भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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'मेसोपोटामिया सभ्यता' के समय के मौजूद हैं। लेकिन यह व्यापार मुख्यतः स्वतंत्र व्यक्तियों द्वारा ही किया जाता था। व्यापारी समूह बनाकर एक देश से दूसरे देश में अपने माल की बिक्री के लिए जाते थे, और आवश्यकता की वस्तुएं वहाँ से खरीद कर लाते थे। भारत का रोम के साथ व्यापार, भारत का बर्मा, मलाया (मलेशिया) चीन आदि के साथ व्यापार इसी श्रेणी में आता था। रोमन साम्राज्य के समय पार-राष्ट्रीय व्यापार खूब होता था, लेकिन व्यापारियों द्वारा साम्राज्य के पतन के बाद भारत का व्यापार चीन के साथ शुरू हुआ। मुख्यतः दक्षिण भारत का हिस्सा चीन के साथ व्यापारिक गतिविधियों में अधिक संलग्न था। व्यापार के इस स्वरूप में शोषण की कहीं कोई गंजाइश नहीं थी और न ही मेजबान व मेहमान देशों के बीच इस व्यापार को लेकर कोई झगड़ा हुआ करता था।

आधुनिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चरित्र वाली दुनिया की सबसे पहली कंपनी 'The Muskovi Company' मानी जाती है। जिसकी स्थापना सन् 1553 में हुई थी। इस कंपनी ने अपनी स्थापना के 3 वर्षों बाद ही दुनिया के महत्वपूर्ण शहरों में अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित कर लिए थे। सन् 1553-1581 तक 'मस्कोवी कंपनी' ने अकूत मुनाफा कमाया और सन् 1581 में कम्पनी के अलमबरदारों ने एक और विशालकाय कंपनी 'The Turkey Company' को स्थापित कर लिया। इस 'टर्की कंपनी' की विशेषता थी कि इसने स्थापना के समय ही दुनिया के महत्वपूर्ण नगरों में अपने पाँव पसारे। ऐसा नहीं था कि 1553 से सन् 1581 तक 'मस्कोवी कंपनी' का व्यापारिक क्षेत्र में एकाधिकार रहा।

सन् 1600 में ईस्ट इण्डिया कंपनी भारत में व्यापार करने के लिए आयी। हालाँकि इस कंपनी की स्थापना ऐलिजाबेथ प्रथम के समय में ही हो चुकी थी, लेकिन इस कंपनी ने बहुराष्ट्रीय चरित्र सन् 1600 में ही ग्रहण किया। भारत आने से पूर्व इस कंपनी ने दुनियाँ के अन्य हिस्सों में भी पैर जमाने की कोशिश की थी लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। उस समय दक्षिण-पूर्व एशिया में अनेक छोटी-मोटी डच कंपनियाँ अपना व्यापार कर रही थी। भारत में भी कुछ डच कंपनियों को प्रवेश हो चुका था। ईस्ट इण्डिया कंपनी ने सन् 1612 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने डच कंपनियों के साथ अम्बोनिया (इण्डोनेशिया) में एक युद्ध लड़ा था। इस युद्ध में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने एक षडयंत्र के तहत डच कंपनियों के अधिकारियों की सामूहिक हत्या करवा दी। सन् 1667 के आते-आते ईस्ट इण्डिया कंपनी ने डच कंपनियों का नामों-निशान मिटा दिया। सूरत के बंदरगाह पर कब्जा करने के लिए ईस्ट इण्डिया कंपनी का पूर्ण अधिकार हो गया। इसके बाद ही ईस्ट इण्डिया कंपनी का शिकंजा पूरे देश पर कसता चला गया।

सन् 1750 के बाद का दौर ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति का दौर था। जिसके दौरान उत्पादन की तकनीक में आमूल परिवर्तन आया। सन् 1600 से 1750 के बीच अंग्रेजी कंपनी ने, जिसमें ईस्ट इण्डिया कंपनी भी शामिल थी, अंग्रेजों को अकूत पूँजी का मालिक बना दिया। भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों का शोषण करके अंग्रेजी बाजार में पैसे का प्रवाह अत्याधिक बढ़ गया। बाजार की ताकतें बाजार में ताकतवर होती गयीं। मुद्रा का दबाव लगातार बढ़ने का परिणाम औद्योगिक क्रान्ति के रूप में सामने आया।

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