स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
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(स्वरोदय विज्ञान)
(स्वरो)
पै जो कोऊ इहि विधि राखै, भूलि न कबहु तमोलहि चाखै । तर्जन और अंगुष्ठा कहियै, तिनि के नखहि बढायै रहियै । रसना तैँ सिरा द्वौ जानौ, अरुन स्याम तुभ तिनि कों मानौ । तिनि कों काटि नखनि सों लीजै, लांबी कोमल रसना कीजै । नासा लों जिभ्या जब आवै, साध मनोरथ पूरन पावै । बहुरौ प्रथम पूरकैं ठानै, रसना तालू रध समानै । रसना सबहि तालु मंहि जाई, वायु सकल तन रहै समाई । ग्रीव हाड़ ठोड़ी सों बांधै, रोकै पवन वर्ष भरि साधै । ऐसी भांति क्रिया जो साधै, एक वर्ष लों धरै समाधै ।
इति खेचरी-कर्म
पार्वत्युवाच
मौरी कहै सुनौ सिव ज्ञानी, तुम्हरी महिमा जगत बखानी । सिद्धासन जो जग में कहियै, ताकी सिद्धि कौन विधि लहियै । कहा होहि तिहि आसन साधै, सिद्धि कौन ताकै अवराधै । हो कृपाल सो मोसों भाखों, दासी जानि गुप्त मत राखौ ।
अथ सिद्धासन-विधि
श्रीशिव उवाच
ऐसे सुनि बोले त्रिपुरारी, चित दै सुनियै अचल कुमारी । आसन सिद्धि, सिद्ध जो साधै, बैठक तासु दुजानू बांधै । दक्षिण पद की पीठि जू जानों, चरण बाम तरवा पर आनो । आधे तलु एड़ी दिसि जोई, दोउ अंड तर दावै सोई । मूत्र बीज की नाड़ी रोकै, ऐसी भाँति लहै सुख ओकै । रसना तालु रंध्र में दीजै, पवन रोकि सो तन में लीजै । सिद्धासन इहि विधि साधै, मैटे चित सों सकल उपाधै ।