भारतकोश
स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा

स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)

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(स्वरोदय विज्ञान)

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के बालों में इस तरह बाँध देनी चाहिए कि जिससे उस जड़ की गंध उसकी नाक में जा सके। ऐसा करने से गर्भिणी तुरन्त सुख से प्रसव करेगी परन्तु प्रसव होते ही बालों सहित उस जड़ को कैंची से काटकर फेंक देना चाहिए, अन्यथा प्रसूती की नाड़ी तक बाहर निकल आने की सम्भावना रहती है। जिस समय गर्भिणी को प्रसव की वेदना से अत्यन्त कष्ट हो उस समय घबराहट छोड़कर इस उपाय से काम लेना चाहिए। श्वेत पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण जननेन्द्रिय के भीतर देने से भी गर्भिणी शीघ्र सुख से प्रसव कर सकती है।

(१३) जो दिन में बायी नासिका से और रात में दाहिनी नासिका से श्वास लेता है, उसके शरीर में कोई पीड़ा नहीं होती, आलस्य दूर होता है और दिनों दिन चेतना बढ़ती है। दस-पन्द्रह बार रुई द्वारा ऐसा अभ्यास करने से पीछे अपने आप ही इसी नियम से श्वास चलने लगता है।

(१४) प्रातःकाल और तीसरे पहर कागजी नीबू का पत्ता सूँघने से पुराना और भीतरी ज्वर छूट जाता है।

(१५) प्रतिदिन एकाग्र होकर श्वेत, कृष्ण और रक्त वर्णादि का ध्यान करने से देह के समस्त विकार नष्ट होते हैं। इसी कारण ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर हिन्दुओं के नित्य ध्येय हैं। ब्राह्मण नियमित रूप से त्रिकाल संध्या करने के कारण सर्व रोग विमुक्त होकर, स्वस्थ शरीर होकर, जीवनयापन कर सकते हैं।

दुःख की बात है कि आजकल अधिकांश द्विज संध्या आदि करके अपने समय का अपव्यय करना नहीं चाहते और जो लोग करते हैं वे ठीक-ठीक करना नहीं जानते। संध्या का उद्देश्य तो दूर रहा, वे सन्ध्या गायत्री का अर्थ तक नहीं जानते। प्राणायाम आदि भी विधिपूर्वक नहीं किये जाते। सन्ध्या के संस्कृत वाक्यों को बस पढ़ जाना भर जानते हैं इस के सिवा