृखि सु कुहुनी माँनौ। अँगुरी हाथ भिन्न सब कीजै, पुनि कछु भार भूमि पर दीजै। जो स्वर बहै बन्द हो जाई, बन्द होई सो चलै वहाई। चलते स्वर सौ सोवै कोई, नाडी सून्य ऊर्ध्व लै जोई। निश्चै चलै और स्वर ताकौ, ऐसै भेद लहौ तुम याकौ। निसि पति सरै जु दिन में बाहैं, रजनी कौ दिनपति अवगाहैं। जो कोउ क्रिया सदा यह करै, सकल रोग सो तन के हरै। पीरा सीस अस्थि जो होई, सत्य पीर नासैं सब सोई। टौना टामन कछु न लागै, बीछू सर्प सकल विष भागै। तन में रहै सदा तरुनाई, हर्ष अनंद वंस अधिकाई। दिन कौ पान करै ससि जोई, रवि कौ राति निवाहै सोई। बढ़े आयु निश्चै जिय जानौं, काहू भांति न संसय मानौं। पै भोजन अस्नान जु जानौं, तिनि में सूर स्वरै पहिचानौं। चारि घरी स्वर फेरि जु कीजै, याते अधिक बहन नहि दीजै। प्रथमारम्भ कियै चित्त चाहै, जो नर स्वर सिद्धी अवगाहै। ताकी रीति सकल अब कहियै, जाके कियै सदा सुख लहियै।

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