स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत में प्रवेश
भारत में विदेशी कंपनियाँ तीन तरीके से काम कर रही है। पहला, सीधे अपनी शाखायें स्थापित करके, दूसरा अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से, तीसरा देश की अन्य कंपनियों के साथ साझेदार कंपनी के रूप में।
जून 1995 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 350 से कुछ अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अपनी शाखाओं या सहायक कंपनियों के रूप में देश में घुसकर व्यापार कर रही हैं। 20,000 से अधिक विदेशी समझौते देश में चल रहे हैं। औसतन 1000 से अधिक नये विदेशी समझौते प्रतिवर्ष देश में होते हैं। सन् 1972 के अंत तक देश में कुल 740 विदेशी कंपनियाँ थीं। जिनमें से 538 अपनी शाखायें खोलकर व 202 अपनी सहायक कंपनियों के रूप में काम कर रही थीं। इनमें सबसे अधिक कंपनियाँ ब्रिटेन की थीं। लेकिन आज सबसे अधिक कंपनियाँ अमेरिका की हैं। समझौते के अन्तर्गत काम करने वाली सबसे अधिक कंपनियाँ जर्मनी की हैं। 1977 में विदेशी कंपनियों की संख्या 1136 हो गयी।
आजादी के पूर्व सन् 1940 में 55 विदेशी कंपनियाँ देश में सीधे कार्यरत थीं। आजादी के बाद सन् 1952 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन की 8 विशालकाय कंपनियों के सीधे नियंत्रण में 701 कंपनियाँ भारत में व्यापार कर रही थीं। ब्रिटेन की अन्य 32 कंपनियाँ, भारतीय कंपनियों के साथ किये गये समझौतों के तहत कार्यरत थीं। ये 8 विशालकाय ब्रिटिश कंपनियाँ सन् 1853 से ही भारत में घुसना शुरू हो गयी थीं। ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा सोची समझी रणनीति के तहत लायी गयी ये कंपनियाँ सन् 1860 तक ईस्ट इण्डिया कंपनी के भारतीय उपमहाद्वीप के शोषण के लिए धारदार हथियार बन चुकी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापित हो जाने के बाद ये कंपनियाँ दुनिया के अन्य दूसरे देशों में शोषण करने चली गयीं।
ये 8 ब्रिटिश कंपनियाँ निम्न थीं –
- 1. एन्ड्रयूल एण्ड कंपनी
- 2. मेक्लाइड एण्ड कंपनी
- 3. बर्न एण्ड कंपनी
- 4. डंकन ब्रदर्स एण्ड कंपनी
- 5. आक्टेवियस स्टील एण्ड कंपनी
- 6. गिलैण्डर अर्बुदनाट एण्ड कंपनी
- 7. शा वालेस एण्ड कंपनी
भारत में जैसे-जैसे विदेशी पूँजी का निवेश बढ़ता गया वैसे-वैसे विदेशी कंपनियों की संख्या बढ़ती गयी। इसके साथ जुड़ा हुआ एक आश्चर्यजनक सत्य यह है कि जिन विदेशी कंपनियों ने भारत में
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