भारतकोश
स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा

स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)

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(स्वरोदय विज्ञान)

(६१)

सकता है। वर्ण का ध्यान करने से तो वर्ण और काला होगा नहीं बल्कि ब्रिस्कट, पावरोटी खाने वाला जीर्ण-शीर्ण, विवर्ण शरीर स्वर्ण सदृश हो जायेगा। जो हो, मैं सबसे इस बात की परीक्षा करने की प्रार्थना करता हूँ।

(१६) पुरुष की दक्षिण नासिका से और स्त्री की वाम नासिका से निःश्वास चलते समय दाम्पत्य सम्भोग-सुख भोगना चाहिए। इससे दोनों का शरीर ठीक रहता है और दाम्पत्य प्रेम बढ़ता है।

(१७) सम्भोग के बाद स्त्री-पुरुष दोनों को जी-भर शीतल जल पी लेना चाहिए, इससे शरीर स्वस्थ रहता है।

(१८) प्रति दिन एक तोला घी में आठ-दस गोल मिर्च तल कर उस घी को पी लेने से रक्त शुद्ध और शरीर पुष्ट होता है।

चिर यौवन-प्राप्ति का उपाय

स्वर शास्त्रानुसार थोड़े से प्रयत्न के द्वारा चिर यौवन प्राप्त किया जा सकता है। यथा —

जिस समय जिस अंग से, जिस नाडी से श्वास चलता है; उस समय उसी नाडी का रोध करना होगा। जो बारबार श्वास का रोध और मोचन करने में समर्थ है, वह दीर्घ जीवन और चिर यौवन प्राप्त कर सकता है।

अनाहत कमल की कर्णिका के अन्दर अरुण वर्ण सूर्य मण्डल है। सहस्त्रार स्थित अमा कला से जो अमृत झरता है, वह उस सूर्य मण्डल में प्रस्त हो जाता है। इसी कारण मनुष्य देह में वली-पलित और जरा आदि आती है। योगी विपरीतकरणी मुद्रा तथा ऊपर पैर और सिर नीचे करके कौशल से झरते हुए अमृत की, सूर्य मण्डल में ग्रसित होने से रक्षा करते हैं। इससे उनकी देह वली-पलित और जरा इत्यादि से रहित और दीर्घ काल तक स्थायी होती है। किन्तु —

गुरुपदेशतो ज्ञेयं न च शास्त्रार्थकोटिभिः