भारतकोश
स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा

स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)

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(स्वरोदय विज्ञान)

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अथ स्वर-सिद्धि-विधि

वर्ष एक लौं साथै आसन, जहाँ यह कहत महा भय-नासन। जहाँ अस्थल उत्तम अति होई, पुनि उत्पात न जाने कोई दुर्भति दुष्ट तहाँ नहि आवै, सांत चित कोउ एक सिध्दावै। सूक्ष्म भोजन तहाँ सु जानौ, त्याग अनूल ताको पहिचानौ। मीठी मठा गाइको लेई, चावल संग लेइ पुनि सोई। और सकल भोजन परिहरै, एक बार यह साधन करै। आसन तहाँ पालथी जानौ, नतौ दुजाना बैठक मानौ। सूर्य चन्द्र कौ बैठक होई, बैठे सुचित जू साधक जोई। जो अभ्यास करें सुख पावै, नासाअग्र ध्यान सो धावै। प्रथम पीर उपजै कछु नैना। चालीस दिन बीतै होई चैन।। जोगी स्वर ईश्वर स्वर ज्ञानी, गिरिजापति येहि भांति बखानी। पसु पंछी मानस जे मरै, साधक दृष्टि तहां लौ परै। चाहे तो अपनौ तनु त्यागै, मृतक सरीर जाइ पुनि जागै। जो चाहे तो फेरिहु आवै, याकौ मंत्र गुरु पहि पावै। जब यह ध्यान भाल ठहराई, बहुरि तहां तै मरितष्क जाई। आवै जबै सीस के मांही, पृथ्वी परै न साधक छांही। स्वर्ग पताल सवै, वृग आवै, देव अपसरा दर्सन पावै। ग्रह नक्षत्र सब तिनि के रूपा, नेत्र निकट सो लखै अनूपा। जब पुनि दृष्टि पृष्टि पर आवै, बात सात सागर की पावै। साधक क्रिया यहै अभ्यासै, सो सब दुविधा भ्रमै विनासै। निमै होइ परम-पद पावै, जो साधन सौं चित लगावै। एक वर्ष में साधजु होइ, जो पै विघन न आवै कोई। चाहे रहे जगत अनुरागी, चाहे होइ सकल कौ त्यागी। करनी कठिन करी नहि जाई, रिषीकेस मुख भाषि सुनाई। हौं नहि यह करनी करि जानौ, चतुराई करि बात बखानी।