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स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा

स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)

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(स्वरोदय विज्ञान)

सन्ध्यादि के द्वारा वे क्या कर रहे हैं। खाक, पत्थर, सिर पेर कुछ भी नहीं समझते। हमारा विश्वास है कि भाव हृदयगम हुए बिना भक्ति नहीं आ सकती। संध्या में प्राणायाम की जो विधि लिखी है उसमें प्राणायाम की क्रिया और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के ध्यान से क्रमशः लोहित, कृष्ण और श्वेत वर्ण का ध्यान ये दो मुख्य क्रियाएं होती हैं। इनमें से प्रत्येक क्रिया में क्या-क्या गुण है, इसे कोई नहीं जानता। फिर त्रिसन्ध्या की गायत्री के ध्यान में भी उन्ही वर्णों का ध्यान होता है। हम लोग आर्य ऋषियों की सन्ध्या पूजा का महान उद्देश्य अपनी स्थूल बुद्धि के कारण नहीं समझ पाने पर भी अपने सूक्ष्म बुद्धि की मुश्शियाना चाल से उन उन सबको पागल का प्रलाप कह कर अस्वीकारा कर बैठते हैं। निश्चय जानो हिन्दू देवी-देवताओं की नाना मूर्तियाँ, नाना वर्ण जो शास्त्रों में निर्दिष्ट हैं, व्यर्थ नहीं है। सब प्रकार के धर्म साधन और तपस्या का मूल है — स्वस्थ शरीर। शरीर यदि स्वस्थ न रहा और दीर्घ जीवी न हुए तो न धर्म साधन होगा। और न अर्थापार्जन ही होगा। असीम ज्ञान सम्पन्न आर्य ऋषियों ने शरीर स्वस्थ रखने और परमार्थ साधन करने के सहज उपाय स्वरूप देवी-देवताओं के अनेक वर्णों का निर्देश किया है। सन्ध्या उपासना के समय श्वेत, रक्त और श्यामादि वर्णों का ध्यान किया जाता है जिससे वायु, पित्त और कफ इन तीन धातुओं का साम्य होता है और शरीर स्वस्थ रहता है, इसी कारण प्राचीन समय के ब्राह्मण, क्षत्रिय कितने अनियम से रहने पर भी स्वस्थ रहते थे और दीर्घजीवी होते थे। प्रातः काल नींद टूटने पर शिरः स्थित श्वेत कमल में श्वेत वर्ण गुरु देव और रक्त वर्ण उनकी शक्ति का ध्यान करने की विधि है। इससे शरीर कितना स्वस्थ रहता है; इस बात को विलायती बाबू लोग क्या समझेंगे। जो हो, कोई यदि ब्रह्मा, विष्णु, शिव मूर्ति अथवा गुरु और उनकी शक्ति का ध्यान करके, पौर्तालिक, जडोपासक अथवा कुसंस्काराच्छन्न होकर अन्धतमस में गिरने के लिये राजी न हो तो वह नई सभ्यता के अमल धवल आलोक में रहकर ही कम से कम श्वेत, रक्त और श्याम वर्ण का ध्यान करेगा तो वह भी आशातीत लाभ उठा

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